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उड़िया
रचना
बेटी
सुकान्त साहू
सुचरिता
आईने के सामने खड़ी हो चकित हो गई। वह दर्पण में यह क्या देख
रही है अपनी सूरत ऐसी है जानने के बाद मानों उसके सारे शरीर
में विषाद दौड़ गया। क्या यही है उसका मुखड़ी नहीं, जरूर
?
दर्पण झुठ बोल रहा है। इस प्रश्न ने उसे उद्वेलित किया है, जब
से उसने आईना देखने की जरूरत महसूस किया है। उसका मुँह न केवल
काला है अपितु विकृत भी है। नाक दब-सी गई है अन्दर की ओर, दाँत
बेतरतीब मानों दांतों की दोनों पंक्तियाँ एक ही माड़ी पर से
निकली हों । इस विषाद ने उसमें बचपन से ही हीलता भीर दिया है।
उसकी समझ में नहीं आता कि किस कारण पिताजी ने उसका नाम सुचरिता
रखा है?
कई बार उसकी फ़जीहत हुई है। एक रोज उसकी कक्षा की एलीना और
डॉली दोनों फोटो खिंचवाने निकली थीं। उम्र समय दस या ग्यारह
रही होगी। सुचरिता ने कहा
“मैं
भी तुम लोगों के सात फोटो खिंचवाऊंगी।”
उस वक्त डॉली ने कहा था, अ......ह.........ह......हा । तेरा जो
चेहरा है उससे फोटो खिंचवायेगी
?
अरी, तेरे कारण हमारी फोटो ख़राब दिखेगी।
उस दिन पहली बार सुचरिता के जीवन में सुन्दरता को लेकर तुलना
की क्षमता ने सिर उठाया था। फिर उसने तुलना की एलीना और डॉली
के हृष्ट-पृष्ट सुन्दर सुगढ़ चमचमाते गोरे तन के साथ अपनी
जीर्ण-शीर्ण काली कलूटी काया की। उनके सिर से पाँव तक जैसे
किसी ने बहुत ही खूबसूरती से गढ़ा हो एक चित्त में । जैसे
मानों सृष्टिकर्ता ने बहुत ही नाप तौलकर अधिक समय देते हुए
गढ़ा हो उन दोनों को और बची हुई मिट्टी से जैसे कोई शिल्पी गढ़
देता है एक अनावश्यक मूर्ति, बिल्कुल उसी तरह उसे गढ़ दिये
हों।
सुचरिता ने चेहरे पर ज़रा फेस पावडर जगाया। उसने अपने काले तन
को गोरा बनाने हेतु कभी मेकअप नहीं किया अपितु दिन भर की धूप
और पसीने से बचने-बचाने के लिए ही वैसा करती है। सुचरिता अपने
मुख पर पावडर लगाते समय कुछ पावडर गिर गया था उसके पेट पर। पेट
पर की साड़ी से पावडर झाड़ते-झाड़ते उसका सिर ज़रा चकरा सा
गया। वह अभी गर्भवती है। उसके पेट में इस वक्त नौ माह का एक
भ्रूण पल रहा है।
इस भ्रूण ने परिवार के कई लोगों की आँखों में एक चमक यानी सुख
का सपना दिखाने पर भी सुचरिता की आँखों में केवल आतंक ही आतंक
छाया है। उस भ्रूण का लिंग क्या होगा
?
‘बेटा’
या ‘बेटी’
?
उस दिन रंजन ने कहा था चलो, क्लिनिक से अल्ट्रा साऊंड
(सोनोग्राफी) करवा कर बच्चे का पोजिशन कैसा है देखकर आते हैं।
लेकिन सुचरिता ने सीधा मना कर दिया था । सुचरिता के मना करने
का कारण एकमात्र यही था कि यदि वह बेटी है तो...?
तब क्या उस कन्या भ्रूण की हत्या कर दी जायेगी
?
और अब तो विज्ञान इतना डेवलप कर चुका है कि जाने कौन सी दवा या
इंजेक्शन दे देने से भ्रूण कहीं नष्ट न हो जाये।
वास्तव में यदि बेटी होगी तो, तब क्या करे उसे.....?
नहीं, नहीं वह नहीं सुन सकेगी या सोच नहीं पायेगी उस
अप्रत्याशित घटना के बारे में । बेटी ज़रुर उसकी जैसी होगी।
उसी का रंग-रुप, उसी के चेहरे-मोहरे-सी हुबहू एक प्रतिरुप
होगी। उसी का तन, उसी का सा मुख, उसी की सी नाक, उसी की सी
आँखें, उसी के से दाँत, उसी का सा कद, सब कुछ उसी के जैसे
नैन-नक्श लिये खिल उठेगी। उस रंग-रूप को याद कर वह सिहर सी गयी
। उसे जन्म देकर माँ बनना कोई गौरव की बात नहीं है बल्कि दुःख
होगा बहुत । उसी दिन से शुरुआत होगी एक नई समस्या की। उस
समस्या के सामाधान हेतु उसे अपने जीवन को खपाना होगा।
अपनी बातें याद करके उसकी आँखें नम हो गई। कभी वह भी एक
छोटी-सी गुड़िया थी। ऐसी छोटी-सी गुड़िया, जिसका स्वरुप याद
करके उसने ईश्वर को हाथ जोड़कर प्रार्थना की थी। हे प्रभु,
नहीं नहीं, ऐसा बरदान मुझे नहीं चाहिए। वह भी कभी अपनी माँ के
लिए वरदान (कहूं या अभिशाप ज्यादा तर्कसंगत होगा) ही तो थी।
जिसने अपनी माँ को दिया है केवल अनिद्रा, आँसू, दुःख, शोक और
चिंता परेशानी । माँ में किसी ने उसे सुचरिता कहकर नहीं पुकारा
। अलबत्ता सभी ने उसे
‘काली’
ही कहा है।
काली या सुचरिता के स्वरुप के नीचे छिपा था वास्तव में कोयले
के अंदर छिपी शक्ति की भांति असीम शक्ति । वह प्रबल मेधावी थी।
शारीरिक गठन की दृष्टि से सबसे पिछल्ली लड़की थी पढ़ाई में
सबसे अव्वल । बस इसी खूबी ने उसे काले कोयले से हीरा बना दिया
था। हाँ इस दुनिया में चमचमाते हीरे को ज़रूर सभी पसंद करते
हैं पर हीरे को काटकर तरासने के बाद ही उससे सही चमक पैदा होती
है अन्यथा कोयले के ढेर में पड़ा रहना ही सार होता है।
सुचरिता उस कोयले के ढेर में दबकर मुद्दत से तपस्यारत है।
तपस्या के फलस्वरुप किसे पता उसके भीतर मोती बनेगा भी या नहीं
?
या फिर सीप की भांति मुट्ठी भर अनावश्यक रेत ही भरी पड़ी होगी।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो जीवन एक अभिशाप बन जायेगा, जो कि उसके
माँ-बाप के जीवन
में पहले ही घट चुका है। माता-पिता दोनों ही सरकारी कर्मचारी
है। पिताजी बाबू हैं सेटेलमेंट आफ़िस(बन्दोबस्त कार्यालाय) में
और माँ प्रायमरी स्कूल में टीचर पिताजी जमीन नापने वालों का
क़ागजात व वेतन-भत्ता आदि की जाँच करते हैं और माँ
नन्हे-मुन्ने बच्चों का भविष्य निर्माण। यही था उन दोनों का
कार्य और उन दोनों की गोद मे थी एकमात्र संतान सुचरिता ।
सुचरिता
को लेकर जिस दिन उसकी माँ पहली बार स्कूल पहुँची उस रोज किसी
भी सहकर्मी ने उसे प्यार से अपनी गोद में नहीं लिया था और न ही
किसी ने उसे स्नेह से चुम्मा (पप्पी) दिया था। अलबत्ता यह कहा
था कि दीदीजी यह बच्ची आप दोनों पर नहीं गई है।
उस वक्त सुचरिता की माँ मर्माहत हुई थी। यही मर्माहत होना ही
निर्यातित होने का प्रारंभ था। कई बार सुचरिता उर्फ काली की
वज़ह से ही उनकी फ़जीहत हुई है।
एक बार स्कूल में ड्रामा करने की तैयारी शुरु हुई।
‘सुदामा’
उस नाटक का नाम था। उस नाटक में रोल (भूमिका) करने के लिए
सुचरिता भी उत्सुक हुई। श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी की
भूमिका हेतु चयन प्रक्रिया प्रारंभ हुई। सुचरिता खड़ी होकर
बोली, “सर,
मैं रुक्मिणी बनूँगी।”
उस वक्त सुचरिता ताकती रह गई थी। सर जाने क्या बड़बड़ा रहे थे।
कदाचित् यह कह रहे थे-
“कहाँ
रुपसी रुक्मिणी और कहाँ यह काली कलूटी बदसूरत सुचरिता । धत्
.......तेरी..की.......।”
सुचरिता
को कुक्मिणी की भूमिका तो मिली नहीं, पर मिली एक दस्यु की
भूमिका। उसका काला कलूटा शरीर दस्यु बनने के लिए उपयुक्त
प्रतीत हो रहा था। उसका स्वरुप और बेशभूषा किसी जंगल राज में
जन्में असंस्कारित असभ्य व्यक्ति की संतान की भांति लगता था।
रिहर्सल चल रहा था, उसी बीच एक बार आवश्यकता पड़ी सुदामा को
धमकी देने की। जब धमकी देने की बारी आई तो उस वक्त शिक्षक ने
कहा, “तेरा
रंग भले ही दस्यु जैसा काला है पर तेरा चेहरा, तेरा कद और
बनावट बिल्कुल अनफ़िट है। तू यह छिपकली सी सूरत लिये क्या रोल
करेगी ?”
अंततः सुचरिता को ड्रामे से अलग होना पड़ा।
जिस रोज सुचरिता ड्रामे में अयोग्य घोषित हुई उस दिन वह खूब
रोयी थी। मन ही मन सोची थी- क्या रखा है इस जीवन में
?
इस जीवन में पहचान बनानी हो तो केवल रुप रंग और तन है। तन-बदन
ही है इसका अस्तित्व । यह पहचान देनेवाला तन ही यदि सर्वत्र
घृषित व सर्वथा लांछित है तो फिर ऐसा तन रखकर फायदा ही क्या है
?
परन्तु जो कुछ भी करेगा यह शरीर ही करेगा। जान है तो जहान है
वैसे ही शरीर है, तो धरती है। तन नहीं तो कैसी धरती के
व्यतिरेक और कोई जहान है भी या नहीं
?
कैसा जहान ?
कैसा जहान ?
वहाँ कौन सा सुख होगा
?
इसका अनुभव उसे नहीं है। इस संसार का मोह उसे वशीभूत करता है,
विवश करता है। समस्त तिरस्कार और अपवादों के बीच वह देखना
चाहती है और खूबसूरत सुबह। चमचमाता सूरज, दौड़ता, दौड़ता सा
नन्हा बछड़ा, चमकती तैरती मछली, उड़ती तितली और सबसे अधिक उसके
जीवन संघर्ष में लहुलुहान अपने माता-पिता को वह गौर से निहारना
चाहती है।
जब वह दसवीं पढ़ रही थी उस समय उसे सामना करने के लिए एक
चैलेंज आया। वह विवाह योग्य हो गई। यह अहसास उसके लिए अलग
किस्म काथा । यह समाचार उनके माता-पिता के लिए खुशी और आशंकाओं
का एक मिलाजुला स्वरुप था।
अब सुचरिता का विवाह होगा
?
कौन है ऐसा इस दुनिया में जो आज तक जिसे किसी ने पसंद नहीं
किया उसे अपनी जीवनसाथी बनाएगा
?
कौन होगा वह ?
किस जहाँ में होगा उसका घर
?
यही चिंता माँ-बाप को सदा खाये जा रही थी।
सुचरिता की समझ में आ रहा था अपने माँ बाप की चिंता का कारण।
समझ रही थी इन सब मनहूसी के लिए मानो वही जिम्मेदार है। वह मन
ही मन सोचने लगी, यह तन केवल किसी के प्यार के लिये उद्दिष्ट
नहीं है। किसी के भोग विलास के लिए नहीं है। कोई आवश्यकता नहीं
है विवाह करना, कोई ज़रूरत नहीं है वधु बनना।
बस इन्हीं बातों को छोड़कर वह बन सकती है एक महानायिका, वह
बनेगी नारी की एक ज़िंदा मिसाल । सारी परंपराओं को तोड़
डालेगी। एतदर्थ उसने कमर कस ली। पढ़ाई में मन लगाया । कक्षा
में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आई । इन सब मेहनतों के फलस्वरुप उसे
मिल गई एक शिक्षिका की नौकरी। जिससे उसे मिले जीने के लिए
पैसे। जो पैसा मनुष्य के सारे दुखदर्द से राहत दिलाता है।
यह साल भर जब वह तपस्यारत थी। उसने कभी लौट के नहीं निहारा था
आइने को । कभी बदसूरत हूँ सोचकर उसने ग़म नहीं किया। अपने आप
को कभी कोसा भी नहीं। पर नौकरी जीवन की खुशी का कुहासा छंट
जाने पर अर्थात् नौकरी एक सामान्य-सी लगने पर एक तरह से वह फिर
लौट आयी थी उसी विषाद भरे राज्य में, जो उसे अक्सर बदसूरत कहा
करता था।
कॉलेज में पढ़ते समय भी एक घटना याद हो आई। संदीप उस वक्त उसका
सहपाठी था। संदीप के साथ बीते हैं उसके कई लम्हें। कई कहानियाँ
कईयों के दिमाग में बनी है मनगढ़ंत उसे और संदीप को लेकर हाँ,
उसने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा हादसा हो जायेगा। संदीप प्रेमी न
होने पर भी एक दोस्त था। और देस्त से भी कुछ प्यार की उम्मीद
की जा सकती है। पर संदीप के दिल में भरी थी सिर्फ नफ़रत और
उपेक्षा । साधारण-सी बात पर भी वह गरम होकर बरस पड़ता था उस
पर। कई सारी गालियाँ बक देता था। उस गालियों से सुचरिता सहम-सी
जाती थी। बात बस इतनी सी थी, सुचरिता ने संदीप से एक बार कह
डाला “मैं
तुमसे प्यार करती हूँ।”
उस दिन सुचरिता की समझ में यह नहीं आया था कि एक इंसान की तरह
किसी को चाहने का अधिकार क्यों नहीं है
?
निहारिका से प्यार करके कई लड़के उसे प्रेमपत्र देते हैं। बाईस
वर्ष की उम्र तक कहाँ किसी ने तो उसे एक भी प्यार भरा पत्र
नहीं दिया है। किसी से प्रेम करने के लिए क्या एक सुन्दर शरीर
का होना जरूरी है ?
मन और हृदय प्रेम की क्या इस दुनिया में कोई अहमियत ही नहीं है
?
उसने तो सहेज रखा है अपने तन के पीछे एक चमकदार स्वच्छ हीरे-सा
हृदय और संभालकर रखा है एक निर्मल प्रभात-सा मन। कहाँ
?
प्रेम के लिए किसी का आमंत्रण क्यों नहीं आता
?
कदाचित् प्रेमनगरी में मन-हृदय गौण है, मिथ्या है, तन ही
सर्वस्व है। जिस परीक्षा हेतु सुचरिताके माता पिता जीवनभर
संघर्ष व प्रतीक्षारत थे, अंततः वह घड़ी आ ही गई । जीवन भर की
तैयारी वाली परीक्षा कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है, कितनी
जिज्ञासित और कितनी महनीय। सुचरिता को वधुवेश में कई बार सपनों
में वे दोनों देखते आये हैं पर दुल्हा बनकर कौन उसके समीप
बैठेगा ?
यह कल्पना नहीं कर पाते । सुचरिता की सहेलियाँ अंजू-संजू दोनों
ब्याह होकर माँ बन चुकी हैं। फिर भी सुचरिता का विवाह, उसके
लिए एक प्रश्न चिन्ह-सा है। माँ वाले कभी सुचरिता की शादी की
कल्पना ही नहीं करते
पिताजी फिर भी हमेशा कहते हैं,
“रूको,
देखना, पक्षीराज घोड़े में सवार को नीले क्षितिज में से जरूर
आयेगा एक न एक दिन राजकुमार-सा मेरी बेटी का दूल्हा, बड़ी
धूमधाम से करूँगा मैं उसकी शादी।
सुचरिता की नौकरी उसके रुप रंग के समक्ष थी, चित्रालय का रंग
और हेलोजेन लाईट की चमकदार रौशनी जैसी ही। उस चमकदार रोशनी में
बदसूरत काली कलूटी सुचरिता बन गई थी सचमुच ही बेहद खूबसूरत।
वास्तव में ऐसा ही हुआ। रंजन सुचरिता का पति। कोई भी भारतीय
नारी अपने पति को लेकर टीका-टिप्पणी करने की इजाज़त देना नहीं
चाहेगी । तटस्थ होकर पत्नी की भूमिका से निवृत्त हो कहने पर
रंजन एक निहायत ही बेरोजगार है। दो कौड़ी कमाने का हुनर नहीं
मालूम । फिर भी सुढौल गोरा रंग छरहरा बदन का धनी है रंजन ।
मानो जैसे कोई राजकुमार हो। हर समय बड़ी बड़ी बातें यानी कि
डिंग हाँकना उसकी आदत में शुमार है। जैसे वह सब कुछ कर देगा,
क्या नहीं है उसके वश में
?
और थोड़ा स्पष्ट कहा जाये तो वह एक अर्द्धशिक्षित टाउटर है।
अभिनय का हुनर उसे बखूबी पता या यूँ कहें अभिनय करना उसके बाएं
हाथ का खेल है। झूठ को भी वह अच्छी तरह सच के रंग में रंग सकता
है।
जब शादी की बात चली तो उसके बारें में बताया गया था कि रंजन एक
इंजीनियर है, बस कुछ ही दिनों में उसकी नौकरी लगने वाली है। पर
उस वक्त वह (सुचरिता) समझ नहीं पाई थी कि इतनी अच्छी खासी
नौकरी की पात्रता रखने वाला एक सुंदर-सा नौजवान उसकी जैसी एक
बदसूरत लड़की से विवाह करने को राजी कैसे हो गया
?
शादी के समय दहेज को लेकर ससुराल वालों का कोई खास डिमाँड नहीं
था फिर भी पिताजी ने किसी भी चीज़ में कमी नहीं थी। एक नया घर
बसने के लिए जिन जिन चीज़ों की ज़रूरत होती है एक एक करके सब
कुछ दिया था उन्होने । सारे सामान को यदि सिक्का बनाकर तराजू
के एक पलड़े में रखा जाये और दूसरे पलड़े में सुचरिता को
बिठाकर तौला जाये तो निस्संदेह सुचरिता का वज़न कम ही मालूम
पड़ता।
बदसूरत होने की करुण कहानी कभी-कभी सुचरिता को याद हो आती। फिर
वह अपने गर्भस्थ भ्रूण के बारे में सोचती है। मान लो यदि उस
भ्रूण ने बेटी के रूप में जन्म लिया तो फिर वही कहानी दोहराई
जायेगी।
बेटा या बेटी ?
इस प्रश्न ने उसे बारम्बार उद्वेलित किया है सदा। एक दिन वह
पहुँची है अस्पताल के लेबर रूम में । कितनी चीखी व चिल्लाई है
। उन चीत्कारों के बीच कई बार मूर्छित (अचेत) भी हुई है। होश
आने पर भी आँखें नहीं खोली है उसने । उसे पता हो चुका है कि
बहुप्रतीक्षित उसका गर्भस्थ भ्रूण अब जन्म लेकर रोने बिलखने
लगा है। वह बेटा है या बेटी
?
“कैसे
देखूँ ?”
“कब
देखूँ ?”
“उठो
बेटी !
देखो तो क्या हुआ है....?”
सिर में हाथ फेरते हुए सासुजी ने कहा था। समीप खड़े थे पिताजी,
माँ रंजन और ससुर जी।
“यह
क्या ?”
वह देख रही है गोरा चमकदार मुखमंडल से भरा हष्ट-पुष्ट व बलिष्ट
एक पुत्र रत्न ।
मूल-एकान्त साहू
निर्माता,भवनी पटना,
जि. कालाहंडी (उड़िया) 766001.
अनुवाद-कुष्ण कुमार अजनबी
संपादक, गुलदस्ता, पो. देवभोग
जि. रायपुर (छ.ग.) 493890
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