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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। व्याकरण ।।

 

 

एक शब्द

 

मिलना-मिलाना


डॉ.गंगाप्रसाद बरसैंया

 

मिलाना-अर्थात् दो अलग टुकड़ों को जोड़ना, पर इतना कहना ही पर्याप्त नहीं है। किसी चीज़ के दो टुकड़ों को जोड़कर तो मिलाया जाता है पर उन्हें जोड़ने के लिए गोंद आदि किसी की ज़रूरत होती है लेकिन बहुत सा मिलाना ऐसा है जहाँ इसकी आवश्यकता नहीं होती । दो व्यक्ति हाथ मिलाकर परस्पर नमस्कार भी करते हैं और दो शत्रु या दल भी हाथ मिला लेते हैं । दो पहलवानों को अखाड़े में हाथ मिलाते देखा जा सकता है। इन सभी का हाथ मिलाना एक-सा नहीं है। अपराध और भ्रष्टाचार के मामले में अपराधी, व्यापारी अधिकारी और नेता अक्सर हाथ मिलाते देखे जाते हैं। कुछ हाथ मिले हुए दिखते हैं और कुछ अदृश्य रहते हैं। इसी प्रकार आँखें भी मिलती हैं या मिलाई जाती हैं। प्रेमी-प्रेमिका की आँखें मिल जायें तो आनन्दातिरेक में मन बाँसों उछलने लगता है, पर यदि जंगल में शेर से आँखें मिल जायें या डाकुओं से मिलना हो जाये तो प्राण संकट में पड़ जाते हैं । वैसे छोटों का बड़ों से आँखें मिलाना बेदअदबी मानी जाती है। कई बार दादा किस्म के लोग बड़े रुआब से कहते हैं उसकी हमसे आँखें मिलाने की हिम्मत कैसे हुई  ? उसकी यह हिम्मत कि हमसे आँख मिलावे, अर्थात् बराबरी करे। वैस शेर से जब शेर की आँखें मिलती हैं तो लड़ाई अवश्यंभावी है। परन्तु जब प्रेमियों का परस्पर मिलना होता है तो आनन्द की कोई सीमा नहीं रहती है। प्रेमी और गपोड़ी लोग यहाँ-वहाँ की बातें करके धरती-आसमान मिलाते रहते हैं। धरती-आसमान मिलाना कल्पना भी है और असंभव कार्य भी। लेकिन जब कोई जबरा धमकी देकर कहता है कि मैं तुम्हें मिट्टी में मिला दूँगा तो उसका आशय होता है कि मैं तुम्हें बरबाद कर दूँगा। लोग मिट्टी की जगह धूर में मिलाना ज्यादा सुविधाजनक मानते हैं।

 

जाति-बिरादरी में पंचायत व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण रही है। किसी ने कोई अपराध किया कि उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया गया। क्षमायाचना करने पर, दंड अदा करने पर उसे बिरादरी में मिलाया जाता है । दंड के साथ जो वह सामूहिक भोज देता है उसे बिरादरी में मिलाना कहा जाता है। यहाँ जीवित व्यक्ति को ही नहीं मृत व्यक्ति को भी मिलाया जाता है। श्राद्ध पक्ष में किसी पूर्वज के प्रसंग में जो पूजा आदि के साथ भोज दिया जाता है उसे पितरों में मिलाना कहते हैं। बिरादरी में मिलाना और पितरों में मिलाना में सचमुच ज़मीन-आसमान का अन्तर है।

 

हाथ मिलाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है मन का, हृदय का मिलना । यदि हृदय न मिला तो हाथ मिलाना निरर्थक है। कई लोग आत्मा से मिने-मिलाने को ज्यादा प्रभावशाली मानते हैं। वैसे भाई-भाई को भी मिलाया जाता है। सहज मिलना तो रोज हाता है पर बिछुड़-भटक कर मिलना या लड़ाई-झगड़ा, बुराई-दुश्मनी में मिलना- मिलाना ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग हुए भाइयों का मिलाना बड़ी बात है। साधु संत भक्तों को भगवान से मिलाते हैं। इसमें साधना और समर्पण ज़रूरी है। कुछ लोग डंके की चोट पर मिलते हैं। इसमें साधना और समर्पण ज़रूरी है। कुछ लोग डंके की चोट पर मिलते हैं और कछ लोग छुपकर मिलते हैं। छुपकर मिलने वाले वही लोग होते हैं जो मर्यादा का उल्लंघन करते हैं या अपराध करते हैं। छुपकर मिलने में कोई राज या रहस्य छिपा होता है।

 

कुछ लोग अपने मूर्खतापूर्ण आचरण से घर के धान पयारों में मिलाकर घर-परिवार को कठिनाई में डालते हैं। यानी सम्पत्ति बरबाद कर अभावों में जीते हैं। और कुछ लोग घर-द्वार छोड़कर देह की भी चिन्ता नहीं करते । उनका मानना है कि य काया मिट्टी की है और मिट्टी में ही मिल जायेगी। कुछ लोग जब अपने चरित्र और आचरण से जीवंत और शरीर दोनों को बरबाद करते हैं तब लोग कहते हैं सोने की काया मिट्टी में मिला दी। वैराग्य से मिट्टी में मिलाना और दुराचरण से मिट्टी में मिलाना, में बहुत अंतर है।

 

मिलने-मिलाने के भी स्तर हैं-दूध-पानी  की तरह मिलना, घी शक्कर की तरह मिलना सुखद भी है और स्वास्थ्यवर्धक भी । पर घी और शहद को मिलाना श्रेयष्कर नहीं माना जाता। कहते हैं दुश्मन-दुश्मन आपस में हाथ ऊपर से भले मिला लें पर भीतर से कभी नहीं मिलते । जैसे केर-बेर का मिलना दुखदाई ही होता है। लोग उदाहरण देते हैं - फलां-फलां का मिलना केर-बेर का मिलना है। विपरीत प्रकृति के लोग भला मिलकर कैसे रह सकते हैं ? मिलने-मिलाने के पूर्व खूब सोच-विचार करना ज़रूरी है।

 

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

एम.आई.जी. 12

चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश 

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