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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-18, नवंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

 

 

 

वातावरण बीमार है

 

एक भी खिड़की नहीं चारों तरफ दीवार है ।

घुट रहा है दम यहाँ, वातावरण बीमार है ।।

 

एक लंगड़ा आदमी जैसे घिसटकर चल रहा

ठीक ही वैसे हमारे व़क्त की रफ़्तार है ।

 

अपना चेहरा आईने में देखकर कहने लगे

हम तो ऐसे हैं नहीं यह आईना बेकार है ।

 

ज़िंदगी के बाद रिश्ते शुरू होते हैं यहाँ

शव को कंधा लगा देना एक शिष्टाचार है ।

 

उस सड़क पर भीड़ ज़्यादा बढ़ गई है आजकल

चल रहा है जिस जगह पर मौत का व्यापार है ।

 

हमने जो भी कुएँ खुदवाये सभी सूखे रहे

लोग कहते हैं कोई चट्टान पानीदार है ।

  सजीवन मयंक

251- शनिचरा वार्ड - 1, नरसिंह गली

होशंगाबाद, मध्यप्रदेश

छांदस रचनाएं

माह के छंदकार

गीत

डॉ.रामदरश मिश्र

नवगीत

छविनाथ मिश्र

डॉ. शिव बहादुर भदोरिया

डॉ. किशोर काबरा

ग़ज़ल

अक्षय गोजा

सजीवन मंयक

दोहे

डॉ. रामनिवास मानव

 

 

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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