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सृजनगाथा
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वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007
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।। नवगीत ।।
सबके आँगन एक अखाड़ा
पुरवा पथ से
पहिये रथ के-
मोड़ रहा है गाँव
पूरे घर में
ईटें-पत्थर
छानी-छप्पर
छोड़ रहा है गाँव
ढीले होते
कसते-कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव
इसको उससे
उसको इससे
और न जाने
किनको किससे
तोड़ रहा है गाँव
गरमी हो बरखा
या जाड़ा
सबके आँगन
एक अखाड़ा
गोड़ रहा है गाँव
डॉ.शिव बहादुर सिंह भदौरिया
साकेत नगर, लालगंज
रायबरेली, उत्तरप्रदेश
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छांदस रचनाएं
गीत
डॉ.रामदरश मिश्र
नवगीत
छविनाथ मिश्र
डॉ. शिव बहादुर भदोरिया
डॉ. किशोर काबरा
ग़ज़ल
अक्षय गोजा
सजीवन मंयक
दोहे
डॉ. रामनिवास ‘मानव’
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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