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पतझड और शीत की लहर
लावण्या शाह

लावण्या
शाह - लावण्या
शाह हिंदी के शलाका पुरुष पं. नरेंद्र शर्मा की पुत्री हैं।
वर्षों से अमेरिका में रह रही हैं । गीत और छंद के अनुशासन में
निरंतर सक्रिय और रचनात्मक लेखन से नयी प्रवासी पीढ़ी का
मार्ग प्रशस्त कर रही हैं । इन दिनों अपने पिता स्व. नरेंद्र
शर्मा समग्र को प्रकाशित करने के ऐतिहासिक कार्य में संलग्न
हैं । बड़ी पीढी के लिए वे मिसाल हैं कि कैसे अंतरजाल पर हिंदी
की प्रतिष्ठा स्थापित की जा सकती है, जो उनके हिंदी ब्लॉग
अंतरमन से साबित होती है । प्रस्तुत है - सृजनगाथा के
पाठकों के लिए 'अमेरिका
की धरती से' नामक कॉलम
- संपादक
साल के अंतिम महीनों की कुदरत
प्रदत्त सौगात है हम मनुष्यों के लिये
सितम्बर माह पूरा हुआ और अक्तूबर भी भागा
जा रहा है । इस वर्ष ठंड का मौसम कहीं ओझल
हुआ
सा लग रहा है अन्यथा,
यहाँ तक आते आते तो सारे पेड
रंगों की चुनरिया ओढे धीरे धीरे पतों को
जमीन पर बिछाते दीखलाई पडते।
मेरे
आवास के ठीक सामने
एक
सुदर्शन पेड है। पाँच,
त्रिकोणाकार की पत्तीयाँ
सजाये एक ही
पत्ती में,
लाल,
कत्थई,
मरुन,
केसरी,
पीला,
हरा
इतने सारे रँगों का सम्मिश्रण लिये,
कुदरत का करिश्मा-सा लगता है वो
मुझे !
फिर सारे पत्ते,
तेज़ हवाओँ के साथ,
टूट कर,गिरने
लगते हैं और पेड,
सिर्फ शाखोँ को सम्हाले,खडा
ठिठुरने लगता है। इसी पतझड के साथ नवरात्र का त्योहार भी आ
जाता है।
अमरीका
के हर शहर में भारतीय
लोग,
मिल जुल कर,
माँ जगदम्बा की प्रतिष्ठा करते हैं।
मिट्टी
के कलश में दीप रखा जाता
है,
जिसके छिद्रों से पावन प्रकाश बाहर आता रहता है और
सुहागिन की नत काया को
आशिष देता है।
माता की चौकी भी सजती है। श्रद्धालु भक्त ९ दिनों तक उपवास भी
करते हैं तो स्त्रियाँ और
बच्चे गरबा मेंतल्लीनता से,
दूर भारत के गुजरात के गाँवों में गाये गरबे
उसी
भक्ति भाव से गाते हुए दीखलायी देते हैं । अभी गणेशोत्सव
संपन्न हुआ और अब,
साक्षात
माँ भवानी का आगमन हुआ
है। आरती के बाद,
प्रसाद भी बाँटा
जाता है।
मँदिरों की शोभा देखते ही बनती है।
बँगाली
कौम के लोग दुर्गोत्सव
में माँ दुर्गा के स्वरुप की स्थापना करते हैं । यही तो भारतीय
सनातन धर्म की रीत
है
जो
हर जगह अपना अस्तित्व नये
सिरे से,
बना कर दुबारा पल्लवित
हो जाती
है। अमेरीका में भी इसी ऋतु में अलग किस्म के त्योहार मनाये
जाते हैं । जिसका नाम भी बडा अज़ीबोग़रीब है !
जी हाँ,
ये है
-
हालोईन का त्योहार !
३१ अक्तूबर
,
अंतिम रात्रि को
आइरीश मूल के लोग,
१ नवम्बर से पहले अपने मृतक पूर्वजों के लिये
मोमबतीयाँ जला
कर,
प्रार्थना किया करते थे। जिसकी नींव रखी गयी थी,२०००वर्षों
से पहले !
"समहेन"
केल्टीक याने आयर्लैन्ड
के लोगों के यम देवता हैं और उनकी मान्यता थी कि मृतक
आत्माएँ १ नवम्बर के अगली रात्रि को धरती पर लौटतीं हैं -
सो,
तैयार हुई फसल की कटाई के
बाद,
विविध प्रकार के परिधानों मेंxसज
कर,
बडे कद्दूओं को काट कर,
उस के भीतर जगह करने के बाद,
जली हुई मोमबतीयाँ रखीँ जातीं थीं कि जिससे प्रेतात्मा की बाधा
ना हो
और दूसरे दिवस की सुबह,
हर आत्मा की भलाई
के लिये पूजा करके बिताई जाती थी।
७ वीं शताब्दि के बाद औयरलैन्ड
से चल कर समूचे युरोप में ये प्रथा,
प्रचलित हुई
और जब वहीँ से प्रवासी,
अमरीका
भूखंड बसाने आये
तो
अपनी रीति रीवाज,
रस्मों को
त्योहारों को भी साथ लेते आये। आज अमरीका में बीभत्स,
भयानक,
वेश-भूषा,
पहन कर
लोग एक दूसरे को डराते हैं तो कई सारे मनोविनोद के लिये,
तस्कर,
खलासी,
नाविक,
नर्स,राजकुमारी,
कटे सर से झूठ-मूठ का रक्त बहता
हो ऐसे या डरावने मुखौटे लगा कर,
सफेद,
लाल,
नीले पीले,
हरे ऐसे
नकली बाल लगा कर, विविध
रुप धर लेते हैं और
अँधेरी रात में खुद डर कर मजा लेते हैं
या
औरों को डराने के प्रयास में
तरकीब करते हैं।
छोटे
बच्चों के साथ उनके माता
पिता भी रहते हैं
हर
घर पर दस्तक देकर बच्चे
पूछते हैं
, "
ट्रीक ओर ट्रीट
? "
मतलब,
कोई करतब देखोगे या हमें
खुश करोगे
? तो
घर से लोग बाहर निकल कर,
चोकलेट,
गोली,
बिस्कुट इत्यादि
उनकी झोली में डाल देते हैं ।
ख़ूब
सारी केन्डी मिल जाती है
बच्चों को !
कई बुरे सुभाव को लोग,
बच्चों
को परेशान भी करते हैं
इसलिये
टी. वी. पर ख़ूब
सारी,हिदायतेँ
दीँ जातीँ हैं - खैर ! जैसा देश,
वैसे त्यौहार !
अब भारतीय लोग नवरात्र के साथ
साथ हेलोईन भी मना ही लेते है
और
द्वार पर आये बच्चों का मन
तोडते नहीं
–
विश्व का सबसे
विशालकाय कद्दू
 जानते
हैं आप - सबसे विशाल कद्दू
१६८९ पाउन्ड का
है, जिसे
"जो जुत्रास" नाम
के एक शख्श
ने, सितम्बर
२९,
२००७ के दिन,
मेसेचुसेट्स प्रांत मेँ दर्ज करवा कर,
विश्व
के सबसे विशालकाय कद्दू
उगानेवाले का ईनाम जीत लिया । आजकल
अमरीका के हर मोल की दुकान
पर
या
घरोँ की सामने हर घर की ड्योढी
पर
केसरी
रंग के कद्दू,
मक्का,
और खेत
में रखते हैं वैसा गुड्डा सजाया दीख जाता है।
और,
इस तरह परदेस में रहते हुए
भी,
धरती माता और जगजन्नी अम्बिका का
प्रसाद मिल जाता है।
अब चलूँ...माँ की आरती का पावन अवसर
है । आप सभी को,
"अमरीका
की पाती" "जय माता दी"
कहते हुए
विदा लेती है ।
फिर
मिलेंगे ..
तब तक,
भगवती प्रसन्न रहे !
लावण्या
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