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बच्चों को बाल साहित्य कैसा हो ?
डॉ. शमशेर अहमद
खान
शायद
ही कोई समाज होगा जो अपने बच्चों के लिए बाल साहित्य की महत्ता
को नकारता हो । आधुनिक तकनीक और उससे संचालित विविध उपक्रमों
के बावजूद बाल साहित्य की अनिवार्यता सदैव बनी रहेगी हर स्तर
पर, चाहे वह मनोवैज्ञानिक हों, समाजशास्त्री हो या फिर
शिक्षाविद्, या कि चिंतक । यद्यपि बाल साहित्य को लेकर
तरह-तरह की भ्राँतियाँ है । कोई उसके आदर्शात्मक चरित्र को
ज़ोर देता है तो कोई उसमें यथार्थात्मक पहलूओं की माँग दोहराता
है । हिंदी के जाने-माने बाल साहित्यकार डॉ. शमशेर अहमद
खान ने इस दिशा में खास रूप से हिंदी के महत्वपूर्ण बाल
पत्रिकाओं के संपादकों से बात की है, कि आखिर बच्चों को किस
प्रकार का साहित्य मिलना चाहिए, । इस परिचर्चा में अति उपयोगी
बातें सामने आयी हैं । पढिए क्या कहते हैं, ये बाल साहित्य के
विशेषज्ञ
?
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संपादक
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राजेश
कुमार बैजल (संपादक, बालवाणी, उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ)
वैसे तो बालसाहित्य और नवसाक्षर साहित्य को लेकर भिन्न-भिन्न
विचारों की कमी नहीं है, पर जहाँ तक मेरी समझ है, उसके अनुसार
बालसाहित्य शिशु से किशोर होते बच्चों के मनोरंजन, ज्ञान और
उनकी बाल मानसिकता को स्वर देता है और भविष्य में उन्हें बेहतर
नागरिक बनाने के लिए ज़रूरी नींव का काम करता है। बालसाहित्य
और नवसाक्षर साहित्य दोनों का ही अपना-अपना महत्व है। चूंकि
नवसाक्षर साहित्य नन्हें मुन्नों के लिए है, इस कारण लेखक के
लिए उनकी बार मानसिकता को अधिकारिक बेहतर ढंग से समझना लगभग
अनिवार्य हो जाता है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं,
वह-बहुत सी बातें स्वयं ही समझते-समझाते चलते हैं, पर
नवसाक्षरों के संबंध में बाल साहित्यकार को ही अधिकतर संदर्भों
में अपे लेखने के दौरान यह जिम्मेदारी उठानी होती है।
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कृष्ण
कुमार अष्ठाना (संपादक, देवपुत्र, इंदौर, मध्यप्रदेश)
आज का युग ज्ञान के विस्फोट का युग है।संचार क्रांति ने अनकों
को अनेक विषयों से परिचित करा दिया है। इसके सुपरिणाम तो हुए
ही हैं कुछ दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। विशेष तौर पर
बच्चों की अभिरुचि तेज़ी से एक अनचाही दिशा की ओर बढ़ गई है।
परिणामतः वे अपने नैतिक मूल्यों से रहित होते जा रहे हैं । ऐसे
में बच्चों का साहित्य केवल मनोरंजन और जानकारियों तक सीमित
रखना अपर्याप्त है, उनहें संस्कारों की भी नितांत आवश्यकता है।
अतः जिसमें मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान सब कुछ, संस्कार परक हो,
ऐसे साहित्य बच्चों के लिए उपलब्ध कराना हमारा महत्वपूर्ण
दायित्य है। बच्चों की जानकारियों ही नहीं उनका ज्ञान भी बढ़े
यह आवश्यक है।
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कमलकांत
अग्रवाल (संपादक, स्नेह, भोपाल, मध्यप्रदेश)
स्कूली बच्चों को कोर्स की किताबों के साथ-सथ बालसाहित्य भी
पढ़ना चाहिए । चूंकि कोर्स की किताबें जिस तरह आज एक कक्षा से
अगली कक्षा में पहुँचाने में सहयोगी होती हैं उसी तरह साहित्य
आप को जीवन में निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं वह अपने बचपन की
शिक्षा और संस्कार के कारण ही ऐसा बन सके हैं। बच्चे टी.वी. से
थोड़ा समय निकालें। अपने खर्चों में से थोड़ा पैसा बचाएँ और
माह में कुछ किताबें अवश्य खरीद कर पढ़े। यह आपके जीवन की
अमूल्य निधि होगी।
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विभा
जोशी (संपादक, बालभारती, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, दिल्ली)
बालसाहित्य एक सूंदर फूलों के गुलदस्ते के समान है जिसे अगर
कुछ देर के लिए बच्चा हाथ में ले तो वह अपनी उलझनों और पढ़ाई
के तनाव से मुक्त होकर दोबारा ताज़गी महसूस करेगा। जबकि प्रौढ़
साहित्य व्यक्ति को अपने चारों ओर घटित घटनाओं को समझने-बूझने
के लायक बनाता है। क्योंकि अक्षर ज्ञान ही उसे पोस्टर
सूचनापट्ट, होर्डिंग्स आदि को पढने और समझने की क्षमता प्रदान
करता है।
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प्रमोद
कुमार बजाज (संपादक, लोटपोट, दिल्ली)
बालसाहित्य में बच्चों को संस्कारित करने वाला साहित्य जैसे-
कहानी, कविता, जीवनी, यात्रा, नाटक, कार्टून, रोचक जानकारी आदि
होनी चाहिए। जबकि प्रौढ़ साहित्य में लोगों को साक्षर किया
जाता है इसलिए इसमें सूचनापरक साहित्य होना चाहिए।
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भैरूं
लाल गर्ग (संपादक, बालवाटिका, जयपुर, राजस्थान)
बच्चों को आज जीवन मूल्यपरक साहित्य देने की आवश्यकता है। आज
अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी आजीविका के योग्य बनाने
का तो भरसक प्रयास करते हैं, लेकिन वह एक अच्छा मनुष्य बने
इसके प्रति वे जागरूक नहीं हैं। सारा प्रयास उसके बाह्य
व्यक्तितत्व-निर्माण को लेकर है। चूँकि मनुष्य एक सामाजिक
प्राणी है अतः वह एक श्रेष्ठ बालसाहित्य के माध्यम से ही संभव
है। बच्चा केवल उपभोक्ता न बनकर रह जाए, आज यह हमारी चिंता का
विषय होना चाहिए। अतः उसे मूल्यपरक अर्थात् नैतिकतापूर्ण एवं
आदर्श जीवन निर्माण मे सहायक साहित्य दिया जाना आवश्यक है।
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मानस
रंजन महापात्र (संपादक, पाठक मंच बुलेटिन, नेशनल बुक ट्रस्ट,
दिल्ली)
बालसाहित्य / पुस्तक का मनोरंजक एवं आकर्षक होना अनिवार्य है। आज के युग
में साहित्य के माध्यम से सूचना एवं मनोरंजन दोनों को बच्चों
को साथ-साथ देने की आवश्यकता है।
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कल्पना जैन (संपादक, बच्चों का देश, जयपुर, राजस्थान)
एक समय था जब हमारे देश में संयुक्त परिवार प्रथा थी। परिवार
के बुजुर्गों में नैतिक मूल्यों, मानवीय मूल्यों के प्रति गहरी
आस्था थी, पारिवारिक वातावरण स्वस्थ था। बच्चे सद्संस्कार
स्वयमेव ग्रहण कर लिया करते थे। यह तथ्य सत्य है कि बच्चा जो
स्वतः ग्रहण करता है, उसका असर गहरा व स्थायी होता है। इन
परिस्थितियों में एक बालसाहित्य रचनाकार का दायित्व महत्वपूर्ण
हो जाता है। ये परिस्थितियाँ चुनौतियाँ बन कर खड़ी हैं, जिनका
सामना एक रचनाकार को करना होगा। आज का बच्चा उपदेश ग्रहण नहीं
करता, वह हर बात को तर्क की कसौटी पर कसता है। अतः बालसाहित्य
रचनाकार को बालकों की आज की मानसिकता के अनुरूप साहित्य का
सृजन करना होगा अर्थात् बाल मनोविज्ञान जिसका आधार हो। ऐसा
साहित्य जो व्यावहारिकता और मौलिकता की वीथियों से गुजरता हुआ
गुणवत्ता, रोचकता व सार्थकता की मंजिल तक पहुँचे।
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असलम परवेज़ (संपादक, उमंग, उर्दू अकादमी, दिल्ली)
बच्चों को अच्छी शिक्षा देना हमारी जिम्मेदारी है ताकि उनका
सर्वागीण विकास हो सके। केवल स्कूली पाठ्य पुस्तकों से ये काम
पूरा नहीं हो सकता। अतः बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की ज़रूरत
है जो गैर महसूस तरीके से उनके मानसिक विकास एवं चरित्र
निर्माम में सहायक हो सके, उनमें मानसिक विकास एवं चिरत्र
निर्माण में सहायक हो सके, उनमें मानसिक विकास एवं चरित्र
निर्माण मे सहायक हो सके, उनमें वह हौसला एवं आत्मविश्वास पैदा
कर सके जो सफलता की मंजिलों की ओर ले जाते हैं। बच्चों के
साहित्य-लेखन में बच्चों की आवश्यकताओं एवं सोच के स्तर के
साथ-साथ भाषा की सरलता एवं सहजता का भी विशेष ध्यान रखा जाना
अत्यंत आवश्यक है। बच्चे सतत् विकास की विभिन्न अवस्थाओं से
गुज़रते हैं, अतः उनकी समस्याएँ अलग होती हैं। बालसाहित्य का
लक्ष्य है कि बच्चों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए उनके
ज्ञान, विवेक एवं आत्मविश्वास को बढ़ाए एवं मानसिक विकास एवं
चरित्र निर्माण में मदद करे। इसके विपरीत, नवसाक्षर साहित्य
में आयु की कोई सीमा नहीं होती। अतः ऐसे साहित्य में सरल एवं
सहज भाषा का प्रयोग तो अवश्य होता है लेकिन इसमें हर प्रकार के
विषय सम्मिलित किए जा सकते हैं।
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डॉ. शमशेर अहमद खान
2-सी, प्रेस,
ब्लॉक, पुराना सचिवालय,
सिविल लाईंस,
दिल्ली - 110054
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