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उ उड़ने से पहले ज़रा पुरुषोत्तम 'यक़ीन'
पूजा-सिज़्दे व्यर्थ है, बेजा है अर्दास हमें, ग़ैर के दर्द का, नहीं अगर अहसास ।
मौसम ने बरसा किया, जी भर का ज़हराब संदल-संदल ही रहा, और गुलाब, गुलाब ।
ख़ूब तरक़्क़ी का हुआ, शहरों में यह ढंग चौराहे चौड़े किये, गलियाँ कर दी तंग ।
रे ज़ालिम मत आजमा, दीन-दुखी का धीर कहीं न तज दे तीर को, शान्त नदी का नीर ।
भली दोस्ती दूर की, दोस्त न इतना भूल दोनों तट मिल जाएँ तो, नदिया रहे न कूल ।
होड़ा होड़ी और की, ऊँचे बोल न बोल उड़ने से पहले ज़रा, अपने बाज़ू तोल ।
सुने सराहे, शब्द की, कौन यहाँ झंकार कविताई जैसे हुई, बेवा का श्रृंगार ।
बड़ी निराली देश के, संविधान की चाल हाथी सब अलमस्त हैं हर चींटी पामाल ।
कैसे बाँधे दोस्ती, पाले कैसे बैर तुम राजा हो हम प्रजा, हम बकरी तुम शेर ।
कैसे सस्ती हो यहाँ, महँगाई की शान अपने-अपने मोल का, सब रखते हैँ ध्यान ।
4, पी - 46, तलवण्डी कोटा, राजस्थान - 324005
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