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क्या यही है जिन्नाह के सपनों का
पाकिस्तान?
तनवीर जाफ़री
पाकिस्तान
के महानगर कराची में गत्
18
अक्तूबर की रात्रि में आतंक का वह इतिहास लिखा
गया जिससे केवल पाकिस्तान के लोग ही नहीं बल्कि पूरी मानवता
दहल उठी। पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री तथा उदारवादी नेता
बेनज़ीर भुट्टो अपने स्वयंभू देश निर्वासन के 8
वर्षों बाद 18 अक्तूबर
को दोपहर बाद जब कराची पहुँची तो लाखों लोग उनके स्वागत के लिए
बेताब नज़र आए। हालांकि 1986 में भी जब
कई वर्षों बाद बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान वापस लौटी थीं तो उस
सयम भी लाहौर हवाई अड्डे पर उनका ऐतिहासिक स्वागत किया गया था।
परन्तु 18 अक्तूबर को हुए बेनज़ीर के
स्वागत ने तो गोया पाकिस्तान के सभी नेताओं के स्वागत के सारे
कीर्तिमान तोड़ डाले।
ज़ाहिर है चरमपंथियों व रूढ़िवादियों को यह बात अच्छी नहीं लगी
कि धार्मिक कट्टरपंथ की ओर बढ़ते जा रहे पाकिस्तान में बेनज़ीर
भुट्टो जैसी उदारवादी सोच रखने वाली महिला पुन: पाकिस्तान की
राजनीति में सक्रिय हो तथा चरमपंथी इस्लामिक विचारधारा से तंग
आ चुके बहुसंख्य उदारवादी मुसलमानों को नेतृत्व प्रदान करे।
अपनी इसी संकुचित सोच के परिणामस्वरूप इन तथाकथित स्वयंभू
इस्लामी ठेकेदारों ने बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर ऐसा भयानक
हमला करवाया जिसने पाकिस्तान में हुए आतंकवादी हमलों के पिछले
सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले। एक ग्रेनेड के तथा दूसरे एक आत्मघाती
हमले के परिणामस्वरूप लगभग
140
लोग मारे गए तथा क़रीब 500
लोग घायल हुए। मृतकों में 20
पुलिसकर्मी तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के
लगभग 50 सुरक्षागार्ड शामिल हैं।
नि:संदेह यह हमला सीधे तौर पर बेनज़ीर भुट्टो को ही निशाना
बनाकर किया गया था। परन्तु वे बाल-बाल बच गईं। हालांकि जिस
विशेष बुलेटप्रूंफ वाहन में वह सवार थीं,
उसके शीशे ज़रूर टूट गए।
बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हुए इस हमले के विषय में कई तरह
की बातें की जा रही हैं। हमले के तुरन्त बाद सर्वप्रथम बेगम
भुट्टो के पति आसिफ़ ज़रदारी ने तो पाकिस्तान सरकार व प्रशासन
को ही इस हमले का ंजिम्मेदारी ठहरा दिया था। परन्तु बेनज़ीर
भुट्टो ने अपने पति के बयान को नज़र अंदांज करते हुए इन हमलों
के पीछे पूर्व राष्ट्रपति ज़िआ-उल-हक़ के समर्थक,
पूर्व सेना अधिकारियों का हाथ बताया। उधर
तालिबान की ओर से भी बेगम भुट्टो की पाकिस्तान वापसी को एक बड़ी
अमेरिकी सांजिश का परिणाम बताया जा रहा है। उनका मानना है कि
अमेरिका चाहता है कि भुट्टो, मुशर्रफ़
को सहयोग दे ताकि वज़ीरिस्तान तथा अन्य क़बाईली क्षेत्रों में
तालिबानों के विरुद्ध और कड़े क़दम उठाए जा सकें। परन्तु एक
तालिबानी कमांडर ने कहा कि चाहे जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ हों या
उसके पश्चात बेगम बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री
बनें, तालीबानी हमले इसी प्रकार जारी
रहेंगे।
कराची के फ़ैसल हाईवे पर बहादुराबाद पुलिस स्टेशन के अन्तर्गत
भुट्टो के काफ़िले पर हुआ हमला उनके कराची पहुंचने के
10
घंटों के बाद किया गया। जिस समय यह हमला हुआ उस समय नेशनल
हाईवे पर बिजली ग़ायब थी। बावजूद इसके कि बेनज़ीर भुट्टो ने
पाकिस्तान सरकार व प्रशासन को इस हमले के संबंध में क्लीन चिट
दे दी है तथा बेगम भुट्टो ने यह भी स्वीकार किया है कि पुलिस
प्रबंध एवं सुरक्षा के सभी प्रबंध शत-प्रतिशत दुरुस्त एवं
संतोषजनक थे। परन्तु उसके बावजूद हादसे के समय राजमार्ग पर
बिजली गुल होने की घटना को संदेह की नज़र से देखा जा रहा है।
यह किसी बड़ी सांजिश का नतीजा भी माना जा रहा है। यही वजह है कि
बेनज़ीर भुट्टो ने अपने काफ़िले पर हुए इस हमले की जांच
अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों से कराए जाने की मांग भी कर डाली
है। इसके जवाब में पाकिस्तान के गृहमंत्री आंफताब खां शेरपाव
ने भी स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान सरकार इस हादसे की जांच
बहुत निष्पक्षता से कर रही है। पाकिस्तान के एक और क़द्दावर
नेता चौधरी शुजात हुसैन ने तो यहाँ तक कह दिया था कि पाकिस्तान
पीपुल्स पार्टी ने बेगम भुट्टो की लोकप्रियता तथा जनता की
सहानुभूति हासिल करने के मद्देनज़र पी पी पी द्वारा यह हमले
स्वयं कराए हैं। बेगम भुट्टो ने हुसैन के बयान को पागलपन भरा
बयान कहकर टाल दिया।
इस हमले के पश्चात कई तरह के प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं। क्या
बेनज़ीर भुट्टो इस हमले से घबराकर पाकिस्तान छोड़ देंगी?
जनरल मुशर्रफ़ तथा बेनज़ीर भुट्टो के बीच हुए
समझौते के तहत बेगम भुट्टो को कब और कौन सा स्थान मिलेगा?
क्या मुशर्रफ़ और भुट्टो दोनों मिलकर आतंकवाद
व चरमपंथ जैसे भस्मासुर का पूरी ज़ोरदारी से मुक़ाबला कर
सकेंगे? और इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह ने एक ऐसे ही
धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान की कल्पना की थी जहाँ कि चरमपंथियों
द्वारा आए दिन धर्म के नाम पर ख़ून की होलियां खेली जाती हों?
यदि हम पाकिस्तान के मात्र तीन दशकों के
इतिहास का अति संक्षिप्त जायज़ा लें तो हम देखेंगे कि
1977 में पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख
जनरल ज़िया-उल-हंक ने तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुल्फ़िकार
अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया था। तथा उन्हें गिरंफ्तार कर जेल
भेज दिया था व स्वयं को पाकिस्तान का शासक घोषित कर दिया था।
जनरल ज़िया ने भुट्टो की गिरफ़्तारी के बाद मात्र दो वर्षों
बाद ही 1979 में उन्हें फांसी पर लटका
दिया था। लगभग 10 वर्षों तक पाकिस्तान
में हुकूमत करने के बाद 1988 में जनरल
ज़िया एक विमान हादसे में मारे गए। ज़िया की मौत के पश्चात
पाकिस्तान में आम चुनाव हुए तथा पकिस्तान पीपुल्स पार्टी सत्ता
में आई व बेगम बेनज़ीर भुट्टो पहली बार पाकिस्तान की
प्रधानमंत्री बनीं। दरअसल 1977 से लेकर
1988 तक का जनरल ज़िया-उल-हंक का दौर
ही पाकिस्तान में किसी भी शासक का वह दौर-ए-हुकूमत था जिसमें
कि वहां चरमपंथी विचारधारा को ख़ूब फलने-फूलने का मौंका मिला,
आतंकवाद बढ़ा, आतंकवादी
ठिकाने बढ़े, कट्टरपंथी शिक्षा का
प्रचार-प्रसार करने वाले मदरसों की संख्या में वृद्धि हुई।
यहाँ तक कि जिन्नाह के सपनों का धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान एक
रूढ़ीवादी और कट्टरपंथी पाकिस्तान की राह पर चल पड़ा।
आज यदि अशांत देशों की बात की जाए तो सबसे
पहले इरांक या अंफंगानिस्तान जैसे देश का नाम ज़ेहन में उभर कर
सामने आता है। परन्तु प्रतिष्ठित न्यज़ पत्रिका न्यूंजवीक ने
अपने एक तांजातरीन अंक में तो पाकिस्तान को ही विश्व का सबसे
ख़तरनाक देश बताया है। इरांक व अंफंगानिस्तान से भी ज्यादा
ख़तरनाक देश। इसका कारण बताते हुए न्यूज़वीक ने लिखा है कि
दुनिया का सबसे ख़तरनाक आतंकवादी संगठन अलक़ायदा पाकिस्तान में
ही फल-फूल रहा है। इसके अतिरिक्त यहाँ आतंकवादियों को सुरक्षित
तौर पर शरण मिल जाती है। सीमा पार से बेरोक-टोक आवाजाही होने
के कारण भी घुसपैठियों व आतंकवादियों के लिए शरणस्थली के रूप
में पाकिस्तान से सुरक्षित देश दुनिया में दूसरा कोई नहीं है।
पाकिस्तानी अस्पतालों में तो आतंकवादी बेरोक-टोक व बेख़ौफ़
होकर अपना इलाज भी करवाते हैं। लाल मस्जिद जैसी घटनाएं भी
न्यूज़वीक के दावे को सही ठहराने के लिए कांफी हैं। फिर प्रश्न
यह है कि आख़िर पाकिस्तान का भविष्य है क्या?
दरअसल बेकाबू होते जा रहे इन हालात से निपट
पाना अब न तो अकेले मुशर्रफ़ के बस की बात है न ही बेनज़ीर
भुट्टो, नवाज़ शरींफ अथवा अन्य किसी
राजनैतिक दल की। चरमपंथी विचारधारा के विरुद्ध पाकिस्तान की
सभी राजनैतिक शक्तियाँ जब तक एकजुट नहीं होती तथा पूरी
पारदर्शिता व ईमानदारी से इन बिगड़ते हुए हालात पर क़ाबू नहीं
पाती तो आने वाला समय पाकिस्तानी अवाम व पाकिस्तानी शासन के
लिए अत्यधिक ख़तरनाक हो सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि तालिबानी
विचारधारा पाकिस्तान का भी वही हाल करना चाह रही हो जोकि उसके
अपने देश अंफंगानिस्तान का हुआ है। अत: वक्त का तकाज़ा है कि
पाकिस्तानी अवाम जनरल ज़िया के सपनों के पाकिस्तान के निर्माण
के बजाए जिन्नाह के सपनों के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित
एक ऐसे पाकिस्तान के निर्माण की ओर बढ़े जो पूरे विश्व के लिए
वास्तव में 'पाक'
देश के रूप में जाना जाए न कि विश्व के सबसे
बड़े आतंकवादी देश के रूप में अपनी पहचान बनाए।
तनवीर
जाफ़री
(सदस्य, हरियाणा
साहित्य अकादमी, शासी परिषद)
22402, नाहन हाऊस,
अम्बाला शहर, हरियाणा
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