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"प्रवासी
साहित्य को भी मुख्यधारा का साहित्य माना जाना चाहिये"
मुंबई । भारत ।
"हिन्दी
साहित्य पहले ही बहुत से ख़ांचों में बँटा है। महिला लेखन,
दलित लेखन और न जाने कितने लेखन। मुख्य धारा के आलोचकों को
चाहिये कि वे विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को मुख्य
धारा का हिन्दी साहित्य ही मानें।"
यह कहना था लंदन निवासी कथा यू.के. के महासचिव एवं चर्चित
कथाकार तेजेन्द्र शर्मा का।
अवसर था विजय वर्मा मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा मुंबई के श्रीनिवास
बगड़का कालेज, अन्धेरी पूर्व के सभागार में तेजेन्द्र शर्मा के
कहानी पाठ एवं ग़ज़ल प्रस्तुति का आयोजन। कार्यक्रम में
तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी मार्मिक कहानी क़ब्र का मुनाफ़ा
का भावभीना प्रस्तुतिकरण किया और साथ ही अपनी अर्थपूर्ण
ग़ज़लों से श्रोताओं का मन मोह लिया। उन्होंने प्रवासी
साहित्यकारों से भी आग्रह किया कि वे नोस्टेलजिया से बाहर आ कर
अपने अपने अपनाए गये देश के सरोकारों के बारे में साहित्य की
रचना करें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं प्रगतिशील आकल्प
के संपादक डा. शोभनाथ यादव ने की। उन्होंने तेजेन्द्र की कहानी
एवं ग़ज़लों की प्रशंसा करते हुए अपने अध्यक्षीय भाषण में उन
पलों को याद किया जब वे लन्दन में कथा यू.के. द्वारा आयोजित
समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे।
वरिष्ठ लेखिका पुष्पा भारती ने बच्चन जी की कविता के माध्यम से
तेजेन्द्र शर्मा को आशीर्वाद देते हुए कार्यक्रम में नये रंग
भर दिये। संचालन आलोक भट्टाचार्य ने किया। कार्यक्रम की गरिमा
बढ़ाने के लिये अन्य लोगों के अतिरिक्त वरिष्ठ कथाकार मनहर
चौहान, धीरेन्द्र अस्थाना, सूरज प्रकाश, विनोद तिवारी,
हरीश पाठक, डा. नन्द लाल पाठक, बोद्धिसत्व, राजेश रेड्डी,
हस्ती मल हस्ती, माया गोविन्द, डा. राजम नटराजन पिल्ले, हृदयेश
मयंक, रतिलाल शाहीन, दिव्या जैन, इन्द्रजीत पाल, कमल भोजवानी.
शैलेन्द्र गौड़, जितेन्द्र, देवमणि पाण्डे, लोचन सक्सेना एवं
विनोद टिबड़ेवाल उपस्थित थे।
(मुंबई
से मधुलता अरोड़ा )
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