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उ कागज़ में सिमटा रहा प्रभु त्रिवेदी
कागज़ में सिमटा रहा, नई उमर का ख़्वाब पढ़ने को जब ना मिली, वह रंगीन किताब ।
पत्र फाड़ कर क्या करें, छुपे हुए हैं घाव शहनाई सुनकर जला, दिल में एक अलाव ।
बैरिन अब रातें हुईं निंदिया कोसों दूर प्रेम-प्यार की राह में, आँसू का दस्तूर ।
आँख-आँख में हो गया, बिना लिखा अनुबंध तुम्हीं बताओं तोड़ दें, बिन डोरी के बंध ।
वचन भंग तुम कर रहे, मुझे न देना दोष उन वादों से है भरा, स्मृतियों का कोष ।
लिखा रेत पर नाम जब, सरिता तट के पार तुम समझे थे खेल तब, हमने समझा प्यार ।
खिड़की तुमने बंद की, गलियाँ की सुनसान खुले द्वार हमने रखे, अंदर एक मकान ।
दिल से दिल का जब हुआ, वो सौदा इकबार मना रहे हैं आज तक, दिल में ही त्यौहार ।
आँसू रोए रात भर, तुम जागे जिस रात दूल्हा-दुल्हन देखकर, सजी-धजी बारात ।
प्रणम्य, 111, राम रहीम कॉलोनी राऊ, इंदौर, मध्यप्रदेश
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