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तृतीय किश्त
हिंदी
लघुकथा का विकास
डॉ.
अंजलि शर्मा
(लघुकथा
हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम
पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी
भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी
विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के
ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की
दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही
है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही
कमलेश्वर , राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर
लघुपत्रिकाओं के संपादकों का ।
हमने
अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध
ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु
गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें
खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और
हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति
अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल
चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध
कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है ।
अभी तक आप
भाग 1,
एवं
भाग 2
पढ़ चुके हैं ।
पिछले अंकों से आगे पढ़िए - संपादक )
(2) द्वितीय उत्थान-(1925 से 1936)
प्रेमचंद और प्रसाद दोनों की कहानी कला
का वास्तविक उत्थान वस्तुतः इसी अवधि में हुआ । प्रथम उत्थान
का काल तो वास्तव में उनके प्रतिभा के आर्विभाव का काल था।
द्वितीय उत्थान के अंतर्गत प्रेमचंद और प्रसाद के कई कथासंग्रह
‘प्रसून’
और प्रेम
‘द्वादशी’,
‘मानसरोवर’
तथा प्रसाद जी के
‘आकाशदाप’,
‘प्रतिध्वनि’,
‘आँधी’
तथा इंद्रजाल आदि संग्रह महत्वपूर्ण है।
वस्तुतः इस द्वितीय उत्थान के अंतर्गत
प्रेमचंद और प्रसाद का इतना व्यापक और गहरा प्रभाव पड़ा कि
हिंदी कहानी दो धाराओं में बँट गई। पहली धारा थी प्रसाद की
मानवीय ललित भावनात्मक, कोमल भावनाओं के आकर्षण- विकर्षण की और
दूसरी धारा थी प्रेमचंद की जिनकी कहानियों का उद्देश्य जीवन और
समाज के विविध कार्यों और परिस्थितियों का चित्रण था। प्रसाद
की परंपरा में श्री रामकृष्ण दास, विनोद शंकर व्यास और
वाचस्पति पाठक, चतुरसेन शास्त्री, बेचैन शर्मा उग्र, चंडी
प्रसाद, हृदयेश, कमलकांत वर्मा तथा यमुना प्रसाद वैष्णव आदि
है। अंतःपुर का आरंभ, गहुला और प्रसभना की प्राप्ति इनकी
प्रमुख कहानियाँ है। श्री विनोद शंकर व्यास की कहानियाँ मानवीय
संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं। इनकी प्रतिनिधि कहानियाँ
‘कल्पनाओं
का राजा’,
‘विधाता’और
‘अपराधी’
आदि हैं। वाचस्पति पाठक की कहानियों में मानवीय अनुभूतियों
युक्त चरित्रों के चित्रण की प्रमुखता है।‘सूरदास’,
कल्पना,‘कागज
की टोपी’,
‘फेरीवाला’
इनकी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं।
श्री चतुरसेन शास्त्री ने ऐतिहासिक और
सामाजिक दोनों प्रकार की कहानियाँ लिखी। ऐतिहासिक कहानियों में
‘दुखवा
मैं कासे कहूँ मोरी सजनी’
‘सिंहगढ
विजय’
तथा सामाजिक कहानियों में
‘देखुदा
के राह’
कहानी विशेष रूप से चर्चित रही। श्री बेचैन शर्मा उग्र की का
मूल उद्देश्य सामाजिक विभत्सता का उद्घाटन करना था। उनकी
कहानियों में विभिन्न सामाजिक कुरुपताओं का दिग्दर्शन मिलता है
परंतु वे अपने आप में नगण्य हैं। उस नग्न यथार्थ तक पहुँचने का
उनका ढंग रोमेन्टिक है। उनके इस प्रकृतवाद के अंतर्गत मानव को
संस्कृति और सभ्यता के नाम पर सहस्त्रों वर्षों से व्यर्थ का
एक ऐसा बोझा ढ़ोता हुआ दिखाया जाता है, जिसे उतार फेंकने में
उसके उद्धार की संभावना निहित है। इस प्रकृतवाद का परोक्ष
प्रभाव हिंदी कहानियों पर विशेष रुप से स्वातंत्र्योत्तर हिंदी
कहानियों पर पड़ा।
प्रेमचंद संस्थान के अंतर्गत आने वाले
कहानीकारों में श्री जी.पी. श्रीवास्तव, राजा राधिकारमण सिंह,
श्री विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक, पंडित ज्वालादत्त शर्मा, श्री
सुदर्शन, श्री गोविन्दवल्लभ पंत, श्री वृंदावनलाल वर्मा, भगवती
प्रसाद बाजपेयी आदि प्रमुख है। श्री जी.पी.श्रीवास्तव हास्यरस
के प्रमुख कहानीकार हैं, परंतु इनकी कहानियों में शिष्ट हाल का
अभाव है। लंबीदाबी इनकी प्रतिनिधि कहानी संग्रह है। राजा
राधिका रमण ने अपनी कहानियों के माध्यम से सामाजिक समस्याओं
तथा सामाजिक स्थितियों का चित्रण किया है। इनका प्रमुख चर्चित
कहानी संग्रह
‘गांधी
टोपी’
और
‘कुसुमांजलि’
है। श्री विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक जी का कहानियों में यथार्थ
और आदर्श का समन्वय किया या है। इनकी कहानियों की पृष्ठभूमि भी
सामाजिक है और कहानियों का मूल उद्देश्य भी सामाजिक रहा है।
‘चित्रशाला’और
‘मणिमाला’
उनके प्रधान कहानी संग्रह । श्री गोविन्द वल्लभ पंत ने
आदर्शवादी कहानियाँ लिखी। प्रेमचंद संस्थान के सर्वाधिक
लोकप्रिय कथाकार श्री सुदर्शन ही हुए हैं। डॉ. लक्ष्मी नारायण
लाल उनके कहानियों के विषय में लिखते हैं-
‘उनकी
कहानियों में व्यक्ति और समाज की सामान्य नगण्य घटनाओं,
समस्याओं तथा जीवन की विरोधी परिस्थियों की अभिव्यक्ति मिलती
है।’
सुदर्शन जी के प्रमुख कहानी संग्रह
सुदर्शन सुमन, सुप्रभात, सुदर्शन-सुधा, तीर्थ यात्रा तथा
परिवर्तन है । श्री वृंदावन लाल वर्मा ने ऐतिहासिक कहानियों के
माध्यम से वर्तमान सामाजिक जीवन को अभिव्यक्ति दी है ।
‘शरणागत’,
‘कलाकार
का दंड’,
‘देव
पाँव,’
‘अंगूठी
का दाम’
आदि उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं ।
इस प्रकार द्वितीय उत्थान के अंतर्गत जो
कहानियाँ लिखी गई, उनमें यथार्थ समर्थित आदर्श की व्यंजना
लक्ष्य के रुप में वर्तमान है । प्रेमचंद की कहानियों के पात्र
सभी वर्गों के हैं, तथा उनकी कहानियों में जनजीवन का चित्रण
अपने स्वाभाविक रुप में वर्तमान है ।
‘पंच
परमेश्वर’,
‘बूढी़
काकी’,
‘यंत्र’,
‘नामक
का दरोगा’,
‘सुजान
भगत’
आदि प्रसिद्ध कहानियों के केंद्र में जीवन परिवेश संपृक्त
आदर्श बिंदु ही है ।
प्रेमचंद की कहानियाँ जिनमें
‘पूस
की रात’
और
‘कफ़न’
प्रमुख है । ये कहानियाँ हिन्दी कहानी को एक नये मोड़ की ओर
संकेत करती है, क्योंकि इन कहानियों के संरचना के केंद्र में
एक वांछित आदर्शवाद के स्थान पर एक जीवन यथार्थ चेतना है ।
प्रेमचंद की इन कहानियों में हमें आधुनिक हिन्दी कहानी के बीज
दिखाई देते हैं । हिन्दी की वर्तमान यथार्थवादी कहानियाँ
संचेतना और संरचना में चेखव की कहानियों से प्रभावित हैं,
परंतु प्रेमचंद से प्रभावित उनके समकालीन कहानीकार प्रेमचंद के
इस नये मोड़ का अनुसरण नहीं कर सके । उनकी कहानियाँ आदर्श
बिंदु से ही अनुशासित होती रही, वे लकीर के फ़कीर बने रहे ।
प्रेमचंद युग तक की कहानियाँ समस्या प्रधान थी, परन्तु उनकी
समस्याएँ सामाजिक होते हुए भी वैयक्तिक थी, प्रेमचंद जी ने
हिन्दी को लगभग तीन सौ कहानियाँ दी, परंतु उनके युग तक अतीतता
का बोध ही कहानी की मूलभूत विशेषता मानी गई । अर्थात् जो कुछ
हो चुका है, बीत चुका है, उसका कथन ही कहानी है । उस समय की
कहानी से आज की कहानी में प्रमुख अंतर यही है, पुरानी कहानी
में किस्सागोई कहानियों के साथ जुड़ी रहती थी । श्री
रविन्द्र कालिया इस द्वितीय उत्थान के बारे में कहते हैं-
आज की कहानी निर्णय के क्षण की कहानी है, वह निर्णय चाहे
अनिर्णय ही क्यों न हो। आज की कहानी
बयान करने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान से भिड़ने के लिये लिखी
जा रही हैं । यह क्षण-क्षण घटित होने वाले वर्तमान का सही व
सम्पूर्ण पर्यवेक्षण प्रस्तुत करती है।
द्वितीय उत्थान के उत्तरार्द्ध में
कहानी के क्षेत्र में श्री जैनेन्द्र कुमार, उपेंद्र नाथ अश्क,
यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, अज्ञेय,
अमृतराय आदि कई नवोदित प्रतिभाओं को विकास का अवसर प्राप्त हो
गया था, परंतु इनके उत्थान की गणना तृतीय उत्थान के अंतर्गत ही
की जा सकती है, क्योंकि इन कथाकारों की प्रतिभा का पूर्ण विकास
इसी काल में ही हुआ ।
(क्रमशः अगले अंकों मे)
डॉ. अंजलि शर्मा
सहायकशासकीय
स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य महा'
जरहाभाटा,
बिलासपुर, छत्तीसगढ
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