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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। व्यंग्य ।।

 

 

ग्रेज़ों के खाने कमाने का दिन


अविनाश वाचस्पति

 

हिन्दी वाले जिस दिन का इंतजार साल भर करते हैं। लो वो भी आ गया। आज एक और हिन्दी दिवस है। गए गुजरों सालों पर नज़र डालते हैं तो बीत गए कल की तुलना में अपने आज को बेहत्तर पाते हैं और भविष्य को डायमंड जड़ित देखते हैं। बीते कल में हिन्दी की खूब दुर्गति हुई है। उसी कल में यह सरकारी कामकाज की राजभाषा भी बनी और राष्ट्रभाषा बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर है। मुकाम बस हासिल होने ही वाला है। बीते कल में ही इसे हिंग्लि बनने पर खूब आलोचना झेलनी पड़ी है। पर हिन्दी में अँग्रेज़ी के शब्द ले लेकर ही हिन्दी वालों ने अँग्रेज़ी की जड़ें काट डाली हैं। उसकी शब्दों की सेफ भी सुरक्षित नहीं रही है। उसमें भी हिन्दी ने सेंध लगा डाली है। अँग्रेज़ी के शब्द भंडार रीत रहे हैं। खु हो लो अब अँग्रेज़ी के दिन बीत रहे हैं। जब अँग्रेज़ी माल हिन्दी में अवेलेबल है तो अँग्रेज़ी क्यों लाईक की जाएगी ?

 

ई मेल पर अब तो खैर हिन्दी आ गई हैं जब नहीं आई थी तब भी हिन्दी के दीवाने हिन्दी में ई मेल भेजते रहे हैं। हिन्दी के शब्दों को रोमन में लिखकर जो जुगाड़ फिट किया वो हिट रहा है। मजबूर होकर हिन्दी के आगे अँग्रेज़ी ने घुटने टेक दिए हैं। ई मेल पर और नेट पर भी अब हिन्दी अपनी प्रखरता से शोभायमान हो रही है। सर्च इंजन भी हिंदी में, ब्लॉग हिन्दी में, विविध प्रकार के फोंट सब कुछ सर्वत्र हिन्दी में उपलब्ध है। हिन्दी अब सहज और सरल हो गई है। टीवी पर हिन्दी के चैनलों की धूम है। हिन्दी में वो सब माल ताज़ा मिल रहा है जिसके लिए अँग्रेज़ी पर निर्भर रहना पड़ रहा था, अब एकदम चकाचक ताज़ा रसभरा आपकी अपनी भाषा में मौजूद है।

 

मल्लिका और बिपाशा ने फिल्मों में हिन्दी के झण्डे फहरा दिए हैं। किसकी मजाल है उन्हें लहराने से रोक सके। उनकी लहर का जादू सिर चढ़कर अब हिन्दी में बोल रहा है। कुछ ही पल की देर है अब अँग्रेज़ी वाले घिघियाएंगे। कुछ ही बरस बाकी हैं जब अँग्रेज़ी प्रेमी मिलकर अँग्रेज़ी दिवस मनाया करेंगे। अँग्रेज़ी सप्ताह, पखवाड़े, माह मनाकर खुशी पाएंगे और अँग्रेज़ी साल मनाने के लिए तरस जाएंगे। अँग्रेज़ी के लिए पुरस्कार प्रतियोगिताएं रखी जाएंगी। अँग्रेज़ी के बुरे दिन बस आ गए समझिए।

 

अँग्रेज़ी के चैनल और अखबार इतिहास की बकवास बनकर विस्मृतियों में खो जाएंगे। रद्दी बेचने के लालच में भी खरीदने वालों का टोटा पड़ जाएगा। चाहे कितनी ही बार कंट्रोल के साथ एफ दबाकर ढूढते रहो, कुछ हाथ नहीं लगेगा। हाथ तो कंप्यूटर कमांडो का विकल्प भी नहीं लगेगा। फिर कंप्यूटर पर काम करने के लिए हिन्दी का ज्ञान अपेक्षित होगा। बिना हिन्दी के कंप्यूटर का पत्ता (बटन) भी नहीं हिलेगा। हिंदी के ललाट पर सफलता की बिंदी चमक रही होगी और अँग्रेज़ी चिंदी चिंदी होकर अपनी फटेहाली पर बिसूर रही होगी।

 

हिन्दी धूम वन, टू और थ्री होगी। अँग्रेज़ी को कोई नहीं पूछेगा। इंग्लि डे पर अँग्रेज़ी वाला कहता मिलेगा ईट एंड अर्न डे आ गया है। फिर हिंदी में बोलेगा खूब खा लो और कमा लो। फिर साल भर बाद ऐसा मौका आएगा। अँग्रेज़ीदां के अँग्रेज़ी बोलने पर खूब थुक्का फजीहत हुआ करेगी। उन्हें नसीहतें मिला करेंगी कि सावधानी रखो। सावधानी हटी दुर्घटना घटी। स्कूलों में अँग्रेज़ी बोलने पर चालान हुआ करेंगे। पर खु न हों ट्रैफिक पुलिस वाले, उनको जुर्माना करने के अधिकार नहीं मिलेंगे। हिन्दी की अपनी पुलिस होगी जो स्थिति पर निगाह रखेगी और जुर्माना करेगी और अपनी दयालुता दिखाते हुए अपराधी को सबसिडी के तौर पर वापिस लौटा देगी। हिन्दी वाले अँग्रेज़ी वालों की तरह कठोर दिल नहीं हुआ करते हैं। रहमदिल हैं सिर्फ रहम किया करते हैं। पकड़ते हैं अँग्रेज़ी बोलते हुए, पर हिंदी सिखाकर छोड़ दिया करते है।

 

हिंदी यूनेस्को की भाषा बन चुकी है और जिस दिन संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनेगी। उसी दिन विश्व पर हिन्दी का परचम फहरा उठेगा जो किसी के रोके न रुकेगा। विश्वभर के हिंदीप्रेमी महसूस करने लगे हैं कि उनकी एक सक्त विश्व हिंदी फेमिली है जो सभी भाषाओं से घुली-मिली है और अँग्रेज़ी लगती लिजलिज़ी है।

 

अविना वाचस्पति

साहित्यकार सदन, 195 सन्त नगर,

 नयी दिल्ली 110065

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