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ब्रिटेन
से प्रवासी कलम
भीगता
पानी
शैल अग्रवाल
कहते हैं जब अहसास मिट जाते हैं तो सुबह दुपहर शाम सब
एक से ही लगने लगते हैं
बेरंग और फ़ीके-फ़ीके। पत्नी की मृत्यु के बाद बुढ्ढा भी
अकेला रह गया था। शायद उसके दिनरात भी कहीं अटक गए थे...खो
गए थे रिश्तों की इस दौडती-भागती भीड़ में। रोज-रोज ही
खाँसता-कराहता उसका हर बूढा दिन बडी मुश्किल से एक और रात को
निगल पाता था और गले में फँसे कफ़ से सारे सपने अक्सर खुली
आँखों में ही जमे रह जाते। अकडी-झुकी कमर और दुखते घुटनों के
संग बिस्तर से निकल पाना,
घूमना-फिरना अब उसके लिए आसान नहीं था। थोडी भी हलचल और खुशी
उसके बूढे
बीमार
दिल में तब होती,
जब बच्चे स्कूल जाते या फिर स्कूल से वापस घर आते।
पर किसी के भी पास समय नहीं था कि पल भर रुक कर उसके पास बैठता,
उससे दो बातें करता। बस उनके पैरों की आवाज़ें,
घिसटते बस्तों का शोर...यही सब सुनकर बुढ्ढा खुश और तृप्त हो
लेता था। अक्सर कमरे की डयोढी पर आ बैठता और उसके बाद फिर एक
लंबा इंतजार करता शाम का... जब बच्चे फिरसे घर आएंगे...
दौडेंग़े-भागेंगे--- आपस मे लडे झगडेंग़े...हँसें और
चहकेंगे। बुढ्ढा अब आवाज़ों की परछाइयों से मन बहलाना सीख चुका
था। वह खूब अच्छी तरह से जानता था कि यदि इस सन्नाटे से नहीं
जूझा तो एकदिन बस यही ख़ामोशी उसे ले डूबेगी।
उस दिन अँधेरे को पी-पीकर रात और भी उद्दंड और डरावनी हो चली
थी। बेतरतीबी से उड़ती हवाएँ सीटी पर सीटी मारे जा रही थीं और
दर्द किसी शरारती बच्चे सा बारबार उसकी छाती के इर्द-गिर्द ही
घूम रहा था। अधजली लालटेन के अँधेरे में बाप को कसकर छाती से
लगाए पगली गौर से उसकी हर उठती-गिरती साँस को गिने जा रही थी।
एक,
दो,
तीन,
चार... उखड़ती साँसों की इस उधेड़बुन में न तो पगली ही पंप दे
पाई और न बुढ्ढा ही माँग पाया। बिजली को भी अक्सर ऐसे ही मौकों
पर जाना होता है। अचानक पलकों पर आए आँसू सा बुढ्ढे का सर एक
ओर ढुलका और वह चला गया...चुपचाप,
जैसे जीता था वैसे ही... बिना किसी धमाके के या चीख पुकार
के...किसी को कोई तकलीफ़ दिए बगैर ही।
उसने तो किसी से एक गिलास पानी तक का नहीं माँगा था। जीवन की
तरह आज उसकी मौत भी इतनी साधारण और महत्वहीन थी कि यदि शव की
अन्तिम क्रिया की जिम्मेदारी ना होती तो शायद घर में किसी को
पता तक नहीं चल पाता।
जल्दी -जल्दी सब काम निपटाए गए। लाश को ज्यादा देर तक रखना ठीक
भी तो नहीं और ज्यादा रोनेधोने से भी क्या फ़ायदा
? भरी
पूरी उमर में गया है बुढ्ढा। वैसे भी साठ-सत्तर
की उमर कोई कम तो नहीं होती
!
साधू-सन्त
था जो हाथ
पैरों से चला गया- कम से कम किसी से सेवा तो नहीं करवाई। घर
में
चारो-तरफ
जितने करूँ उतनी ही बातें थीं।
दूर खडा वह नहीं सोच पा रहा था कि ऐसे में आखिर उसे अब और क्या
करना या कहना चाहिए
?
वैसे
तो वह यह सब सुनते ही दौडा चला आया था पर शब्द कोई तीतरबटेर
तो नहीं जो हाथ लपकाकर पकड़े और पका-सजाकर
चाँदी की तश्तरी में पेश कर दे। आज तो वैसे भी वे पकड में ही
नहीं आ रहे थे। होठों तक आ-आकर
फुर्र हो जा रहे थे। उसके कान और सर के अन्दर-अन्दर
ही भिनभिनाए जा रहे थे। पहले वह अपने अन्दर के इन सायों से तो
लड ले,
फिर दूसरों के बारे में सोच पाएगा। वैसे तो उसे भी यह पता है
कि हम सभी अपने अन्दर कई-कई
साए लिए घूमते हैं,
फिर उसमें और इस सामने बैठी पगली में इतना फर्क क्यों है?
इस
पगली को तो कभी उसने अपने सायों से डरते नहीं देखा। शायद उसने
गठरी में कहीं एक जादूई आइना छुपा रखा है और जब जी चाहे,
वह इन सायों को देख लेती है,
पहचान लेती है
-
बातें कर लेती है। यह तो शायद उन्हें दुलार और धिक्कार तक सकती
है
!
चेहरा ज्यादा डरावना हो तो पगली रोती,
चीखती-चिल्लाती
या फिर कभी कभी तो बिल्कुल ही खामोश तक हो जाती। झट बाप की
गोदी में छुप कर सो जाती। पर अगर कभी साया जाना-पहचाना या
प्यारा निकल आए,
तो पगली का लाड़ आकाश छू लेता... घंटों का चूमा-चाटी का
सिलसिला शुरु हो जाता। ढेर सारी बातें होतीं। यहाँ तक कि गीत
संगीत सब होता और होते जी भरकर शिकवे-शिकायत-- मानो दो
पुरानी सहेलिया मिल बैठी हों। पर इस पगली के बारे में वह क्यों
इतना सब सोचता और जानता है?
क्या
इसलिए कि कभी वह भी इसके बहुत पास था--आखिर
बहन है उसकी। पर अब उसके दुख से कलेजा करूँ को क्यों नहीं
आता...समझ में नहीं आ रहा कि करूँ में आई इस कडवाहट को कैसे और
कहाँ थूके?
चुपचाप
ही वह सब कुछ पी गया--
सबसे अलग-थलग,
दूर
दूर,
वहीं खडे-ख़डे
ही...
अपनी ही दुनिया में कैद पगली का यूँ रोना-चिल्लाना,
हँसना-गाना पूरे घर के लिए एक सर-दर्द बनता जा रहा था। कैसे
उठना है - कहाँ बैठना है?
कब
क्या
करना
चाहिए- किसी
भी
बात
का
मानो
कोई
शऊर
ही
नहीं
रह
गया
था
उसे।
पर
अब
सेठ
विश्वंभर
दयाल
की
लाडली,
इकलौती
बेटी
को
घर
के
बाहर
भी
तो
नहीं
फेंका
जा
सकता - विशेषकर
तब,
जब
पूरा
परिवार
ही
सेठ
जी
के
रहमो-करम
पर
ही
पलता
था
!
यूँ तो सेठ विश्वम्भर दयाल,
सेठजी से बुढ्ढा कब बने,
उसे भी याद नहीं - पर अब कोई फरक भी नहीं पडता - हाँ शायद
उस दिन,
जब उन्होंने गल्ले की चाभी पहली बार अपने भाई दीनदयाल को
पकड़ाई थी - या फिर शायद उस दिन जब उनकी बीमार लाडली बेटी को
पहला दौरा पडा था और परेशान बाप सारे काम-धंधे भूलकर बस
डॉक्टरों और हकीमों की चौखट
से
ही
बँधा
रह
गया
था। मंदिरों
में
सर
पटकता
दिन-रात
उसके
लिए
दुआ
माँगता
फिर
रहा
था
और
उसकी
हर
नामुराद
प्रार्थना
उसकी
पगली
बेटी-सी
गले
लगी
यूँ ही उसके
कांधे
पे
सर
रख,
सुबक-सुबककर
सो
जाया
करती
थी।
पर आज तो हद ही कर दी थी इस पगली ने। अर्थी के लिए आई सारी
मालाओं को तोड ड़ाला था उसने। चिन्नी-चिन्नीकर कुछ फूल बाप पर
डाले,
कुछ खुदपर और फिर एक एक पंखुड़ी चुनकर बडे ध्यान और धैर्य से
बाप के ऊपर सजाने लगी। इतनी आहिस्ता और हिफाजत से मानो ज़रा भी
आहट पर बुढ्ढा उठ बैठेगा-- हमेशा की तरह ही पूछेगा
'
सोई
नहीं
बेटा
? '
और
फिर
गोदी
में
सर
खींच
कर
उसका
माथा
चूमेगा--
बाल
सहलाएगा। पर
ऐसा आज कुछ
भी
नहीं
हुआ। बूढ़े बाप
में
कोई
हरकत
नहीं
थी। थककर
पगली
ने
खुद
ही
मुरदे
बाप
की
गोदी
में
सर
रख
दिया। यही
नहीं
उसे
नर्सरी
राइम्स
तक
सुना
डालीं। जाने
क्या क्या
गाने
भी
गाए। कभी
बाप
की
आँखें
खोलने
की
कोशिश
करती
तो
कभी
अपनी
तरफ
उसका
मृत
चेहरा
घुमाना
चाहती। यहाँ तक
कि
तैयार
शव
की
बन्द
आँखों
पर
दौड़ क़र
चश्मा
तक
लगा
आई वह तो,
शायद
बाप
को
ठीक
से
दिख
नहीं
रहा
है कि
उसके
पास
कौन
बैठा
है
और
उसे
पहचान
नहीं
पा
रहा
हो?
फिर
अचानक
खुद
ही
पूरे
होश
में
भी
आ
गई। सर
हिलाती-डुलाती
कहने
लगी,
देखना,
मैं
रोउँगी
तो
कतई
ही
नहीं। पापा
कहते
थे
न
कि
'
बेटा
जब
मैं
मरूँ,
तो
तू
बिल्कुल
ही मत
रोना,
चाहे
पूरा
घर
कितना
ही
क्यों
न
रोए-- मैं
सबका
रोना-धोना
तो
बर्दाश्त
कर
लूँगा,
पर
तेरे
आँसू
नहीं
देख
पाउँगा। वचन
दे,
मेरी
गुडिया
तू नहीं
रोएगी,
वरना
मेरी
आत्मा
तो बहुत
ही
तकलीफ़
पाएगी।‘
और
जहाँ तक
बाप
की
तकलीफ़
का
सवाल
था
पगली
पूरे
होश
में
थी। और
वह
सच
में
नहीं
रोई। बस
फटी
फटी
आँखों
से
सब
देखती
रही। समझने
की
कोशिश
करती
रही।
‘धूप
चढ रही है देर करने से क्या फ़ायदा
? ‘कह
कर घरवालों ने पगली को शव से अलग कर दिया और अर्थी लेकर चल
पडे।‘मैं
भी जाउँगी पापा के साथ। मुझे भी शमशान जाना है।‘--
पगली को अब एक नई रट लग गई थी पर मरघटे पर औरतें तो नहीं
जातीं... सबको ही यह बात पता थी। किसी ने पीछे आती पगली को
बाँहों में जकडा तो किसी ने धूल में लिथडता आँचल सँभाला पर
जाने कहाँ से पगली में गजब के बल और हठ आ गए थे'
कहा—‘
कहाँ ले जा रहे हो मेरे पापाको आखिर तुमलोग--करूँ
खोलो इनका
'--
आहत पगली करीब-करीब
रोती-सी गुर्रा रही थी
'हटो
सब
करूँ पर से हटाओ यह कपडा
--
साँस लेने दो पापा को।
'
फिर
यकायक खुदही आग-आग-पानी-पानी
चिल्लाने लगी वह।
'
पानी
लाओ-- आग
बुझाओ। देखो
मेरे
पापा
जल
रहे
हैं--'
पगली
रोती
रही। हँसती
और
गाती
रही
और
तीन
घंटों
में
वहाँ मरघटे
में
उसका
सबकुछ
जलकर
भस्म
हो
गया।
चुपचाप खडा वह बस दूर से देखे जा रहा था इस पगली को। एकबार तो
उसका भी मन किया कि आगे बढक़र पगली को समझाए,
सान्त्वना दे। आखिर बहन है उसकी,
करूँबोली ही सही। बचपन में भैया-भैया कहकर आगे पीछे घूमी
है-- सुख-दुख बाँटे हैं उसके। पर अंत में ऐसा कुछ भी नहीं
किया उसने...क्योंकि सिर्फ कह देने भर से,
करूँबोला बेटा या भाई बना लेने से ही तो कोई बेटा या भाई नहीं
बन जाता। बाप की भी तो कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं-- जैसे
बेटे से अपेक्षा की जाती है। एक ही झटके में उसे दूध में पड़ी
मक्खी-सा बाहर निकाल फेंका --वह भी इन घरवालों के कहने पर।
कैसी मक्खन-सी चिकनी आवाज मे कहा था बुढ्ढे ने-- '
जाओ बेटा,
अपनी जिम्मेदारी खुद उठाओ। अच्छा ही है अगर तुम मेरे आगे अपने
पैरों पर खडे हो जाओगे। और फिर तुम्हें इस पगली को भी तो
संभालना है?' क्यों
संभाले वह इस पगली को--
क्यों
निभाए यह फालतू की जिम्मेदारी--
जिम्मेदारी
पर उसे याद आया कि शमशान में आग शायद उसे ही देनी हो। वह दौड
पड़ा--कहीं
खामखव्वाह देर न हो जाए।
शमशान में चिता धू-धू जल रही थी। दूर से ही प्रणाम करके वह
चुपचाप घर लौट आया पत्नी और बच्चों के पास। वहाँ घाट पर किसì |