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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। न्यूजीलैंड की चिट्ठी ।।

 

 

नवरात्रि और दिवाली की धूम


रोहित कुमार हैप्पी

 

न्यूज़ीलैंड में इन दिनों नवरात्रि और दिवाली की ख़ूब धूम मची है। भारतीय हिंदू मंदिर, राधे गिरधारी मंदिर, स्वामी नारायण मंदिर व शिव मंदिर में नवरात्रि का आयोजन चल रहा है। पूरे नवरात्रों में ड़ांडिया रास नृत्य जोरों पर है।

 

भारत में एक तरफ नवरात्रि हुआ करती थी तो दूसरी और रामलीला का आयोजन हुआ करता था। अपने यहाँ गुजरात व मुंबई-वाले गुजराती बहुल प्रवासी भारतीयों के कारण नवरात्रि के दिनों में ड़ांडिया रास नृत्य का खू़ब आयोजन होता है। हाँ, रामलीला वाली बात कभी नहीं जमी पर इस बार कुछ फीजी भारतीयों ने रामलीला की भी ठान ली। रामलीला देखने की ललक रखने वालों की मंशा भी पूरी हो गई।

 

अगले कुछ सप्ताह दीवाली आयोजन होते रहेंगे। विभिन्न भारतीय संगठनों के अतिरिक्त ऑकलैंड सिटी कौंसिल, वेलिंग्टन सिटी कौंसिल भी दीवाली मेलों का आयोजन करेगी। पिछले कुछ वर्षों से न्यूज़ीलैंड की संसद में भी दीवाली का आयोजन किया जा रहा है। दीवाली ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली है और अब यह पर्व केवल भारतीयों का त्योहार न होकर एक सार्वजनिक आयोजन के रुप में स्थापित हो चुका है।

 

भारतीय दुकानों पर इन दिनों विशेषत: सप्ताहांतों पर अच्छी चहल-पहल है। अधिकतर भारतीय दुकानों पर आजकल दीवाली सेल चल रही है। 

 

हाँ, खास तौर पर एक बात और वह यह कि न्यूज़ीलैंड के 19 वें गवर्नर जनरल श्री आनंद सत्यानंद अनेक दीवाली समारोहों में मुख्य-अतिथि के रुप में उपस्थित रहे व उनके साथ ही सांसद डा अशरफ चौधरी व फैमिली कमीशनर डा राजेंद्र प्रसाद भी सभी समारोहों में उपस्थित रहे।

 

जो प्रेम लुटाने आते हैं...

 दस्तक सुनकर मैं हतप्रभ दरवाज़े की ओर बढ़ जाता हूँ। यहाँ न्यूज़ीलैंड में अधिकतर लोग फ़ोन करके ही आते हैं  और मैं किसी के आने की प्रतीक्षा भी नहीं कर रहा था। फिर कौन होगा? शायद कोई मिशनरी या घर-घर सामान बेचने वाले बच्चे रहे होंगे!

 

मैं दरवाजा खोलता हूँ तो चार भारतीयों को अपने दरवाज़े पर खड़ा पाता हूँ। सोचता हूँ शायद गलती से मेरे घर आ पहुंचे हैं! सुबह के साढ़े दस-ग्यारह का समय रहा होगा। मेरी काम से छुट्टी थी और मैं इस समय तक बिना मुँह-हाथ धोए सुस्ता रहा था।

 

Òजी, मेरा नाम उमेश है...उमेश सोलंकी! हम लोग स्वाध्याय परिवार से हैं। यह मेरे मित्र और उनकी पत्नी है। और यह ठाकुर भाई हैं।’ उमेश हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाते हुए सभी का परिचय देते हैं। मैं भी बाकी लोगों को नमस्कार करता हुआ अंदर आने के लिए आग्रह करता हूँ।

 

हम सब अंदर बैठ जाते है। उमेश व उनके साथ आये एक बुजुर्ग स्वाध्याय परिवार के बारे में जानकारी देते हैं। इन चार लोगों के दल में से तीन अमरीका से आये हुए थे और बुजुर्ग सदस्य ऑकलैंड से ही थे किंतु हम परिचित नहीं थे। उमेश अमरीका में कम्प्यूटर इंजीनियर हैं व उनके साथी दम्पत्ति अमरीका में अपना कारोबार करते हैं।

 

बातचीत के दौरान पता चलता है कि स्वाध्याय से संसार को एक सूत्र में बांधने की धारणा रखने वाले पांडुरंग शास्त्री अठवाले के लगभग ब्यालीस अनुयायी इन दिनों न्यूज़ीलैंड के विभिन्न शहरों के भारतीयों के घरों में दस्तक देकर प्रेम-भाव बढ़ाने में लगे हैं। आजकल अनेक घरों में इनकी दस्तक जारी थी। मेरे घर पर हुई दस्तक भी ऐसी ही प्रेम-भाव वाली दस्तक थी। पांडुरंग शास्त्री अठवाले के जन्म-दिवस 19 अक्टूबर को गौरव दिवस के रुप मे मनाया जाता है। इस वर्ष 20 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक भक्ति फेरी लगाई जा रही है।

 

इस समय 8 लाख स्वाध्याय कर्मी संसार भर में अपने दम पर इसी प्रकार का प्रेम-भाव बनाने निकले हुए हैं। अकेले अमरीका से ही 300 लोग अन्य स्थानों पर निकले हैं। न्यूज़ीलैंड के अतिरिक्त ये लोग आस्ट्रेलिया, फिजी व अन्य देशों में भी भक्ति फेरी लगा रहे हैं।

 

चाय की बात हुई तो वे कहते हैं कि इस समय जब वे भक्ति फेरी पर हैं तो किसी के घर में खाना-पीना उनके नियम-विरुद्ध है। कोई मेहमान आये और चाय तक भी न ले - यह मुझे कब गवारा होता? यह ‘अतिथि देवोभव:’ वाली हमारी संस्कृति के भी तो अनुकूल न होगा! किंतु किसी के नियम या सिद्धांतों की अवहेलना भी तो अच्छी बात न होगी! मैं उनके व्रत पालन का सम्मान करते हुए अधिक आग्रह नहीं करता। पापा घर में ही थे! मेरी पत्नी के पापा इन दिनों हमें मिलने आये हुए हैं। वे एक बार पुन ‘कुछ तो लीजिए!’ का आग्रह करते हैं किंतु वे सब अपने व्रत पर अडिग रहे।

 

न्यूजर्सी के कम्प्यूटर इंजीनियर, उमेश भाई कहते है, ‘हम लोग अपना टाइम, टिकट और टिफ़िन लेकर निकलते हैं ताकि किसी पर बोझ न बने।‘

 

‘....और हम केवल आपसे संवाद चाहते हैं, कोई वाद-विवाद नहीं! हमें न चंदा चाहिए, न हम आपको किसी संस्था का सदस्य बनाने आये है। केवल विचारों को आदान-प्रदान होना चाहिए।‘ ठाकुर भाई उमेश की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं।

 

उनकी बातें सुनकर मुझे कबीर याद आते हैं, ‘जो घर फूँके आपणा, चले हमारे साथ।‘

 

इन लोगों का मानना है कि ईश्वर ने हमें यह शरीर देकर जो उपकार किया है तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम वह प्रेम व ज्ञान संसार में बांटे।

 

काफी समय तक वार्तालाप चलता रहता है। उन सब की बातें सरल, सपाट और स्पष्ट थी। ‘कल शाम हम लोगों ने यहाँ पास ही में एक स्नेह-मिलन रखा हुआ है। शायद आप कल व्यस्त होंगे!‘

 

कल शहर में दिवाली-मेला है और हमारा वहीं जाने का कार्यक्रम तय था। मैं पापा की ओर एक बार देखता हूँ तो लगता है उन्हें भी इनकी बातों में रस आ रहा है। मैं सोचता हूँ  ‘बालिवुडमय‘ दीवाली से इनके साथ समय बिताना अच्छा रहेगा।

 

‘नहीं, हम कल ज़रुर आएंगे।‘

 

‘हां, हम जरुर आएंगे।‘ पापा भी झट से हामी भरते हैं।

 

स्नेह-मिलन को स्नेहाभाव पैदा हो चुका था।

 

  रोहित कुमार हैप्पी
संपादक, भारत-दर्शन
न्यूज़ीलैंड

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