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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

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।। हिंदी-विश्व ।।

 

 

विश्व-फ़लक पर हिन्दी: कुछ सुझाव


मंजु महिमा

 

हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी विद्वजन परिचित हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाने जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है और हमें चाहिए कि हम इस ओर कुछ ठोस कदम उठाएं।

 

भारत वैदिक काल से ही साहित्यिक, सांस्कॄतिक और वैज्ञानिक दॄष्टि से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी नष्ट किया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने ज़ख्मों को भूलें. उन पर मरहम रखते हुए फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो वैदिक युग में थी।

 

आज संस्कृत की अपेक्षा हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में अपना स्थान बना रही है तो क्यों नहीं हम उसके माध्यम से  विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करें। हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए, जिससे हम यह जान सकें कि इन विषयों में हिन्दी-प्रयोग की क्या-क्या कठिनाइयाँ आ रही हैं, जिनके कारण हिन्दी वह स्थान नहीं ले पा रही है जो अंग्रेज़ी भाषा को प्राप्त है।

 

वैसे कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति बहुत ही धीमी है। जो भारतीय विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे तकनीकी मार्ग खोज सकते हैं। स्पष्टत: कहूँ तो हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि हिन्दी- भाषा को साहित्य से ही अधिक जोड़ कर देखा जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि आज के युग की प्रबल माँग है कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में हो। क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।

          

भाषा के दो मुख्य स्वरूप हैं१.मौखिक २- लिखित। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है और हो रहा है। आँकड़े बता रहे हैं कि आज हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा कही जा सकती है, परंतु इसका दूसरा पहलू जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में  भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं, मुख्यत: अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु को लेकर, साथ ही नुक्ते का प्रयोग भी उन्हें भटकाता है, कहाँ लगाए, कहाँ न लगाएं की स्थति तो पैदा करता ही है, लिखने में अथवा टाइप करने में भी व्यवधान उत्पन्न करता है। अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।

 

कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के मनीषी कंप्यूटर की जानकारी बहुत कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं अत: हमें कुछ ऐसे युवा-वर्ग की आवश्यकता है जो इस कार्य का दायित्व  अपने कंधों पर उठाएं। आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे - कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब य़ूनिकोड में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण ई-मेल में बहुत सुविधा हो गई है, लेकिन यह बात कितने लोगों को ज्ञात है? जो विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं, वे भी नहीं जानते जबकि इस प्रकार की नवीनतम जानकारी बिजली की भाँति हिन्दी-जगत में फ़ैलनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए कटिबद्ध रहे और इसमें कुशलता का विकास करे।

 

अगली विशेष बात है शब्दकोश की। हिन्दीशब्दकोश का प्रयोग हिन्दी नहीं जानने वालों के लिए बड़ा उलझन भरा है। हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा। उदाहरणार्थ- वर्तमान में हिन्दी-शब्दकोश देखना सीखना होता है, पहले उसकी बारीकियों से छात्रों को अवगत करवाना पड़ता है और अभ्यास करवाना होता है कि कौन-सा वर्ण शब्दकोश में कहाँ आएगा? यदि वर्णमाला में स्वरों का क्रम देखें तो हम पाएंगे कि जो अं का  क्रम वर्णमाला में अंत में आता है, बारह्खड़ी भी इसी क्रम से सिखाई जाती है, परन्तु शब्दकोश में वही पहले आता है, जैसे- अनुस्वार/अनुनासिक वाले शब्द(अंक आदि)। फ़िर शब्दकोश में इस प्रकार का क्रम उलझन पैदा करता है। व्यंजन को बिना स्वर के अर्द्धाक्षर माना गया है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि यह व्यंजन का  मूल रूप है, तो शब्दकोश में पहले अर्द्धाक्षर वाले शब्द आने चाहिए, जैसेक्या.क्यारी आदि।

 

इसीप्रकार संयुक्त-व्यंजन जिनका अब स्वतंत्र रूप बन गया है ( क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,)  और जिन्हें वर्णमाला क्रम के अंत में दर्शाया जाता है, उन्हें शब्दकोश में भी बाद में ही लिया जाय तो सुविधा होगी। यह ठीक है कि इस प्रकार की परंपरा संस्कृत-काल से चली आ रही है और इसके कई शास्त्रीय कारण भी हो सकते हैं, पर मैं यहाँ एक हिन्दीतर प्रदेश के छात्र के दृष्टिकोण से बात कर रही हूँ जो सम्पर्क-भाषा के रूप में भाषा सीखना चाहता है।

 

अत: विद्वजनों से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता मुन्ना भाई की भाँति निकाल ही लेगी, जो शायद हिन्दी प्रेमियों को ग्राह्य नहीं होगा।

हमारा ध्येय होना चाहिए --- 

तुलसी क्यारी सी हिन्दी को,

हर आँगन में रोपना है।

यह वह पौधा है जिसे हमें,

नई पीढ़ी को सौंपना है।

   मन्जु महिमा भटनागर

शिक्षा-विशेषज्ञ (हिन्दी)

एज्यूकेशनल इन्यीश्येटिव़ज़

अहमदाबाद (गुजरात)

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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