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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail।com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। हलचल ।।

 

   

16वॉ अन्तर्राज्यीय लघुकथा लेखक सम्मेलन इंदौर में संपन्न

 

इंदौर। मध्यप्रदेश। पंजाबी पत्रिका मिन्नी त्रैमासिक एवं लघुकथा मंच इंदौर के संयुक्त आयोजन में गुरुद्वारा इमली साहिब इंदौर में दिनांक 26.10.07 को लघुकथा लेखक सम्मेलन प्रारम्भ हुआ।

 

उद्घाटन सत्र के अध्यक्षीय मंडल में भगीरथ, सुकेश साहनी एवं सुरेन्दर कैले सम्मिलित रहे। सर्वप्रथम डॉ. श्यामसुन्दर दीप्ति ने लघुकथा लेखक सम्मेलन के उद्देश्य एवं मिन्नी त्रैमासिक पत्रिका की उपलब्धियों का संक्षिप्त परिचय देते हुए आयोजित कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल ने लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर आधारित आलेख पाठ किया जिस पर विस्तृत चर्चा हुई। चर्चा में अशोक भाटिया, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी, सुरेन्द्र कैले ने भाग लिया। डॉ. अशोक भाटिया ने डॉ. बच्चन के वक्तव्य को कोट करते हुए कहा कि लघुकथा का अपना महत्त्व है, सूरज को तिनका बनने के लिए कहा जाए तो बड़ी मुसीबत होगी। रामेश्वर काम्बोज हिमाशु ने कहा कि सरल होना कठिन काम है। बलराम अग्रवाल ने योगेन्द्र नाथ शुक्ल के आलेख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इसमें उठाए गए विभिन्न बिन्दुओं पर विस्तृत बहस की आवश्यकता है। सुभाष नीरव ने कहा कि लघुकथा पर छाए धुंधलके खत्म हुए हैं । उन्होंने इंटरनेट पर लघुकथा की उपस्थिति के महत्त्व को रेखांकित किया। सुकेश साहनी ने योगेन्द्र नाथ शुक्ल के आलेख में प्रयुक्त कट चाय पर भ्रम पैदा होने की बात कही। उन्होंने स्याही एवं ब्लाटिंग पेपर का उदाहरण देते हुए लेखक द्वारा समाज से संवेदना ग्रहण कर घटनाओं के पुनसृ‍र्जन की बात कही। ऐसी रचनाओं में जीवन की धड़कन महसूस की जा सकती है। सुरेन्द्रर कैले ने आलेख में उठाई गई इस बात का खंडन किया कि समय की कमी के कारण पाठक लघुकथा की ओर आकृष्ट हुए है। अध्यक्षीय भाषण में भगीरथ ने कहा कि पर्चे में पढ़े गए मुद्दे कई बार आ चुके हैं। हम कब तक कदमताल करते रहेगें ।हमें और आगे बढ़ना होगा।

 

इस अवसर पर मिन्नी त्रैमासिक के 76वें अंक जो धर्म और सियासत पर केन्द्रित था, विमोचन किया गया। साथ ही सतीश राठी द्वारा सम्पादित क्षितिज एवं हरनाम शर्मा के लघुकथा संग्रह इसी देश में का लोकार्पण हुआ।

 

सत्र का मुख्य आकर्षण रहा लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर डॉ.सतीश दुबे का सम्मान, जिन्हें इस अवसर पर माता शरबती देवी लघुकथा सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले रचनाकार को दिया जाता है। यह सम्मान इससे पूर्व रमेश बतरा एवं सुकेश साहनी को प्रदान किया जा चुका हैं। इस पुरस्कार की एक विशेषता यह भी है कि इसमें कथाकार की पत्नी को भी सम्मानित किया जाता है। इस अवसर पर श्यामसुन्दर अग्रवाल द्वारा पुरस्कार की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला गया। प्रताप सिंह सोढ़ी ने श्री सतीश दुबे के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत प्रकाश डाला।

 

डॉ. सतीश दुबे ने पुरस्कार ग्रहण करने के बाद अपने उद्बोधन में कहा कि आवश्यक नहीं है कि रचनाकार भारी भरकम विषयों पर ही कलम चलाए। हमारी जिंदगी के आसपास बिखरे पात्रो पर भी लिखा जाना चाहिए। विषयों की कमी नहीं है। उन्होंने मिन्नी त्रैमासिक अमृतसर के संपादकों का आभार व्यक्त किया।

 

संचालन डॉ. सूर्यकांत नागर द्वारा किया गया। उपस्थित अन्य कथाकारसतीश राठी, सु्रेश शर्मा, जगदीश जोशीला, धनश्याम अग्रवाल, हरभजन सिंह खेमकरणी, हरनाम शर्मा, प्रताप सिंह सोढ़ी, हरप्रीत राणा, नियति सप्रे, अमृत मंनण, चेतना भारती, एन उन्नी, लक्ष्मी नारायण, चैतन्य त्रिवेदी, कृष्णकांत दुबे, अशोक शर्मा आदि।

 

जुगनुओं के अंगसंग

 द्वितीय सत्र में जुगनुओं के अंगसंग में सभी प्रमुख कथाकारों ने लघुकथा पाठ किया, जिसपर विस्तृत विचार विमर्श हुआ। इस कार्यक्रम में एक कथाकार द्वारा पढ़ी गई रचना पर सभी उपस्थित कथाकार, आलोचक, श्रोता अपने विचार प्रकट करते हैं। कथाकारों के लिए इस कार्यक्रम ने एक कार्यशाला का रूप ले लिया है। यह कार्यक्रम पिछले सोलह वर्षों से नियमित रूप से चलाया जा रहा है।

 

धनश्याम अग्रवाल : अपनेअपने सपने,  सतीश राठी : साहस,  हरप्रीत राणा : संस्कार, सदाशिव कौतुक : पलायन,  रघुवीर सिंह महिमी : आस की मौत,  योगेन्द्र नाथ शुक्ल : भ्रमभग्न,  सुरेन्दर कैले : मां,  हरनाम शर्मा : काश पत्थरों के होंठ होते,  रणजीत आजाद : तजु‍र्बा, अमृत मंनण : चिंता, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’ : परख, हरभजन सिंह खेमकरणी : बहाना, सुभाष नीरव : भला मानुस, सूर्यकांत नागर : राजा की बारात, अशोक भाटिया : कपों की कहानी, बलराम अग्रवाल : एल्बो, श्यामसुन्दर अग्रवाल : उत्सव, सुकेश साहनी : दाहिना हाथ।

 

सभी उपस्थित कथाकारों ने विमर्श में उत्साह से भाग लिया। पढ़ी गई रचनाओं में धनश्याम अग्रवाल, रघुवीर सिंह महिमी, हनुमान शर्मा, रणजीत आजाद, अमृत मंनण, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु सूर्यकांत नागर, अशोक भाटिया, बलराम अग्रवाल, श्याम सुन्दर अग्रवाल, सुकेश साहनी की लघुकथाओं को सराहा गया। श्री सुरेश शर्मा द्वारा सभी उपस्थित कथाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

       ( सुकेश साहनी की रिपोर्ट)

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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