|
फूल कितना बोलते हैं
ये अबोले फूल कितने बोलते हैं
अजिर में शिशू-से नया रस घोलते हैं
ये अबोले फूल कितना बोलते हैं
सुबह आँखों में इन्हें भर जागता हूँ
पास जा इनके खुला दिन माँगता हूँ
मुस्कराते हुए पलकें खोलते हैं ।
थरथरा कर समय वह चलता नदी-सा
हर महकता पल ठहर जाता सदी-सा
गंध लिपि से शिलाओं पर डोलते हैं ।
प्रिय विदा के लिए मुझको खींचते हैं
बाँधते हैं नहीं, आँखें, सींचते हैं
साथ होने के लिए पर तौलते हैं ।
डॉ.रामदरश मिश्र
वाणी विहार, उत्तम नगर
नई दिल्ली – 110056
◙◙◙
|