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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। इन दिनों ।।

 

 

शासन की हिंसा नहीं आतंक का जवाब


विश्वनाथ सचदेव

 

मेरिका से आए वे सारे युवा पत्रकारिता के विद्यार्थी थे । भारत यात्रा पर आए वे युवा जब उदयपुर पहुँचे तो उन्हें अणुव्रत-अनुशास्ता आचार्य महाप्रज्ञ की अहिंसा यात्रा और उनके उदयपुर में ही होने का पता चला था और वे किसी चमत्कार की आशा लेकर पहुँचे थे । सच तो यह है कि पश्चिम के युवा-प्रतिनिधि विश्व की वर्तमान समस्याओं से उसी तरह परेशान थे, जैसे आज का सामान्य व्यक्ति है । सहज जिज्ञासाओं से प्रेरित होकर ही वे वहाँ पहुँचे थे । जिस तरह के सवाल वे कर रहे थे, उससे सिर्फ़ जिज्ञासा ही नहीं झलक रही थी, उनमें एक बेचैनी भी थी । आशंका और हताशा से उपजी बेचैनी । जैसे-यही सवाल कि हिंसा और आतंकवाद का मुकाबला कैसे किया जा सकता है ?

 

उत्तर देने से पहले आचार्यश्री थोड़ा मुस्कराए थे । इस मुस्कान में एक आश्वस्ति थी और यह संकेत भी कि प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है । अपने उत्तर में उन्होंने कहा था कि हिंसा को पूरी तरह भले ही न मिटाया जा सकता हो, लेकिन उसके प्रभाव को इतना कम अवश्य किया जा सकता है कि वह  सकारात्मक जीवन में व्यवधान न बने । उन्होंने कहा था- हिंसा के साधनों को नष्ट करने से हिंसा नष्ट नहीं होगी । हिंसा दिमाग से उपजती है, इसलिए इस समस्या का समाधान भी मनुष्य के सोच को बदलने की कोशिशों में ही निहित है । मैं नहीं जानता कि पश्चिम के वे विद्यार्थी इस उत्तर से कितने संतुष्ट हुए होंगे, लेकिन इतना तय है कि यह उत्तर एक नई दिशा में सोचने की प्रेरणा उन्हें अवश्य देगा। उन्हें ही क्यों, सबको उसी दिशा में सोचना होगा । हिंसा और आतंकवाद जिस तरह हमारे जीवन में घुसपैठ करते जा रहे हैं, इनसे निपटने की नई दिशाओं की खोज ज़रुरी हो गई है ।

 

अमेरिकी युवाओं का आचार्य महाप्रज्ञ से आकर यह सवाल पूछना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि महावीर, बुद्ध और गांधी के देश से युवा विश्व फिर नई दृष्टि की अपेक्षा कर रहा है । भारत की ही बात करें, आज शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब देश के किसी न किसी हिस्से से आतंकवादी गतिविधि की ख़बर न आती हो । इन घटनाओं के सामान्य लगने के साथ-साथ एक वर्ग विशेष में यह धारणा भी पनपने लगी है कि चक्र पूरा होने के बाद ही आतंकवाद खत्म हो सकता है । ऐसा सोचने वालों का मानना है कि एक ऊँचाई तक पहुँचने के बाद भीतरी थकान और बाहरी दबावों से, आतंकवाद स्वयं अपने तार्किक अंत तक पहुँच जाएगा । होता है कभी-कभी ऐसा भी, लेकिन यह हताशा का दर्शन है । समस्या का दूसरा और अधिक तर्कसंगत समाधान उन कारणों को मिटाना है, जो आतंकवाद को जन्म देते हैं । आर्थिक विषमता से लेकर धार्मिक मतांधता तक फैले हैं यह कारण । बहुत लंबा रास्ता है, पर चलना तो पड़ेगा ही इस रास्ते पर । किसी नक्सली हिंसा को या पूर्वोत्तर क्षेत्रों में व्याप्त असंतोष को समाप्त करने के लिए आर्थिक विषमता को समाप्त करने की ईमानदार कोशिशें ज़रुरी हैं । इनमें सरकार की हिस्सेदारी अवश्य ज़्यादा है, लेकिन गैर सरकारी स्तर पर भी मोर्चे खोलने होंगे ।

 

आतंकवादी हिंसा का जवाब सिर्फ शासन की हिंसा नहीं है । इस हिंसा की अपनी भूमिका है, पर इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका समाज को निभानी है । असमी लेखिका इंदिरा गोस्वामी असम में इस तरह की एक भूमिका निभा रही है । उनकी कोशिशों का सफल न हो पाना इस बात का भी संकेत है कि यह कोशिश पर्याप्त नहीं है । अपर्याप्त होने और अप्रभावीत होने में अंतर होता है ।

 

यहीं यह बात भी समझना जरुरी है कि हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई नेतृत्व तक ही सीमित नही होनी चाहिए । वस्तुतः यह लड़ाई सोच को बदलने की है । सिर्फ उनके सोच को नहीं जो हिंसक अराजकता के माध्यम से अपने उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहते हैं, बल्कि उनके सोच को भी जो अराजकता के प्रचार से प्रभावित हो सकते हैं । आत्मघाती बमों के साथ अक्सर ऐसे युवा जुड़े होते हैं, जो हिंसा के रोमांच से खिंचे चले जाते हैं । धर्म के नाम पर या राजनीतिक उद्देश्यों से चलित आतंकवाद से कम खतरनाक नहीं है, एक रोमांच से प्रेरणा पाने वाला आतंकवाद । मानव-बम बनाने वाले इस सोच पर वार करने में घर-परिवार और मोहल्ला भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है । लेकिन दुर्भाग्य से हिंसा और आतंकवाद की समस्या को अभी इस दृष्टिकोण से नहीं देखा जा रहा है । हिंसा हथियारों से होती अवश्य है, लेकिन उसका जन्म मस्तिष्क में होता है । इसलिए मात्र हथियारों को खत्म करने से बात बनेगी नहीं । बात बनेगी उस सोच को खत्म करने से जो हथियारों की आवश्यकता का अहसास कराता है ।

 

कल्पना की जा सकती है कि मनुष्य ने पहला हथियार पेट भरने के लिए चलाया होगा-पत्थर से किसी जानवर को मारा होगा । लेकिन हथियारों ने जल्दी ही पाँव पसारने शुरु कर दिए । पेट के बजाय अधिकारों और वर्चस्व की भूख शांत करने लगे हथियार । हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया जाना इसी भूख का उदाहरण है । हिंसा की तरह ही यह भूख भी मस्तिष्क में उपजती है । एक लड़ाई इस भूख के खिलाफ़ लड़ी जानी ज़रुरी है । आचार्य महाप्रज्ञ ने उन अमेरिकी विद्यार्थियों से एक बात और भी कही थी- अहिंसा के प्रशिक्षण की बात । उन्होंने कहा था- हिंसा मिटानी है तो अहिंसा का प्रशिक्षण देना होगा । यह काम हर स्तर पर होना जरुरी है । मानवीय अधिकारों की लड़ाई लड़ने वालों को उस असंतोष को मिटाने के लिए सक्रिय होना होगा जो अक्सर गलत माध्यम अपनाने का कारण बन जाता है । 

विश्वनाथ सचदेव

संपादक, नवनीत

मुंबई

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