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उ
किरण पखेरु सांध्य के आचार्य भगवत दुबे
किरण पखेरु सांध्य के, बैठे तरु की डाल फुन्गी चूज़ों-सी चहक, चोंच खोलती लाल ।
अस्ताचल घाटी भरे, माँग बीच सिन्दूर चरणों पर सूरज झुका, हो मन्मथ से चूर ।
प्राची पर वधु चंद्रमा, पश्चिम से वर सूर्य खगदल का कलरव हुआ, शाखोच्चारी सूर्य ।
सूरज नतमस्तक हुआ, देख सिन्दूरी शाम थके पथिक ने कर लिया, घाटी में विश्राम ।
पूनम-चंद्रोदय सहित, निरख सूर्य-अवसान तुला प्रतीची-पूर्व के, पलड़े हुए समान ।
तम से अंतिम साँस तक, लड़ा शिथिल दिनमान अस्ताचल पर गिर पड़ा, होकर लहूलुहान ।
पिसनहारी-मढ़िया के पास जबलपुर, मध्यप्रदेश - 482005
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