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भाग-5
एक नये समीक्षक को
सलाह
जार्ज बर्नार्ड शॉ
(उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक
नाट्य समीक्षा
से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा
प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार
जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने
उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और
उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में
'ऐडवाइस टु ए यंग
क्रिटिक'
नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर
ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को
लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा
डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा -
एक नये समीक्षक को सलाह
। हम इसे साहित्यिक हित में संपूर्णतः प्रकाशित
कर रहे हैं। इस महान कृति को अब
धारावाहिक रूप से आगे पढ़ सकते हैं । प्रस्तुत है इस धारावाहिक की
पाँचवी कड़ी - संपादक)
29 फिट्ज्राय स्क्वायर, डब्ल्यू
14 दिसम्बर 1894
प्रिय महोदय,
इस परिच्छेद का ‘मिसेज
वैरेंस प्रोफ़ेशन’
से कोई संबंध नहीं है। यह पुस्तक भी अभी सेंसर को नहीं सौंपी
गई है। पता नहीं कि इस स्तम्भ का संबंध किससे है । हो सकता है
कि इसका संबंध हेनरी जेम्स तथा अलेक्जेंडर से हो, लेकिन इस
विषय में मैंने कुछ सुना नहीं है।
इस साल श्री मिगॉट ने श्री सिडनी ओलिवियर के एक नाटक को
लाइसेंस देने से इनकार कर दिया है। श्री सिडनी कोलोनियल ऑफ़िस
में एक अपर डिवीजन क्लर्क हैं। इसलिए वे एक बहुत योग्य व्यक्ति
के रूप में मान्य हैं, जबकि श्री पिगॉट का पदस्थापन मात्र
प्रश्रय की बात है। कोई अयोग्य व्यक्ति भी इस पद पर नियुक्त हो
सकता है। जबकि अपर डिवीजन सिविल सेवक के रूप में नियुक्ति के
लिए बहुत कठिन परीक्षा पास करनी पड़ती है। इस लाइसेंस के लिए
श्रीमती फार्र ने आवेदन पत्र दिया था जो इस नाटक की
‘एवेन्यू
थियेटर’
में प्रस्तुत करना चाहती थी। श्री ओलिवियर ने श्री पिगॉट से इस
प्रश्न पर बात करने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने अनुभव किया
कि श्री पिगॉट को कुछ भी ज्ञान नहीं है और इब्सन द्वारा चलाये
गये आन्दोलन के पक्षपातपूर्ण विरोधी भी हैं। इसलिए इस विषय में
उनसे बात करना बिल्कुल बेकार था। ओलिवियर के विचार सही थे। यह
सेंसर की तानाशाही का ताज़ा उदाहरण है जिसे मैं अब जान सका
हूँ।
जला डालने क उद्देश्य से किताब न लिखें। यह धारणा बनाकर लिखें
कि पुस्तक उपयोगी और सफल है तथा यह छपने जा रही है। तब देखें
क्या होता है । शायद आपको कोई प्रकाशक न मिले। लिखने के प्रयास
में आप बहुत कुछ सीखते चले जाएँगे। हो सकता है कि पहले वाले को
छोड़ आप कुछ नया लिखना शुरू कर दें। फिर उसे भी छोड़ देंगे,
लेकिन इस पर भी यदि अपनी पुस्तक आपको लचर प्रतीत हो और इसके
लिए आपको लज्जा आए, तब भी इसे जलाएँ मत । आप इसे कहीं किसी
ड्रॉवर में रख दें। तीस वर्ष की अवस्था में बीस वर्ष की अवस्था
में लिखी गयी चीज़ों में, आपको हो सकता है, कुछ ग्लानि हो,
लेकिन जब आप चालीस की अवस्था में होंगे तो युवावस्था में लिखे
सपनों के प्रति आपके मन में आदर फिर जगेगा। फिर कौन जानता है,
कहीं अभी ही यह छपने योग्य निकल आए। अगर आप अपने व्यवसाय में
प्रवीण शिल्पी बनना चाहते हैं तो निश्चित रूप से लिखें और की
वर्षों तक प्रतिदिन नियमित रूप से लिखते चलें।
आपका अनुमान है कि मैं शायद इस तरह के अभ्यास के लिए आपसे
ज़्यादा समर्थ था। इस विषय में मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि
हममें और आपमें यही अन्तर है कि आपके पिता सुरम्पन्न हैं जबकि
मेरे पिता सर्वथा दीन-हीन-विपन्न । अगर आपका भोजन और आवास
सुनिश्चित हो जाता है तो अपने को आप एक राजा समझ सकते हैं। यदि
बारह साल पहले आपने मुझे देखा होता तो आप एक भयानक जीर्ण आकृति
पाते । करीब नौ वर्ष पहले लंदन आने के बाद मैंने लिखा तो बहुत,
किन्तु कमाया कुछ नहीं। उस समय पाँच-छह साल तक करीब डेढ़ सौ
पौंड लेता था। उसके बाद मेरी आय कुछ वर्षों तक तीन सौ पौंड भी
हो गयी और अभी मेरी आमदनी उसी पुरानी संख्या पर पहुँच चुकी है।
अर्थात् शून्य । स्पष्ट है कि जीवन में पैसे का बहुत महत्व
नहीं होता। एक सट्टेवाजी का सम्पन्न दलाल मेरे कैरियर को हीन
मान सकता है, लेकिन मेरी रुचि और कार्यकलापों की विभिन्नता,
मेरे मित्रों की संख्या (शत्रुओं की तो बात ही जाने दीजिए),
मुझे प्राप्त आदर तथा मेरी व्यक्तिगत क्षमता के आयाम की ओर यदि
आप ध्यान दें तो स्थिति कुछ दूसरी ही प्रतीत होगी आपको। आप
पाएँगे कि सट्टेबाजी के दलाल की ही शैली में यदि मैं अपने आपको
ऐसा बना लेता कि मैं कई हजार पौंड प्रतिवर्ष कमा सकूँ तो मैंने
निश्चचय ही एक बहुत ही बुरा समझौता कर लिया होता। याद रखें।
गरीबी, अकुशलता, विपन्नता की शर्म आदि तमाम कमजोर अपरिपक्वता
की दूर्दशा से अभिशप्त होकर ही मैंन लिखना शुरू किया था । अगर
दसगुने नहीं तो सम्भवतः हमसे दुगुने सुअवसर और सुयोग आपको
अवश्य प्राप्त हैं। तथ्य यह है कि हर किसी को न्यूनाधिक इस
परीक्षा से
गुजरना ही पड़ता है - अधिक कठिनाई उसे तब होती है जब वह विपन्न
होता है;
अगर आवास और भोजन की निश्चिन्तता देने के लिए पिता हों तो यह
कठिनाई कम जाती है। इसलिए बढ़े चलें, दुनिया में आपका ही
शंखनाद गूँजेगा।
जी.वी.एस.
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