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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  छंद

 उ

 

किरण पखेरु सांध्य के


आचार्य भगवत दुबे

 

किरण पखेरु सांध्य के, बैठे तरु की डाल

फुन्गी चूज़ों-सी चहक, चोंच खोलती लाल ।

 

अस्ताचल घाटी भरे, माँग बीच सिन्दूर

चरणों पर सूरज झुका, हो मन्मथ से चूर ।

 

प्राची पर वधु चंद्रमा, पश्चिम से वर सूर्य

खगदल का कलरव हुआ, शाखोच्चारी सूर्य ।

 

सूरज नतमस्तक हुआ, देख सिन्दूरी शाम

थके पथिक ने कर लिया, घाटी में विश्राम ।

 

पूनम-चंद्रोदय सहित, निरख सूर्य-अवसान

तुला प्रतीची-पूर्व के, पलड़े हुए समान ।

 

तम से अंतिम साँस तक, लड़ा शिथिल दिनमान

अस्ताचल पर गिर पड़ा, होकर लहूलुहान ।

 

आचार्य भगवत दुबे

पिसनहारी-मढ़िया के पास

जबलपुर, मध्यप्रदेश - 482005

 

 

  छंदकार

गीत

- आनंदी सहाय शुक्ल

- ज्ञानेन्द्र साज

- अनिल अनवर

- रामदयाल

- डॉ. अजय पाठक

नवगीत

- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

- नईम

- ऋषिवंश

- विद्यानंदन राजीव

- इंदिरा मोहन

ग़ज़ल

- रईस अहमद 'फ़िगार'

- अग्निवेश शुक्ल

- तुली फकीरचंद जलंधरी

- सुल्तान अहमद

- विज्ञान व्रत

दोहे

- चंद्रसेन विराट

- आचार्य भगवत दुबे

- पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

- प्रभु त्रिवेदी

- जितेन्द्र जौहर

माह के छंदकार

-- कैलाश गौतम

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