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भारतीय रंगमंच पर भरपूर नज़र
अशोक
चतुर्वेदी
कहने
को हिन्दी का इतिहास सात सौ साल पुराना बताया जाता है लेकिन
इसमें नाटक विधा का भारी दुर्लक्ष्य हुआ है। भारतीय वाड्गमय के
नाटकों की समृद्ध परम्परा के बावजूद ऐसा क्यों हुआ यह सोचने
जैसी बात है। आधुनिक हिन्दी रंगमंच को दस कमी को विदेशी और
अन्य भारतीय भाषाओं के रूपांतर के ज़रिए पाटने की बखूबी कोशिश
की है। ऐसे में स्वयं रंगमंच की गतिविधियों का समालोचना पूर्ण
दस्तावेजीकरण तो न के बराबर ही हुआ है।
योगेन्द्र चौबे की
'रंगमंच
:
परम्परा और प्रयोग'
ने इस दिशा में नई ज़मीन तोड़ी है। नाटय विधा के उद्भव और
विकास की सरसरी जानकारी देने के बाद लेखक समकालीन
रंग-गतिविधियों की पड़ताल शुरू कर देता है। आधुनिक रुझानों को
एक-एक करते हुए उनकी तमाम ख़ूबियों और ख़ामियों के साथ
वस्तुनिष्ठ ढंग से सामने रखा गया है।
योगन्द्र स्वयं सशक्त निर्देशक और दीक्षित रंगकर्मी होने के
नाते सुनी-सुनाई बातों के बजाए अनुभव की प्रामाणिकता के साथ
अपनी बात कहते हैं । चाहे वह रंगमंच की भाषा हो या भूषा,
स्वरूप हो या समस्या, हर पहलू का खुलासा उन्होंने
सिलसिलेवार किया है। कोई सौ पृष्ठों में ग्यारह सुगठित
अध्यायों को इस खूबी से संजोया गया है कि रंगमंच का कोना-कोना
आलोकित हो जाता है। खासतौर पर
'आधुनिक
रंगमंच में राजनीतिक चेतना'
तथा
'प्रस्तुति
प्रक्रिया से गुजरते हुए'
ये दोनों अध्याय इतनी ऊर्जा और आग्रह के साथ लिखे गए हैं कि
लगता नहीं कि लेखक महज एक रंगकर्मी है। उसके पास अपने समय की
वाज़िब पहचान है और बात कहने का सलीक़ा भी।
छत्तीसगढ़ की रंग-शैलियों और प्रस्तुति परम्परा का बखान पूरी
उदारता से किया गया है। नया किस तरह पुराना पड़ जाता है और
पुरानें में से नयी कोंपलें फूट पड़ती हैं इसे रूपंकर कलाओं
में संदर्भ में कहते-कहते योगेन्द्र अनायास से उद्घोष करते हैं
कि रंगमंच पर लोक-संवेदनाएँ धड़कती हैं और वह तभी तक सुसंगत
बना रहता है जबतक लोक के सरोकारों को उद्घाटित करता है।
यह पुस्तक रंगकर्मियों, समीक्षकों इतिहासकारों के लिए ही नहीं
रूपंकर कलाओं के छात्रों के लिए भी मूल्यवान है ।
अशोक चतुर्वेदी
पूर्व
संपादक, वेब दुनिया
ई.ए.सी.
कॉलोनी
रायपुर,
छत्तीसगढ़
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