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सृजनगाथा


 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। लघुकथा ।।

 

 

प्रतिरोध


संजय कुमार

 

 

कथा-पाठ करते-करते दिवाकर की भौंए तन गयी थीं। भोजपुर जिले के एक गाँव में वाज़िब मजदूरी माँगने के सवाल पर किस तरह सामंतो ने दस दलित महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया उनके लोगों को बेरहमी से मारा, इसी विषय पर लिखी अपनी हालिया कहानी का पाठ वे नगर हॉल में शहर के बुद्धिजीवियों के बीच कर रहे थे। बीच-बीच में बताते भी जाते कि किस तरह जब वे गाँव में गये और उन दलितों के परिजनों से मिलकर घटना की जानकारी लेनी चाही तो दहशत के आगोश में समाये गाँव के सामंतों ने दारोगा को खिला पिला कर उन्हें और उनके साथी बुद्धिजीवी मित्रों को रोकने का पूरा प्रयास किया था।

 

अचानक पाठ के बीच में ही दिवाकर का मोबाइल फ़ोन बज उठा, माहौल में पैदा गरमाहाट ने दिवाकर के चेहरे पर शिकन ला दिया। झट बिना नम्बर देखे मोबाइल बंद कर दिया। अभी वे कहानी में लौट ही रहे थे कि दुबारा मोबाइल बज उठा। इसबार दिवाकर ने नम्बर देखा, लोगों से माफी माँगी और मोबाइल फोन रिसिव करते हुए किनारे गये। फोन घर से था। मामला गंभीर था। पत्नी बेहोश हो गई थी उन्हें अस्पताल मेंर्ती कराया गया था। किसी तरह से दिवाकर ने कहानी पूरी की। सुनाने के क्रम में स्वर में बदलाव आ गया था।

 

 दिवाकर के घर पहुँचने के पहले रास्ते में जो भी पड़ोसी मिलता अज़ीब निगाहों से उन्हें देख रहा था। पत्नी घर आ गई थी। लेकिन बार-बार बेहोश हो जाती। घर में अजीब सी ख़ोमोशी की चादर चढ़ी हुई थी। दिवाकर को अब तक सारी बातें मालूम हो गई थी। छोटा भाई जो एक कंपनी में नौकरी करता था, उसने दिवाकर की पत्नी के साथ दुर्व्यवहार कर दिया था। पूरे घर में सन्नाटा पसरा था। जब-जब पत्नी को होश आता और देवर द्वारा किये गये काम से आहत होकर वह बेहोश हो जाती। घटना के समय घर में मा-बाबूजी भी नहीं थे। दिवाकर ख़ामोश था। पत्नी के पास बैठे दिवाकर के पास मा ने धीरे से आकर कहा, 'बाबूजी बुला रहे हैं।' दिवाकर भारी मन से उठते हुए बाबूजी के पास गया। बाबूजी ने उसे समझाया- 'देखो, जो हो गया सो हो गया, बात को बढ़ने से रोकना होगा। अस्पताल में डॉक्टर को खिला पिला कर मामले को पुलिस तक जाने से रोक तो दिया है। ऐसा करो, सुबह की गाड़ी से बहू को लेकर उसके मायके पहुचा दो। कुछ दिन वहा रहने के बाद जब सब सामान्य हो जायेगा तो ले आना। घर की बात है, घर तक ही रहे तो अच्छा है।' दिवाकर ने 'हूँ' में जवाब दिया और उठ कर चल दिया। उसके अंदर वह उबाल नहीं दिख रहा था, जो मुसहर टोले में एक दबंग द्वारा दलित महिला के साथ किए गए बलात्कार के कारण उसके अंदर दिख रहा था। तब दिवाकर ने ही मामले को उठाया था और पूरे शहर में आंदोलन चला कर जिला प्रशासन पर दबाव बनाते हुए दबंग बलात्कारी को सींखचों के पीछे पहुचाया था। दिवाकर की एक जुझारू बुद्धिजीवी नेता के रूप में पहचान बन गई थी।

 

 अगले दिन अलसुबह ही पिताजी की बात मानते हुए दिवाकर ने पत्नी को ससुराल पहुचा दिया। हमेशा दूसरों के हक के लिए आंदोलन की बात करने वाला दिवाकर, अब ज़्यादातर ख़ामोश ही रहता था। बात मुहल्ला से होते हुए कई लोगों तक पहुच चुकी थी। दिवाकर महसूस करने लगा था कि मित्र और आसपास के लोग उसे अजीब निगाह से देखने लगे हैं। धीरे-धीरे लोग घटना को भुल रहे थे, लेकिन दिवाकर में बदलाव नहीं हो रहा था। वह और ज्यादा ही ख़ामोश रहने लगा था। दिन की बजाय वह देर शाम या रात में घर से निकलता था। शहर में अब दिवाकर की चर्चा नहीं होती। गोष्ठियों में भी वह नज़र नहीं आता।

 

अचानक एक दिन दिवाकर की पत्नी मायके से वापस घर आ गई। आते ही उसने दिवाकर से देवर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट करने को कहा। दिवाकर ने बुझी निगाह से देखा और बिना उत्तर दिए घर से बाहर चला गया। रात में दिवाकर के घर लौटने के बाद फिर पत्नी ने कहा कि आपके भाई ने अपराध किया है और उसे उसकी सजा मिलनी ही चाहिये। दूसरों को आप हक दिलाते रहे हैं। आज आपको क्या हो गया है ?' दिवाकर की ख़ामोशी नहीं टूटी। दूसरे दिन सुबह दिवाकर की पत्नी ने दिवाकर के पास जा कर बोली- 'मैं थाने रपट लिखवाने जा रही हूँ। आपको चलना है या नहीं ?' दिवाकर की ओर से कोई जवाब नहीं पा कर वह घर से निकल ही रही थी कि दिवाकर ने आवाज दी 'ठहरो मैं आ रहा हूँ'। और दिवाकर अपनी पत्नी के संग थाने पहुचा।

 

   संजय कुमार

सहायक समचार संपादक

प्रादेशिक समाचार एकांश

आकाशवाणी, पटना, बिहार - 800001

मो:099342-93148

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