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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

        

      हँसकर

       हँसकर जतलाया जा सकता है,कि हम रोते नहीं हैं,

       हँसकर बताया जा सकता है,कि हम चुप और उदास नहीं होते हैं,

       हँसकर यकीन दिलाया जा सकता है,

       कि चाहे हमारे भीतर झांककर देख लो,

       तुम्हें नहीं मिलेगी उदासी और ऊब,

       हँसकर प्रमाण दिया जा सकता है,कि हम अकेले और दु:खी नहीं हैं।

       हँसकर कह सकते हैं,कि हम प्रताडना से नहीं डरते हैं,

       हँसकर  बता सकते हैं कि कितनी कमजोर है धमकी और दहशत,

       हँसकर दिख सकता है,कि बेअसर हैं दूसरों की गालियां हम पर।

       हँसकर छला जा सकता है खुद को,

       माना जा सकता है,कि हम वह नहीं हैं जो हैं,

       बल्कि हम वह हैं जो हमारी हंसी बताती है।

       हँसकर पाली जा सकती है खुशफहमी,

       कि सदियों से रिडकने-घिसटने के बाद

       खून रिसते पैरों और टूटे टखनों के साथ,

       हम वहां पहुंचेंगे जहां के लिए हमने शुरुआत की थी,

       हँसकर माना जा सकता है,कि सांसों की यह यात्रा कठिन नहीं है,

       हँसकर हो सकती है जीवन की बात,

       हँसकर भूला जा सकता है कि हम मर रहे हैं।

       हँसकर लोगों को मूर्ख बनाया जा सकता है,

       हँसकर, लोगों को मूर्ख बनाकर ढूंढे जा सकते हैं कुछ तंग रास्ते,

       जहां से गुजरना जीवन और चलने की तरह जरुरी बन गया है।

       हँसकर कही जा सकती है वह बात, जो घुटती है भीतर,

       जिसका सच सारा मांस नोचकर छोड जाता है हडिडयां...।

       हँसकर रोया जा सकता है,

       हंसने से बेहतर नहीं है कोई तरीका लोगों के सामने रोने का।

       हँसकर टाले जा सकते हैं जीवन के प्रश्न,

       हँसकर बचा जा सकता है सच और मुद्दे की बातों से,

       हँसकर बदले जा सकते हैं गंभीर नारे,

       हँसकर मुठ्ठी भर रिडकती इच्छाओं के लिए रास्ता बनाया जा सकता है।

       हँसकर डाला जा सकता है खुद को बचाने के लिए पर्दा,

       हँसकर छुपाया जा सकता है,अपने हिस्से का जीवन।

       हँसकर बचा जा सकता है लोगों की हंसी से,

       हँसकर बना जा सकता है जोकर।

       हँसकर कितना खोखला हो गया है आदमी,

       हँसकर कब तक समय की मांग को पूरा करता रहेगा आदमी,

       हँसकर कब तक खुद पर हंसता रहेगा आदमी।

   तरुण भटनागर

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कविताएँ

क्रांति

- अभी तो

- नदी नहीं जानती

- सभ्यता के अवशेष

- पिता

- नहीं, आज नहीं

  तरुण भटनागर

- हँसकर

- उस शाम

- लकडहारिन

रामेश्वर कांबोज

- बच्चे और पौधे

- एक बच्चे की हँसी

भगतसिंह सोनी

- चार कविताएं

 

 

 

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