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उ सिर पर सिर आते नज़र चन्द्रसेन विराट
कोई भी सुनता नहीं, किसको दें आवाज़ गूँगा बहरा हो गया, क्या यह सभ्य समाज ।
ख़ुशबू पर भी धर्म को, थोप रहा इंसान मंदिर में महके गुगल, मस्ज़िद में लोबान ।
निज बल, निज शस्त्रास्र से, एकाकी निःसंग हर कोई लड़ता मिला, अपनी अपनी जंग ।
मनुज बुरा भी, ठीक भी, उसकी आदिम टेव वह आधे में दैत्य है, वह आधे में देव ।
सिर ही सिर आते नज़र, जिधर देखिए आज जनसंख्या विस्फोट यह, ख़ुद को ख़ुद का शाप ।
घात लगा बैठे सभी, पाल रहे निज पेट मौका मिलता जब जिसे, कर लेता आखेट ।
सच तो यह हम सा नहीं, कोई घोर अघोर आदम की संतान हम, फिर भी आदमखोर ।
असहज, अकरुण, अतिशयी, आत्यंतिकता ग्रस्त अधुनातननर हो गया, अति यांत्रिक, अति व्यस्त ।
समय, 121, बैकुंठ धाम कॉलोनी ओल्ड परासिया, खजराना कोठी आनंद बाजार के पीछे, इंदौर - 452018
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