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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। कहानी ।।

 

 

कड़वा सच


स्वर्ण ज्योति

 

विशाल कोठी या कहें भव्य इमारत। बडा-सा फ़ाटक और दोंनों ओर विशाल बुर्ज़ को देखकर किसी महल सा भ्रम होता है। बुर्ज़ के एक ओर ठसकेदार वर्दी में खडा दरबान । बडी-बडी मूँछों के नीचे शायद ही कभी सिमत की रेखा खिंचीं हो ।  कभी-कभी उसे देख कर बुत-सा आभास होता है । फाटक के अंदर झाँक कर देखा जए तो अंदर दूर तक लाल और सफ़ेद पत्थरों से बना सुन्दर रास्ता नज़र आता है जैसे कोई कालीन बिछा हो रास्ते के दोंनों ओर पीले सेवंती के फूलों की बाडें नज़र आती है। दूर घर का विशाल दरवाज़ा जिसे देखकर पुराने किले के दरवाज़े का  भ्रम होता है  सारा सामने का दालान फूलों से और पीछे का फलों के पेडों से भरा था। दूर से देखने पर किसी  फॉर्म  हॉउस सा प्रतीत होता था 


   इतना विशाल और भव्य खूबसूरत किसी राजा-महाराजा के महल के समान परन्तु निःशब्द और निस्तब्ध । बस फाटक पर वह बुत सा दरबान और दूर छोटे से झरोखे में उदास आँखें लिए महाराजिन। क्या पकाएँ किसके लिए पकाएँ की दुविधा में खटर-पटर करती हुई । घर की मालकिन को किसी ने भी नहीं देखा  था । शायद देखा भी होगा तो एकाध क्षण के लिए । पता नहीं घर की चार दीवारी में कैद कैसी ज़िंदगी जी रही थी । सभी को वह एक भूत बँगला सा ही प्रतीत होता । उस छोटे से पहाडी गाँव में वह कोठी किसी अजूबे से कम नहीं थी।


  एक मैं ही थी जो उस कोठी की मालकिन की सब कुछ थी । सखी-सहेली राज़दार और सारे रिश्ते-नाते मुझी से जुडे थे विपुला के । हाँ विपुला ही नाम था उसका। नाम के अनुरूप वह अगाध ऐश्वर्य की स्वामिनी थी। पर शायद विधाता ने उसे एक तरफ़ा साम्राज्य ही दिया था उसे भोगने का अधिकार नहीं यह कैसी विडंबना थी।


   विपुला से पहली मुलाकात बडी ही दिलचस्प थी। शायद १०-१२ साल पहले की बात है । उस छोटे से पहाडी इलाके में मेरे पतिदेव की नौकरी लगी थी । हम लोग अपने सरकारी बँगले में साजो-सामान सहित आ गए थे । अभी मैं अपना बिखरा सामान समेट कर सजा ही रही थी कि एक मीठी-सी खिलखिलाहट सुनाई दी और साथ में एक कर्कश आवाज़ भी । ये कैसा विरोधाभास ...सोच कर खिडकी से बाहर झाँका था । एक १५-१६ साल की मासूम सी लडकी दिखाई दी जो दौड-दौड कर हँस रही थी और उसके पीछे थी एक महिला । शायद माँ या काकी होगी  " ठहर करमजली रुक कहाँ जा रही है । ख़बरदार जो उस तरफ पाँव भी रखा तो,  न जाने क्या कहर ढा कर आएगी अभी-अभी वे लोग आए हैं।"


  हमारे ही विषय में वह कह रही थी यह तो स्पष्ट हो गया । वो हँसती जाती और कहती जाती "जाने दो न,  सुना है वो बहुत सुन्दर है एक बार मिल आने दो न, मैं कुछ नहीं कहूँगी बस दूर से देख कर आ जाऊँगी।"


  उस पहाडी इलाके में उससे यही मेरा पहला परिचय था । मुझे देखने की उत्सुकता उसे इतनी थी कि चाची को चकमा देकर वह भाग आई थी और हमारे बँगले के दालान में आ खडी हुई थी।  बस एक क्षण के लिए मेरी आँखों के आगे  धुँधलका छा गया - वह उस कडाके की सर्दी में भी सिर्फ़ एक ढीला-ढाला सलवार कमीज़ पहने खडी थी । पहाडों का रंग उसे कुदरत ने दिया था । सुनहरा या भूरा या मिला-जुला लंबें बालों को बडी ही बेतरबीती से बाँधा गया था दुबली-पतली-छरहरी-सी उस कन्या की आँखों में ऐसा जादू था कि कोई भी बेहोश हो सकता था । सुतवाँ नाक और लाल कपोल उस पर नुकीली ठुड्डी । क्या ऐसा रूप इन पहाडों पर हो सकता है मैनें सोचा भी नहीं था यह पहाड "मेनपाट"शरणार्थी  तिब्बतियों के के लिए  प्रसिद्ध था।


  मैंने उसे अंदर बुलाया तो वह धीरे-धीरे कदमों से अंदर आने लगी । उसकी चाल देखकर मुझे उन सुन्दरियों का ध्यान आ गया जिन्हें बडे जतन से प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कैटवॉक  सिखाया जाता है और फिर भी वे सुन्दरियाँ अपनी चाल में वह जादू नहीं भर सकती जैसा उसकी चाल में मैंनें उस वक्त देखा । उसकी चाल में किसी भी रैंप पर हो रहे कैट वॉक को चुनौती देनी की काबलियत थी । शायद रोज ढलान से पानी लाने कि लिए सर पर एक या दो मटकी को उठाकर चलने का अभ्यास था । जो कमर खुद-ब-खुद बल खा जाती थी ।


 
  उसकी बात याद आयी  "सुना है बहुत खूबसूरत है वो" मेरे लिए कहे गए शब्द थे पर शायद उसने कभी आईना नहीं देखा था या शायद उसे अपनी खूबसूरती का कोई अंदाजा नहीं था।  जैसे ही वह अंदर आई मेरी पहाडिन नौकरानी ने उसे डपटते हुए कहा "क्यों री यहाँ क्यो चली आई । जा बाहर जा  जाने अब क्या होगा "उसकी डपट सुन कर वह हँसती हुई हिरणी-सी कुलाँचे भरती हुई दौड गई।
मैंने पूछा "क्यों बाई उसे क्यों भगा दिया कितनी प्यारी है डाँटने क्यों लगी" उसने छूटते ही कहा "मेमसाब आप तो इससे दूर ही रहना, हाँ प्यारी है, बहुत सुन्दर है, पर जहर बुझी है । जहर बुझी न जाने कैसा भाग लिखा कर लाई है विधाता से,  कैसे बेडा पार होगा इसका"

"क्या मतलब जहरबुझी से " मैंने पूछा

"कुछ न पूछो मेमसाब इसने कुछ अच्छा कहा और उसका काम तमाम ।" मन नहीं माना भला कभी ऐसा भी होता है । बचपन में नानी कहा करती थी कि जब भी बोलो अच्छा बोलो, न जाने कब वाग्देवी सरस्वती जुबाँ पर बैठ कर जो भी कहा उसे सच करा दे पर भोले मन को यह बातें कहाँ समझ में आती थी परन्तु आज बाई की बातों ने उस बचपन की बात की याद करा दी।
उसके इतना कहने पर भी मेरा मन उसी से मिलने के व्याकुल बना रहा । जरा मैं भी तो देखूँ उसका कहा कैसे फलता है?
 

बँगले के इस बाजू ही उसका घर था । घर क्या एक छोटा सा कमरा नुमा था । उसकी चाची टोकरियाँ बुना करती  और कालीन में कढाई का काम करती । मेनपाट में बने कालीन शहर के बडे साहबों के घरों के बैठक की शान बनते थे । इतना अच्छा और खूबसूरत हाथ बने कालीन मैंनें कहीं नहीं देखे थे ।


  "
विला-विला जब देखो चाची बुलाती रहती परन्तु विला को याने विपुला को तो फुरसत ही नहीं रहती "


   रोज सुबह की सैर को जब मैं निकलती तो मैं दास्ताने मफ़लर और दो-दो ऊनी स्वेटरों के होने पर भी मेरी कंपकंपी छूटती रहती । वहाँ शीतलहर ऐसी चलती कि धमनियों में बहता खून भी बर्फ़ बन जाए । और विपुला सुबह-सुबह बस वही ढीला-ढाला पहनावे पहने घर का दालान झाडती रहती । उसे देखकर बातें करने का बहुत मन करता पर शायद उसे ही अपने शापित जिह्वा के कारण ग्लानि होती इसी कारण वह कभी भी बात नहीं करती बस एक हल्की सी मुस्कान बिखेर देती बडी मुश्किल से मैंनें उसे एक दिन बुलाया " विला इधर तो आओ मुझे तुमसे कुछ कहना है ।" वह हँसते हुए आ खडी हुई बोली" क्या है जोदी"


   मेरे नाम को तोड कर उसने जो बना लिया था और उसी में दी जोडकर जोदी । अच्छा लगा मुझे नया संबोधन सुन कर


   "
विला तुम कालीन नहीं बुनती?" उसने हँसते हुए कहा "बुनती तो हूँ।"


   मैंनें देखा - हँसते समय उसके ठुड्डी पर एक गहरा गढ्डा-सा बन जाता है जो हँसी खत्म होने पर भी थोडी देर रहता है । सच ही है कमल कीचड में ही खिलता है । वाह रे विधाता, तेरा कैसा विचित्र खेल, किसी को सभी कुछ तो किसी को कुछ भी नहीं ।


   मेरे साथ विला को बात करते देख कर उसकी चाची दौडी आई "अरे करम जली इनसे यहाँ क्यों बात कर रही है कोई कहर टूट पडेगा तो हम कैसे करेंगें" कह कर उसे खींचती हुई ले गई।


   विला के चाची का विला ही खज़ाना थी । चाहे ज़बान की कितनी भी कर्कशा थी पर विला पर जान छिडकती थी । उसकी एक ही तमन्ना थी कि किसी तरह विला का ब्याह हो जाए तो वह गंगा नहा ले।


   हमारे अहाते में अमरूद का एक बडा सा पेड था । उसमें बहुत से अमरूद लगते थे। कुछ सालों की नौकरी के बाद पतिदेव ने यहीं पर एक बँगला खरीद लिया था उसी अहाते में दीवार के पास वह पेड था । विला को जब-तब मैं अमरूद देती थी । एक दिन विला ने अचानक से माँग की उसे कुछ अमरूद चाहिए अपने दोस्तों को खिलाने के लिए । मैंने न जाने कौन सी धुन में कह दिया कि "जाओ जाकर तोड लो" । फिर क्या था उसने ढेर सारे अमरूद तोड लिए और जाते-जाते कह गई "जोदी बहुत बडा और घना पेड है बहुत अमरूद लगे हैं।" शायद वह जाते-जाते अपनी जुबाँ का विष बुझा बाण चला गई थी कि  हफ़्ते भर के अंदर वह बडा घना फलों से भरा पेड ठूँठ बन कर रह गया । पर क्या वह सच में विष बुझा था? विश्वास नहीं  हुआ क्योंकि उसी हफ़्ते दीवार में एक दरार दिखाई दी कॉन्ट्रेक्टर से पूछा तो उसने कहा" मेमसाब यह तो होना ही था क्योंकि उस बडे पेड की जडें दीवार को खोखला बना रही थी । मैंने सोचा था  फलों का मौसम बीत जाए तो पेड कटवाँ दूँगा। अब तो पेड ठूँठ हो गया है, कटवा कर दीवार की मरम्मत करवा लें वरना बँगले की दीवार को भी नुकसान हो सकता है।


   विला का ही ख्याल आया, अच्छा ही हुआ जो उसने अपनी जुबाँ को खोल दिया वरना फलों का मौसम बीत जाने तक तो दीवार तो बचती नहीं और बँगले को भी नुकसान होता । उसका शाप था या वरदान कुछ समझ में नहीं आया। शायद सभी के साथ यही हुआ था। नौकरानी की बात याद आई कि विला ने पिछली गरमी में उसकी (नौकरानी) की बेटी के घने बालों की तारीफ़ करते हुए कहा था "काकी तोरी छोरी के केस तो बहुत लँबे और सुन्दर हैं" बस महीने भर में उसकी बिटिया के बाल झड गए परन्तु क्या यह विला की शापित जुबाँ थी ? उसकी बेटी बहुत दिनों से बीमार-सी थी । बालों के अधिक झडने का कारण जब पूछा तो पता चला कि उसे अन्दर ही अन्दर टॉईफाईड का बुखार सता रहा था । विला के कारण ही तो उसके बुखार का पता चला ऐसा किसी ने क्यों नहीं सोचा। और लक्खू भेड वाले ने भी तो विला को ही ताना दिया था। उसकी मोटी-ताजी भेड को देखकर विला ने कहा था "चाचा आप की भेड से तो खूब ऊन निकलेगा और  वही भेड मर गई पर बाद में पता चला  कि उस भेड को कोई ऐसी छूत की बीमारी थी जिससे अन्य भेडें भी मर जाती । अब आप ही निर्णय करें विला की जुबाँ कैसी थी?


   नानी कहा करती थी जहाँ दाना-पानी होगा वहीं बसेरा होगा। सच ही है । कुछ समय बाद हमें वह गाँव छोड कर जाना पडा । जाने से पहले मैंने विला से मिलने की सोची, उसे बुला भेजा । "विला हम लोग जा रहें हैं पता नहीं फिर कब आएँगें, एक बात कहनी है, तुम बहुत अच्छी हो, प्यारी हो, बस सबके बीच जरा सोच-समझ के बोला करो।" उसने हँसते हुए कहा "जोदी मैं कौन-सा झूठ कहती हूँ या गलत कहती हूँ जो सच है वही तो कहती हूँ"।


   "
हाँ विला तुम सच कहती हो पर शायद तुम्हें पता नहीं सच कडवा होता है।" हमेशा हँसती-मुस्काती विला की आँखों को मैंनें भरा देखा । उसका चेहरा बिगड सा गया था पर उसकी ठुड्डी पर तब भी गहरा गढ्ढा बना था ।


   हम लोग वहाँ से निकल गए । मैंने घर को न तो बेचा और न ही किराए पर दिया । बडे जतन से सारा सामान सहेज कर रख दिया गया । मेरे दालान में अब भी अमरूद के पेड का ठूँठ खडा था । मैंने उसे वैसे ही रहने दिया ।

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   आज बरसों बाद यहाँ वापस आना हुआ । सभी कुछ वैसे ही था, कुछ भी नहीं बदला था । बस इस बाजू का कमरे नुमा घर अब नहीं था । विला कहीं नहीं थी । उससे मिलने की उत्सुकता बराबर  बनी रही । अचानक एक दिन अर्दली ने एक पत्र लाकर दिया । पत्र खोलते ही लगा कि जैसे विला खडी है- जो दी कहा था न तुम्हें कहीं से भी ढूँढ लूँगी तुम्हारी खुशबू से पता चल गया कि तुम आ गई हो दूर जो बडी कोठी दिखती है वह मेरी ही है कभी मिलने आना तुमसे बहुत बातें कहनी है ।  याद आया विला हमेशा कहा करती थी " जोदी क्या मक्खन लगा कर इत्र से नहाती हो जो इतने मुलायम हाथ है और इतनी प्यारी खुशबू आती है तुमसे । तुम्हें तो मैं कभी भी कहीं भी पहचान लूँगी।  शायद सच ही कहा था उसने मेरे आने के कुछ ही दिनों में उसने मुझे बुला भेजा। उस विशाल कोठी के विषय में सुन रखा था कि वह कोई भूत बँगला जैसा है, पर उसमें विला रहती है सोचा न था। विला के पास इतना बडा बँगला कैसे आया वह कैसी होगी और भी न जाने कितने सवालों के जवाब जानने को उत्सुक मेरा मन खुद-ब-खुद विला की कोठी के सामने जा खडा हुआ था। और तब से जब-तब आना-जाना लगा रहता ।


   मेरे आने पर उस बुत नुमा दरबान के मूँछों के नीचे  सिमत की रेखा खिंच जाती और महाराजिन की रसोई में पकवान भी बनने लगते ।  विला बिल्कुल नहीं बदली थी ।  वही आँखें बेहोश करने वाली वही बेतरबीती से बँधे बाल वही ठुड्डी में गहरा गढा और वही ढीला-ढाला सलवार उसे देखकर नहीं कहा जा सकता कि वह