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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। गीत ।।

 

 

फूल कितना बोलते हैं

 

ये अबोले फूल कितने बोलते हैं

 

अजिर में शिशू-से नया रस घोलते हैं

ये अबोले फूल कितना बोलते हैं

 

सुबह आँखों में इन्हें भर जागता हूँ

पास जा इनके खुला दिन माँगता हूँ

 

मुस्कराते हुए पलकें खोलते हैं ।

 

थरथरा कर समय वह चलता नदी-सा

हर महकता पल ठहर जाता सदी-सा

 

गंध लिपि से शिलाओं पर डोलते हैं ।

 

प्रिय विदा के लिए मुझको खींचते हैं

बाँधते हैं नहीं, आँखें, सींचते हैं

 

साथ होने के लिए पर तौलते हैं ।

  डॉ.रामदरश मिश्र

वाणी विहार, उत्तम नगर

नई दिल्ली 110056

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छांदस रचनाएं

गीत

डॉ.रामदरश मिश्र

नवगीत

छविनाथ मिश्र

डॉ. शिव बहादुर भदोरिया

डॉ. किशोर काबरा

ग़ज़ल

अक्षय गोजा

सजीवन मंयक

दोहे

डॉ. रामनिवास मानव

 

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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