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सृजनगाथा


 

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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।।वातायन।।

 

 

महान भारतीय गणितज्ञ के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास


डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 

नवरी 1913 की एक सुबह। अपने समय के एक बहुत बडे ब्रिटिश गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को भारतीय डाक टिकिट लगा एक रहस्यमय लिफाफा मिलता है। लिफाफे में है नौ पन्नों का एक बिखरा-बिखरा–सा पत्र। 23 साल के एक स्व-घोषित गणितीय जीनियस ने लिखा है कि उसने एक सार्वकालिक गणितीय गुत्थी को करीब-करीब सुलझा लिया है। हार्डी के कैम्ब्रिज के अनेक साथी कहते हैं कि यह पत्र फर्जी है, इसे गम्भीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन न जाने क्यों हार्डी को लगता है कि पत्र लेखक, भारतीय क्लर्क श्रीनिवास रामानुजन की बातों में दम है। वे अपने साथी लिटिलवुड और पत्नी एलिस के साथ मद्रास जा रहे एक युवा प्राध्यापक नेविल की मदद लेकर इस रहस्यमय रामानुजन के बारे में और जानकारी जुटाने तथा अगर सम्भव हो, उसे कैम्ब्रिज बुलाने के लिए तत्पर हो उठते हैं। हार्डी का यह निर्णय एक ऐसा निर्णय था जिसने न केवल उनकी और उनके दोस्तों की बल्कि पूरे गणित-इतिहास की ही धारा बदल डाली।

 

एक जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और एक अनजान तथा औपचारिक शिक्षा से लगभग वंचित गणितीय जीनियस की विस्मयकारी लेकिन त्रासद अंत वाली सत्य कथा पर आधारित डेविड लीविट्ट का ताज़ा उपन्यास ‘द इण्डियन क्लर्क’ इतिहास के एक छोटे-से अंश को एक भावपूर्ण, मंत्रमुग्धकारी कथा में रूपांतरित करने का रोचक प्रयास है। इससे पहले डेविड लीविट्ट के ग्यारह उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘द बॉडी जोनाह बॉय्ड’, ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ और ‘ईक्वल अफेक्शन’ खासे चर्चित भी रहे हैं। ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ एक गलत वजह से भी चर्चित रहा था। जाने-माने लेखक स्टीफेन स्पेण्डर ने इस पर नकल का आरोप लगाते हुए मुक़दमा ठोक दिया था और लीविट्ट को इसके कुछ अंश हटाने पडे थे।

 

ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित ‘द इण्डियन क्लर्क’ का आरम्भ 1936 की एक घटना से होता है। एक बूढे प्रोफेसर, जाने-माने गणितज्ञ जी। एच। हार्डी को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने उनके मित्र श्रीनिवास रामानुजन के जीवन और कार्यों पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया है। रामानुजन को एक ऐसी विलक्षण गणितीय प्रतिभा के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है जिसका सानी कई शताब्दियों में भी नहीं है। हार्डी से दस साल छोटे रामानुजन मद्रास में गरीबी और गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे थे। उपनिवेशी शासन भला उनकी तरफ ध्यान क्यों देता? लेकिन हार्डी और उनके मित्रों के प्रयास से रामानुजन को यह अवसर मिला कि स्वदेश में उनकी जिस प्रतिभा को अनदेखा किया गया, उसका लोहा वे सारी दुनिया से मनवा सके। रामानुजन 1914 से 1919 के जिस काल खण्ड में इंग्लैण्ड में रहे वही इस उपन्यास का सबसे बडा हिस्सा है।

 

उपन्यास का नायक तमिल ब्राह्मण श्रीनिवास रामानुजन इंग्लैण्ड को बहुत रुचिकर और ऊष्मापूर्ण नहीं पाता। उसे वहां की सब्ज़ियां और मसाला रहित खाना बेस्वाद लगता है। लेकिन गणित उसके लिए आध्यात्म है, गणित के समीकरण मानो दैवीय अभिव्यक्ति हैं। हार्डी का सोच उससे भिन्न है। वे मानते हैं कि गणित और ईश्वर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं। इन हाड-मांस के वास्तविक चरित्रों के साथ ही हैं दो और चरित्र जिनके सृजन में रचनाकार ज़्यादा छूट ले सका है। लेविस की पत्नी एलिस और हार्डी की विरूपित बहन गरट्रूड। एलिस रामानुजन से प्यार करने लगती है और गरट्रूड अपने विख्यात भाई की छाया और स्त्री होने के अभिशाप के घेरे में सिमट कर रह जाती है।

 

पहला विश्वयुद्ध न केवल बाह्य साम्राज्य की चूलें हिलाता है, वह इन चरित्रों के पारस्परिक रिश्तों की नीवों की नज़ाकत को भी उजागर करता है। युद्ध के कारण  कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय न केवल अस्पताल में तब्दील हो जाता है, उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता पर प्रचार-तंत्र कब्ज़ा भी कर लेता है। विख्यात दार्शनिक बरट्रैण्ड रसेल को उनके शांतिमय विचारों के कारण जेल भेज दिया जाता है और हमारे जी। एच। हार्डी समझौता परस्ती  का रास्ता अख्तियार कर अपनी प्रोफेसरशिप बचा पाते हैं। कहना अनावश्यक है कि डेविड लीविट्ट ने एक ऐसा विषय चुनने का दुस्साहस किया है जो उपन्यास की विधा के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। उपन्यास की कथा बार-बार शिथिल पडती है। ऊपर से उनका विपुल शोध, जिसकी वजह से उपन्यास कभी-कभी जीवनी का आभास देने लगता है। लेकिन बावज़ूद इन बातों के, जब लीविट्ट गणित और उसके विरोधाभासों को मानवीय रिश्तों के सामने रखते हैं तो एक मार्मिक रूपक यह उभरता है कि कैसे अत्यंत सशक्त रिश्ते तर्क और कल्पना का अतिक्रमण कर जाया करते हैं।

 

इस उपन्यास का जितना महत्व अब अफसाना बन चुके श्रीनिवास रामानुजन के जीवन, संघर्ष और योगदान को उभारने में है, उतना ही बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इंग्लैण्ड के जीवन की बारीक पडताल में भी है। हम भारतीयों को तो लीविट्ट का विशेष रूप से आभार मानना चाहिए कि उन्होंने इस विलक्षण गणितीय प्रतिभा के जीवन पर इतने गहन शोध के साथ यह उपन्यास रचा है।

  दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

संपादक, इंद्रधनुष

जयपुर, राजस्थान

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 कृति

The Indian Clerk: A Novel

लेखक

David Leavitt

प्रकाशक

omsbury USA

मूल्य

US $ 24.95

पृष्ठ

496

 

 

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