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देखना इस तरह
दुनिया को
डॉ.
श्यामसुंदर दुबे
हमारे समय का
समूचा विकास इकतरफा हो रहा है । हमारी भौतिक उपलब्धियां
ब्रह्मांड व्यापी ऊंचाइयों पर स्थापित हो रही है, पर हमारी
संवेदनाएं छीज कर इतनी ओछी पड़ रही हैं कि हम अपने आप से
वितृष्ण हो उठे हैं । बढ़ती हुई सभ्यता के दायरे में
आत्हत्याओं का ग्राफ़ क्या यह नहीं प्रकट कर रहा है कि हमारे
समय का तथाकथित विकास मनुष्य-द्रोही है । हम सूचना और संचार के
संजाल में लिपटे निरंतर खदबदाहटों से भरे अशांत और बैचेन समय
में जी रहे हैं । इस समय को जानने-समझने के लिए कैलाश वाजपेयी
की कृति शब्द संसार उपादेय है । यह बौद्धिक गुत्थियों के
वैचारिक दरवाज़े खोलती है । इसमें ओक्तावियो पाज, पीटर स्मिथ,
फ्रांसिस फुकुयामा, नोम चॉम्स्की, पॉल जॉनसन, उम्बेर्ती इको,
डेविड पीटर लारेंस जैसे लगभग बहत्तर चिंतक सक्रिय है । इन
चिंतको द्वारा लिखी गई विभिन्न विषयों पर केंद्रित सुविख्यात
कृतियों की टिप्पणीनुमा विषयग्राही समीक्षा इस कृति में इस तरह
से प्रस्तुत हैं कि वे समीक्षा कम, विषय निर्देशक
संक्षिप्तियाँ अधिक लगती हैं ।
प्रकृति और मनुष्य के अंतरावलंबन पर इस कृति में अनेक तरह से
विचार किया गया है । क्या यांत्रिकीय विकास मनुष्य को
स्वीकृति-विहीन नहीं बना रहा है
?
हाँस जोनास के नैतिकता के नए प्रतिमान से स्पष्ट होता है कि
यांत्रिकी ने पूरे विश्व में निर्वात पैदा किया है । यंत्र
मनुष्य की कर्मेंद्रियों की क्षमता बढ़ाने के लिए थे, पर इनने
उसको गुलाम बना लिया है । क्रिप्जोक कापरा ने जीप इकोलॉजी के
मद्देनजर यह स्पष्ट किया है कि संपूर्ण जगत में सूक्ष्म से
सूक्ष्म वस्तु का एक दूसरे से गहन तादात्म्य है- तादात्म्य ही
नहीं, इनकी इस आधार पर गहन पारस्परिक निर्भरता भी अनुभव की जा
सकती है, ‘पारिस्थितिकी
के अनुसार, समूची सृष्टि एक चक्राकार अंतरावलंबित प्रक्रिया है
। हर प्रत्यक्ष किसी अन्य के साथ कटिबद्ध है।’
हमारे भारतीय दर्शन में जो
‘सर्व
खल्विदं ब्रह्मम् कहा गया है, इसी अखंड सत्ता का बोधक तो है।
‘डीप
इकोलॉजी’
पुस्तक में इस लक्ष्य को और विस्तारित किया गया है। पृथ्वी पर
जैसा, जहाँ जो जीवन है उसे उतने ही प्रकृत रूप में पनपने देना
। उसे मूल्य या पूँजी के रूप में न देखना । आसपास जितना
वैविध्य होगा आंतरिक अनुभव भी उतने गहन होंगे । मनुष्य को कोई
अधिकार नहीं काट-छांट करने, प्रवाह रोकने का । इस पारस्परिक
आपूरिकता और सहजीवन के सिद्धांत को भी साधा जा सकता है जब
पश्चिमी विचारक मार्टिन हाइडेगर की इस हिदायत को अनुभव किया
जाए कि लोग पृथ्वी पर सही ढंग से सबके साथ निवास करने की तमीज़
पैदा करें । यह मन के संयम की ओर ही संकेत है । कैलाश वाजपेयी
पश्चिम के साथ भारतीय चिंतन को भी इसी पैमाने पर कसते हैं।
‘पानी
की कहानी’
और ‘वायु-प्रसंग’
में ऊपर-ऊपर से यह अनुमान लगता है कि इन पुस्तकों के रचयिताओं
ने पानी और वायु की चर्चा पारिस्थितिकी की दृष्टि से की है, पर
ऐसा है नहीं । इन तत्वों की चर्चा मानवीय चेतना के संदर्भ में
भी की गई है । वायु को प्राण रूप में प्रतिपादित करते हुए
ल्याल वाट्सन ‘हैवेन्स
ब्रेथ’
में इसे इच्छा शक्ति की तरह निरुपित करते हैं । उनके अनुसार
प्राण पहले हमारे फेफड़ों को सक्रिय करता है, फिर हृदय पर, फिर
रक्त प्रवाह पर और आखिरकार मस्तिष्क की कोशिकाओं में जहाँ
विचार जन्म लेते हैं । यही इच्छाशक्ति, बाह्य कर्मों को कारक
बनाती है । ‘शब्द-संसार’
में उन विशिष्ट कृतियों की भी चर्चा है, जिनमें मनुष्य के
अंतर्लोकों का विवेचन है ।
‘कनवर्सेशन्स
विद गॉड’
में डोनाल्ड वेल्स ने आत्मा, अंतःकरण मन की स्थितियों पर विचार
करते हुए यह अनुभव किया है कि आत्मा सृजनशील है और मन
प्रतिक्रियावादी ।
मृत्यु को लेकर दार्शनिकों ने अनेक तरह से सोचा-विचारा है ।
जिग्मंट वॉमन ने मरणशीलता और अमरत्व पर अपने विचारों को
समाजशास्त्रीय ढंग से प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया है कि
मृत्य एक भैतिक दुर्घटना ही नहीं, एक मनोवैज्ञानिक स्फार भी है
। मरने वाला चला जाता है, मगर अपने तमाम संबंधियों और मित्रों
में एक अवसाद छोड़ जाता है । इस तरह मृत्यु मात्र उतनी भर
नहीं, जिसे आती या जिसकी होती है, वह उसके पीछे छूटे हुए लोगों
के मन पर अनवरत छाई रहती है, वह दरअसल वितरित हो जाती है।
मृत्यु पर यह एक अलग ढंग का विश्लेषण है- जिसमें माना गया है
कि मृत्यु केवल एक जैविक इकाई की अनुपस्थिति भर नहीं, वह उन
तमाम संवेदनों और विचारों पर पुनराख्यान भी प्रस्तुत करती है,
जिनकी छाया में वह जैविक इकाई अपना वृहत्तर अस्तित्व बनाए हुए
थी । ज़ाहिर है यह पुनराख्यान विषाद के धरातल पर फैलता है ।
काम का दमन करने वाले पादरी, रेबाई और जैन साधुओं को छोड़ दिया
जाए तो कीट, पतंगों, पौधों में कुछ ऐसे हैं जिनमें मैथुनी
सृष्टि का अभाव है । हालांकि भारतीय चिंतन में मानसी सृष्टि की
चर्चा की गई है । शुरु में सृष्टि मानसी ही थी- विचार से ही
संतति संभव हो जाती थी । इसी के अवशिष्ट अब भी बच रहे हैं ।
काम का भाव आक्रामक है ।
पुरुषों की अप्रत्याशित कामपरक आक्रामकता से सशंकित नारी एक
महीन भयभरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त है । सूजन मिलर ने
अगेंस्ट अवर बिल में नारी के ऊपर किए जाने वाले अत्याचारों का
विवरण दिया है । कैलाश वाजपेयी ने इस संदर्भ में नारी विषयक
भारतीय धाराओं की विस्तार से चर्चा की है । लिन सेगल ने
‘इज
द फ्यूचर फीमेल’
कृति में नारी की विद्रोही किस तरह का सृष्टि संतुलन कर पाएगा
यह भविष्य की चिंता है ।
‘शब्द
संसार’
में ऐसे अनेक प्रश्न उठाए गए हैं । दुनिया के अनेक ज्वलंत
विषयों पर इस कृति में विचार किया गया । संस्कृति, सभ्यता,
भाषा, धर्म, दर्शन, बाज़ार, राजनीति, संबंध, विज्ञान, समाज आदि
विषयों पर केंद्रित ‘शब्द-संसार’
पढ़ कर हम अपने भीतर कुछ नया पाने का अनुभव करने लगते है और यह
आश्वासन यदि कोई किताब दे रही है तो यह उसकी विशेषता ही कही
जाएगी ।
डॉ. श्यामसुंदर दुबे
प्राचार्य, राघवेंद्र सिंह हजारी
शा.
स्नातक महाविद्यालय
हटा,
जिला-धार, मध्यप्रदेश
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