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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। संस्मरण ।।

 

 

पींकिग रेडियो जिन्हें कोसता था


डॉ. विमल कुमार पाठक

 

 (गीतकार नेपाली जी के झिलमिलाते कुछ चित्र)  

बिलासपुर में 1959 के गणेशोत्सव में सर्वप्रथम श्री गोपाल सिंह नेपाली को सोमाभाई काशी भाई फ़र्म के बीड़ी निर्माता श्री पुरूषोत्तम भाई पटेल के जूना बिलासपुर स्थित निवास एवं दूकान में आयोजित कवि सम्मेलन हेतु आमंत्रित करने की जिम्मेदारी, भारतेन्दु साहित्य समिति के प्रधान सचिव एवं छत्तीसगढ़ी के महाकवि पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र ने मुझे सौंपी थी। मैंने पत्र लिखा और एक सप्ताह में स्वीकृति आ गई । नियत तिथि को वे बाम्बे-हावड़ा मेल से बिलासपुर पहुँचे। रेल्वे स्टेशन में उपस्थित स्वागतार्थियों से उन्होंने पूछा-आप लोगों में विमल पाठक कौन हैं ? लोगों ने बतलाया कि वे एक कवि सम्मेलन के लिए भाटापारा गये हैं, कल आयेंगे ।

 

उनसे कहिएगा, मुझसे मिलेंगे। मैं शाम को जब पटेल जी के यहाँ गया तो उन्होंने कहा नेपाली जी कई बार आपको पूछ चुके, जाइये मनोहर टाकीज़ में उनके गीतों वाली फिल्म लगी है वहाँ के मैनेजर तिवारी साहब उन्हें अपने साथ घुमाने ले गए हैं। दो-तीन मित्रों के साथ में पहुँचा । सामान्य कद, घुंघराले बाल, आकर्षक चेहरा, बुश-शर्ट के ऊपर के तीन बटन खुले हुए और अन्दर की सफेद बनियाइन-गेरवडीन के पेन्ट में वे अति साधारण व्यक्ति लगे। मैनेजर ने मेरा परिचय कराया। पूछ बैठे कल रात से हम यहाँ हैं, बुलाकर खुद गायब हो गये थे, अभी आ रहे हो, कहाँ कहाँ कविताएं पढ़ आए ? पहली मुलाकात में ही ऐसी आत्मीयता ? मैं तो फिल्मी गीतकार, बम्बइया कवि समझ कर सकुचाते हुए गया था। उन्होंने गले लगाते हुए कहा था- भाई तुम्हारी लिखावट और पत्र की भाषा से मैं प्रभावित हो गया था। मिलकर अच्छा लग रहा है।

 

रात दस बजे कवि सम्मेलन आरंभ हुआ। नेपाली जी के साथ रायपुर के वीर रस के कवि ठाकुर हरिहर बख्श सिंह हरीश और ग्वालियर निवासी युवा गीतकार शंकर सक्सेना कवि के रूप में और वयोवृद्ध काव्य रसिक, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश योगेश्वर प्रसाद मिश्र (रीवां निवासी) अध्यक्षता करने मंच पर उपस्थित थे। दर्शक दीर्घ में बिलासपुर के सभी प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार,  नये-पुराने साहित्यकार, काव्य प्रेमी श्रोता बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

 

विप्र जी, प्यारेलालजी गुप्त, पं. सरयूप्रसाद त्रिपाठी, पं.राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, श्रीपति वाजपेयी आदि के साथ मैं भी सामने की पंक्ति में बैठे हुए काव्य रस में डूबते हुए नेपाली जी की अधिकतम रचनाओं को सुनते जा रहे थे। उनके चार पाँच गीतों के बाद हरीशजी और सक्सेनाजी दो दो रचनाएं सुनाते और फिर नेपाली जी के गीतों की सरसता में पूरा श्रोता समुदाय डूबते, भींगते मज़े लेते रहा। अचानक किसी ने कहा- बिनोबाजी वाली कविता सुनाइये, नेपालीजी !

 

 नेपालीजी ने कहा- सुनिये शीर्षक है- भूदान के याचक से। श्री राजेन्द्र शुक्ल जी तब युवा कांग्रेसी नेता, भूदानी और सर्वोदयी नेता के रूप में बहु चर्चित हस्ती थे, वकालत कर रहे थे और कवि के रूप में भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने प्रारंभ में ही टोका- कृपया इस कविता को नहीं सुनाईये। नेपाली जी ने कहा मेरी बातें भी तो सुन लीजिए और उन्होंने कविता प्रारंभ कर दी-। शुक्लजी के साथ सर्वोदयी, कांग्रेसी और पचासों भूदान कार्यकर्ताओं ने शोर शराबा, हल्ला-गुल्ला आरंभ कर दिया। व्यवधान देख कवि ने अध्यक्ष, न्यायाधीश मिश्राजी से पूछा बन्द कर दूँ ? मिश्राजी ने न्यायायीन व्यवस्था दी- आप अपनी बात कहिए जिन्हें सुनना है, सुनें, नहीं सुनना है तो शांति बनी रहने दें, अपने घर चले जाएं । शुक्लजी के साथ सौ-सवा सौ लोग नाराज़गी व्यक्त करते हुए कवि सम्मेलन का बहिष्कार करके अपने अपने घर चले गए। बाद में घंटों चला कवि सम्मेलन और नेपालीजी सभी श्रोताओं के दिल-दिमाग में छा गए।

 

संपादकों ने जब क्षमा-याचना की

मैं सन् 1962 में एम.ए. की पढा़ई के लिए रायपुर आ गया था । दिन में, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में किशोरावस्था में महान् क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद जी के साथ रहकर उनकी सेवा करने का सौभाग्य पाये पं. विश्वानाथ वैशम्पायन के साप्ताहिक विचार और समाचार के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत था। रायपुर के राठौर चौक के कवि सम्मेलन के चर्चित आयोजक रवि शंकर राठौर ने मुझसे कहा कुछ ऐसे कवि बुलावाइये जिन्हें सुनकर रायुपर के श्रोता धन्य हो जाएं । मैंने उनकी ओर से गोपाल सिंह नेलाजी, वीर रस के कवि श्री देवराज दिनेश और अवधी के हास्य रस के कवि श्री रमई काका को आमंत्रित किया। तीनों पधारे । बहुत ही बढ़िया और यादगार कवि सम्मेलन हुआ। उन तीन के साथ हम यानी छत्तीसगढ़ के नंदूलाल चोटिया, आनंदी सहाय शुक्ल, नारायणलाल परमार, मुकीम भारती और मैं कुल आठ कवि थे। रात साढ़ दस से प्रातः साढ़े छः बजे तक हजारों लोगों ने कवि सम्मेलन को सुना । सर्वाधिक सुने गए, फरमाईश कर करके नेपालीजी के गीत। दूसरे दिन दैनिक नव भारत में नेपालीजी की कविताओं से अधिक दिनेश और रमई काका पसन्द किए गए, नेपालीजी के गीतों को श्रोताओं ने पसन्द नहीं किया इस तरह के समाचार छपे। हमें तो तारीफ़ या निन्दा की जानकारी नहीं थी लेकिन प्रातः दस बजे उक्त दैनिक के संपादक गोविंद लाल वोरा और एक वरिष्ठ पत्रकार श्री मधुकर खेर नेपालीजी के पास पहुँचे और मेरी उपस्थिति में उन्होंने श्रमायाचना की कि उनके नगर प्रतिनिधि ने किसी व्यक्ति विशेष के इशारे पर वैसा समाचार छापा । उन दोनों ने बतलाया कि वे दस साल पहले छत्तीसगढ़ कालेज के स्नेह सम्मेलन में नेपालीजी को बुलवाये थे और उनकी कविताओं के प्रति भक्ति भाव रखते हैं।

 

मुसाफिरों से क्या माँगे..

मेरे पूछने पर भूदान के याचक से कविता आपने कैसे लिखी के उत्तर में उन्होंने बतलाया था कि वे एक कवि सम्मेलन से लौटते हुए गोरखपुर के रेल्वे प्लेट फार्म में बेंच पर बैठकर सब्जी-पूड़ी खा रहे थे तब एकाएक उनका ध्यान एक आठ-दस वर्षीय गौरवर्णीय एक खूबसूरत किन्तु फटे पेन्ट-शर्ट और बढ़े हुए वेतरतीब रूखे-सूखे बाल वाले पिचके गाल और भूख से परेशान लगने वाले बच्चे की ओर गई जो टकटकी लगाये पूड़ी खाते हुए उन्हें देख रहा था। दस प्रन्द्रह कदम की दूरी पर खड़े उस बालक को उन्होंने पुकारा कहा पास आओ। बालक अनसुनी कर गया । इशारे से बुलाया किन्तु नहीं आया तब नेपालीजी ने ठेले वाले से कहा इस बच्चे को आधी पाव पूड़ी-सब्जी दे दो। बच्चे ने सिर झुकाए हुए पूड़ी सब्जी ली, चुपचाप पीछे लौटा और चार-छै कदम आगे जाकर कवि की ओर पीठ करके पूड़ी सब्जी खाने लगा। यहीं, नेपालीजी ने बतलाया कि मेर हृदय में हाहाकार मच गया। आचार्य विनोबा भावे के द्वारा पूरे देश में गरीबों के बीच बाँटने के लिए भू-दान यज्ञ की अति प्रचारित बात मेरे ध्यान में आई और मैं परेशान होने लगा यह सोचकर कि ऐसे लाखों करोड़ों नंगे-भूखों के लिए भूदान में ज़मीने माँगी जा रही है। पता नहीं इन पड़ती, कछुवापीठा, बंजर ज़मीनों को कब उपजाऊ बनाया जावेगा ? कब इनमें हल चलेंगे, कब बीज पड़ेंगे और कब खेती की जाएगी ? कब फसलें उगेंगी, कब बँटवारा होगा, कब चूल्हे में अन्न पकेगा, कब इस जैसे बालकों के पेट को भोजन मिलेगा और तब  तक क्या यह और इसके जैसे भूख से पीड़ित, कलप रहे लोग जीवित रहेंगे ?.... व्यथित कर दिया इन पश्नों ने मुझे और मेरा आक्रोश विनोबा के प्रति व्यक्त हुआ, आधे घन्टे में पूरी कविता डायरी में उतर गई-

 

किसने तुझसे कहा कि भिक्षा

माँग करोड़ों के लिए।

किसने कहा भीख है मल्हम

जग के फोड़ों के लिए।।

राष्ट्र पले कब तक चन्दों से

लाज बचे क्या पैबन्दों से

मिटे न दुखड़ा इन धंधों से

जूठन छोड़ हृदय का बैभव

मोती भरे नयन से माँग।

मुसाफ़िरों से क्या माँगे

धरती से माँग, गगन से माँग।।

भीख माँगने से निर्धनता

जाती तो क्या बात थी

लेन-देन से क्रांति चली जो

आती तो क्या बात थी

जब जब याचक भिक्षा लेगा

निर्धनता को जीवन देगा

धन की सत्ता अमर करेगा

साम्यवाद को लाना है तो

छोड़ धनी, निर्धन से माँग।।

मुसाफिरों से क्या माँगे..

 

धमतरी में कवि सम्मेलन और नाच

धमतरी में जनसंघी और और कांग्रेसी गणेश उत्सव समितियों ने अपने प्रतिस्पर्धात्मक प्रवृत्ति की तरह एक ही दिन कवि सम्मेलन और बम्बईवाली बाई का नाच लगभग चार फर्लांग की दूरी में एक ही सड़क में किया था। जनसंघियों के कवि सम्मेलन में नेपालीजी और देवराज दिनेशजी आमंत्रित थे। चोटियाजी और मैं बाहर से थे और नारायण लाल परमार, सुरजीत नवदीप, मुकीम भारती तथा भगवती लाल सेन धमतरी से थे। श्री मुकीम नेपालीजी और मुझे धमतरी ले जाने रायपुर आये थे। सवारी बस से जाने का तय था पर अचानक मुकीम ने कहा कि हमारे नगर के प्रसिद्ध सिने व्यवसायी सेठ केशरीमल की कार में एक जगह है, नेपालीजी उसमें चल जायेंगे मैं और विमल बस से आयेंगे। नेपालीजी ने कहा हमने कौन सा पाप किया है कि अकेले उस व्यापारी को हमें सौंप रहे हो, यार हंसते-हंसते लयें मारते साथ में चलेंगे

 

अभनपुर में खोये की जलेबी, समोसे, चाय लेते, उनसे बोलते-बतियाते हम शाम सात बजे धमतरी पहुँचे । हमारी सीट के पीछे सफेद सूती साड़ी, ब्लाउज़ में एक अति साधारण महिला और साथ में धोती कमीज़ पहने एक सज्जन, दोनों पान खाने के शौकीन बैठे हुए थे। एकाएक नेपालीजी ने कान में कहा वह महिला नाचने का पेशा करने वाली है। मुझे वह किसी सभ्रांत परिवार की लगी। मैंने कहा, आप गलत सोच रहे हैं, शायद धमतरी की या आसपास की होगी। मुकीम ने भी कहा कि कोई सामान्य परिवार की होगी किसी के घर मेहमान के रूप में जा रहे होगी, धमतरी की नहीं लगती ।

      

रात हमारे मंच में कवि सम्मेलन आरंभ हुआ और थोड़ी ही देर के बाद कांग्रेसी मंच से नाच का कार्यक्रम शुरू हुआ। दर्शक दीर्घा के अनेक श्रोता-दर्शक आध-पौन घन्टे यहाँ सुनते और फिर नाचने वाली को देखने चले जाते थे । दर्शकों का आना-जाना सतत ज़ारी रहा। मैंने नेपालीजी से कहा उधर नाचने वाली का कार्यक्रम चल रहा है। उन्होंने कहा वही बस वाली, हमसफ़र होगी। चलो देख आते हैं। दोनों गये। मैं अवाक् रह गया। वही महिला थी किन्तु सजी-संवरी, रंग-बिरंगी साड़ी ब्लाउज में थी और पूरी मस्ती से नाच रही थी। नेपालीजी ने कहा विमलजी, हम देश भर घूमते हैं, उड़ती चिड़िया के पंख पहचान लेते हैं।

 

दिनेश सुलाते हैं - मैं जगाता हूँ देश को

कवि सम्मेलन में भी रोचक बात हुई। पंजाब राज्य के घोषित राज्य कवि वीररस के कवि के रूप में विख्यात श्री देवराज दिनेश ने भारत माँ की लोरी सुनाई -

 

सो जा बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है

मेरे युग का प्रहरी पूरा जागरूक है।

बाहर भी कोलाहल, घर के भीतर भी कोलाहल

मैं तो पागल आज हुई जाती हूँ।

 

नेपालीजी ने अपनी बारी आने पर कहा- अभी आप देश के वीरों को सुलाने वाली लोरी सुन रहे थे अब मैं आपको समूचे देश को जगाने वाला गीत सुनाता हूँ -

 

शंकर की पुरी, चीन ने सेना को उतारा

चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा

 

समूचा श्रोता वर्ग वाह वाह कर उठा। उल्लेखनीय है कि भारत-चीन युद्ध के दौरान नेपालीजी की इसी कविता को लेकर उन दिनों चीन का पीकिंग रेडियो अपने हिन्दी और अँग्रेज़ी समाचार बुलेटिनों में अक्सर कोसते हुए उल्लेख करता था कि एक ओर पंचशील के अनुयायी बनकर भारत, शांति की बात करता है और दूसरी तरफ उनका कवि गोपालसिंह नेपाली चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा कहकर युद्ध के लिए लोगों को ललकारता है और पटना रेडियो से भोजपुरी में प्रसारित कार्यक्रम लोहा सिंह का नया मोर्चा में चीन के खिलाफ़ अनाप-शनाप बोला जाता है।

 

बाबूल तुम बगिया के तरूवर

नेपालीजी को मैं रायपुर में अपने निवास स्थान ब्राम्हणपारा में भोजन के लिए आमंत्रित किया । मैं अपनी ससुराल में तब निवासरत था। घर पर मेरी पत्नी, मेरी सास और साले साहब तथा एक साली उस समय थे। लगभग दो तीन घंटे वे घर पर रहे । मुझसे कहे बहु से मिलवाओ।

 

अपनी माँ के साथ वह आई । मिलकर बड़े खुश हुए। पूछे मेरी बाबूल तुम बगिया के तरूवर गीत आप लोगों ने कवि सम्मेलन में सुना ? दोनों ने कहा हम लोग चार छै गीत सुन कर रात में जल्दी लौट आये थे। तो मैं अभी सुनाता हूँ और वे पूरी तन्मयता के साथ सुनाते रहे। दो तीन और गीत सुनाये। मुझसे बोलने लगे भाई, इस घर को देखकर मुझे अपना घर याद आने लगा है। ऐसा ही साधारण और छोटा-सा मेरा भी घर है। छोटा सा आँगन जहाँ चिड़िया चहकती रहती है। मेरे यहाँ छत्तीसगढ़ी व्यंजन पकवान खाकर वे बड़े प्रसन्न हुए । चीला, चौंसेला, ठेठरी, खुरमी के साथ भंटा, मूली, बरबट्टी बीज की खट्टी सब्जी, उन्हें बहुत ही अच्छी लगी। बड़ी आत्मियता से उन्होंने गृह स्वामिनी और बहू की सराहना की - घर का खाना खाया।

 

मैंने यह देखा कि वे प्रतिदिन पोस्ट आफ़िस जाकर पूर्व रात्रि में प्राप्त परिश्रमिक की पूरी राशि अपनी पत्नी श्रीमती वीणा रानी नेपालीजी के पते पर मनीआर्डर से भेजना कभी नहीं भूलते थे।

 

अब अंत में धमतरी में हुए उनके अति उल्लेखनीय और मंत्रियों से भी अधिक श्रद्धा सम्मान सहित अभिनन्दन और स्वागत समारोह के उल्लेख के साथ मैं उनके साथ व्यतीत कुछ महत्वपूर्ण क्षणों की यादों के इस आइने के पट को बन्द करूँगा।

 

वहाँ से कोई चिट्ठी नहीं आयी

कवि सम्मेलन के दूसरे दिन प्रातः काल नारायणलाल परमारजी, सुरजीत, मुकीम, त्रिभुवन पान्डेय जी, सेन और कृष्णकुमार ढांढजी ने कवि से निवेदन किया कि हमारे स्कूल के बच्चे आपका दर्शन करना चाहते हैं। स्कूल की चहार दीवारी के बाहर सैकड़ों कवि भक्त श्रोता और अन्दर लगभग दो फर्लांग तक दोनों ओर कतारबद्ध छात्र-छात्राओं की मुस्कुराती सूरतें सबके हाथ में गेंदे गुलाब के फूल, कुछ के हाथों में दीपक की थाली। कवि के पहुँचते ही भारत माता की जय,’ ‘सरस्वती माता की जय और गोपाल सिंह नेपाली ज़िंदाबाद के नारे लगाए गए । खूब फूलों और इत्र मिश्रित जल का सिंचन किया गया। बड़ों की संगत का सुख मुझे भी मिला। फूल, मालाओं से नेपाली प्रेमियों ने कवि को लाद दिया। किसी तात्कालीन बड़ी राज नेता, किसी अति महत्वपूर्ण विशिष्ट व्यक्तित्व-सा सम्मान देखकर मैं तो गद्-गद् हो गया । सरस्वती वन्दना, स्वागत गान, स्वागत भाषण, कवि की कविता  ‘तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो आठवीं की बाल भारती का गायन, प्राचार्य और साहित्यकारों के भाषण के पश्चात कवि से विनती की गई भाषण और कविता गायन के लिए नेपालीजी के उद्बोधन में युवा शक्ति को राष्ट्र के नव निर्माण हेतु आगे आने, देश की रक्षा हेतु सना, राजनीति और सेवा कार्यों में जुटने की बात थी फिर उन्होंने कविताएं सुनाईं। कार्यक्रम की समाप्ति पर नेपालीजी के साथ मुझे रायपुर तक छोड़ने के लिए एक कार की व्यवस्था थी। उक्त मुलाकात के बाद फिर उनके दो पत्र ही मुझे मिले थे और फिर वे दूर चले गए, इतनी दूर कि न तो वहाँ से कोई चिट्ठी आई, न उन्होंने अपना कोई सन्देश ही भेजा।

 

  डॉ. विमल कुमार पाठक

खुर्सीपार जोन-1 मार्केट

सेक्टर-11 भिलाई - (छत्तीसगढ़)

मोबाइल - 93028-31304

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