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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

बच्चे और पौधे

 

लहलाते रहेंगे

आँगन की क्यारियों में

हिलाकर नन्हें- नन्हें  पात

सुबह शाम करेंगे बात

प्यारे पौधे ।

पास आने पर

दिखलाकर पखुड़ियों की

नन्हीं-नन्हीं दतुलियाँ

मुस्काते हैं

फूले नहीं समाते हैं

ये लहलाते पौधे ।

मिट्टी, पानी और उजाला

इतना ही तो पाते

फिर भी रोज़ लुटाते

कितनी खुशियाँ !

बच्चे.....

ये भी पौधे हैं

इन्हें भी चाहिए

प्यार का पानी

मधुर मधुर स्पर्श की मिट्टी

और दिल की

खुली खिड़कियों से

छन-छनकर आता उजाला;

तब ये भी मुस्काएँगे

अपनी किलकारियों का रस

ओक से हमको पिलाएँगे

जब भी स्नेह-भरा स्पर्श पाएँगे

बच्चे पौधे, पौधे बच्चे

बन जाएँगे 

घर आँगन महकायेंगे     

  रामेश्वर कांबोज

 ◙◙◙

 

कविताएँ

 क्रांति

- अभी तो

- नदी नहीं जानती

- सभ्यता के अवशेष

- पिता

- नहीं, आज नहीं

  तरुण भटनागर

- हँसकर

- उस शाम

- लकडहारिन

रामेश्वर कांबोज

- बच्चे और पौधे

- एक बच्चे की हँसी

भगतसिंह सोनी

- चार कविताएं

 

 

 

 

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