|
पंजाबी
उपन्यास(धारावाहिक-2)
रेत
हरजीत अटवाल
अनुवादः सुभाष नीरव
(भाग दो का पूर्वांश)
उसने
जबरन अन्दर घुसना चाहा,
तो मैंने उसे बाहर धकेल दिया। वह क्रोध में दांत पीसता हुआ
बोला,
“ओए
पाकी! हरामी! तेरी इतनी हिम्मत!”
नस्लवादी गाली मेरे सिर पर चढ़ गयी। मैं स्वयं पर नियन्त्रण न
रख सका। मैंने दायें हाथ का जोरदार मुक्का उसके नाक पर दे
मारा। उसके पैर उखड़ गये। तभी,
मैंने बायें हाथ का एक और मुक्का छोड़ दिया। वह गिर-सा पड़ा और
सामने वाली दीवार से जा टकराया। मैं और मारने के लिए आगे बढ़ा
तो उसने एक बांह से अपना मुँह छिपा लिया और दूसरी बांह
आत्म-समर्पण के तौर पर ऊपर उठा दी।
उसके नाक और मुँह में से खून बह रहा था। बीटर्स चीखने लगी,
“उठ
हरामी,
उठ अब…
और मार मुझे…
उठ अब मुकाबला कर,
चूहा क्यों बन गया?”
पीटर की आँखें झुकी हुई थीं। वह आहिस्ता से उठकर सीढ़ियाँ उतर
गया। बीटर्स अभी भी चीखे जा रही थी। उसे ऐसा करते देख उसके
बेटे रोने लग पड़े। पीटर जा चुका था। मैंने बीटर्स को शान्त
किया। आसपास के फ्लैटों के लोग बाहर निकल आए। एक बूढ़ी औरत
बताने लगी,
“उस
दिन मैंने ही पुलिस को फोन किया था। पीटर ने अति कर रखी थी।"
हेनरी नाम का एक गोरा कहने लगा,
“मैं
बूढ़ा हो गया हूँ,
नहीं तो पीटर की आज वाली हालत मैं कर देता।"
हर कोई पीटर के खिलाफ़ बोल रहा था और मेरे से सहमति प्रकट कर
रहा था। मैंने उन सबका धन्यवाद किया और बीटर्स को लेकर वापस
अन्दर चला गया। मैं अन्दर आकर सोफे पर बैठ गया और सोचने लगा कि
मिनटों में यह क्या हो गया। मेरी साँस तेज-तेज चल रही थी। मैं
घबराया हुआ भी था। बीटर्स बोली,
“सॉरी
इंदर,
घर में ड्रिंक नहीं है,
नहीं तो मैं तुझे देती क्योंकि इस वक्त तुझे ड्रिंक की सख़्त
ज़रूरत है।"
मुझे भी लगा कि अब मुझे शराब चाहिए थी। मैं उठा और दुकानों की
ओर चल पड़ा। बीटर्स भी मेरे संग आ गयी। उसने बच्चों के लिए
चिप्स आदि खरीदे। वोदका और व्हिस्की की बोतलें लीं। साथ में,
जूस,
कोक-लैमनेड आदि भी। वापस लौटकर हम पीने लग पड़े। दो पैग पीने
के बाद मैं कुछ भी सोचने के योग्य न रहा और बीटर्स के साथ
हँसी-मजाक करने लगा।
सुबह आँख खुली तो बीटर्स मेरे संग लेटी थी। मैं झटके से उठ
खड़ा हुआ। रात वाली घटना याद करने लगा। मुझे स्वयं पर गुस्सा
भी आ रहा था और मैं डर भी रहा था कि यह क्या मुसीबत मोल ले ली।
मैंने घड़ी देखी,
छह बजे थे। मेरा सिर दर्द कर रहा था। मुझे याद आया कि रात को
कई किस्म की शराब पी थी,
सिर तो दुखना ही था।
मुझे हिलता देखकर बीटर्स भी जाग गयी।
“गुड
मार्निंग इंदर,
नींद ठीक आयी?”
उसने
मुझसे पूछा।
मैं उठते हुए बोला,
“यह
नींद कहाँ थी,
बेहोशी थी। पता नहीं कहाँ था पिछले आठ-दस घंटे।"
मेरे बाथरूम से लौटने तक वह चाय ले आयी। मैं शीघ्र यहाँ से
निकल जाना चाहता था। आज काम करने का मूड नहीं था।
मैं बीटर्स के यहाँ से सीधे घर आया। नहा कर कपड़े बदले। चाय के
संग कुछ टोस्ट लिए। फिर से,
कल वाली घटना और बीटर्स के संग बिताई रात के बारे में सोचने
लगा। सब कुछ ही गलत हो गया था। पीटर से लड़ना,
फिर रात में बीटर्स के पास रह जाना। सवेरे बीटर्स भावुक-सी हुई
पड़ी थी। कोई मेरे साथ इस तरह जुड़ जाये,
जब तक मैं न जुड़ा होऊँ,
मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं
‘रात
गयी,
बात गयी’
की तरह भूलने की कोशिश करने लगा।
बारह बज गये। मेरे पास कुछ भी करने के लिए नहीं था। अखबार मैं
अंकल भुल्लर की दुकान से लेता आया था,
उसे पढ़ चुका था। एक-दो किताबें खोलीं,
पर मन नहीं रमा। रात वाली घटना रह-रहकर याद आ रही थी। आख़िरकार
यही सोचा कि क्यों न काम पर ही चला जाऊँ,
जितने घंटे लगें,
लगा लूँ।
मैं रेडियो आन करके कंट्रोलर को सूचना देने लगा,
“रोजर,
ईको नाइन,
ईको नाइन।"
“रोजर,
रोजर।"
“मैं
काम पर आ रहा हूँ,
इस वक्त शैफर्ड बुश के पास हूँ।"
“बेस
को ही आ जा,
काम बहुत ठंडा है,
कोई बीटर्स नाम की औरत तेरे लिए दो बार फोन कर चुकी है।"
मैंने कल ही बीटर्स को अपनी कम्पनी का कार्ड दिया था। अवश्य
पीटर वापस आ घुसा होगा। मैं सोचने लगा,
अगर वह वापस आ भी गया हो तो मैं क्या कर सकता था। मेरे से तो
अपनी मुश्किलें ही नहीं सम्भाली जाती थीं। बीटर्स करती रहे फोन,
अब मैं उसकी ओर नहीं जाऊँगा। पहले ही,
मेरे काम का पूरा दिन खराब हो गया और आधा दिन आज का भी गया।
पोर्ट बैलो रोड पर मुझे कोई काम नहीं था,
पर मेरी कार उधर मुड़ गयी। अवचेतन में शायद सोच रहा होऊँगा कि
इन सड़कों पर खड़े होकर काम की प्रतीक्षा कर लूँगा। फिर,
मुझे ख़याल आया कि सवेरे बीटर्स ने मुझे अपने फ्लैट की एक चाबी
भी दी थी कि जब दिल हो,
मैं आऊँ-जाऊँ। चाबी को मैंने अपनी चाबियों के गुच्छे में ही
टांग लिया था। मैंने छल्ले को छुआ। उसमें बीटर्स के फ्लैट की
चाबी पर उंगलियाँ फे्रीं। मैंने देखा कि मेरी कार रोबर्ट हाउस
के करीब जा चुकी थी और अगले ही पल मैं चाबियों के संग खेलता
बीटर्स के फ्लैट के सामने जा खड़ा हुआ था।
बीटर्स घर में नहीं थी। सुबह जैसे सब कुछ छोड़ा था,
वैसा ही था। पीटर के आने का कोई चिह्न वहाँ नहीं था। अब तक
मुझे कुछ-कुछ भूख भी लग आयी थी। मैंने फ्रिज खोला,
वह खाली पड़ा था। दूध की बूंद तक नहीं थी। मैं सोचने लगा-
अगर
मैं कल रात उसके बच्चों को चिप्स आदि लेकर न देता,
तो शायद बच्चों को भूखे ही सोना पड़ता। मेरा मन पसीज उठा। तीन
बजे थे। बीटर्स पता नहीं कहाँ मारी-मारी फिरती होगी। और अगले
आधे घंटे तक वह स्कूल के सामने होगी,
बच्चों को लेने के लिए।
वह मुझे स्कूल के नज़दीक मिल गयी। मैंने हॉर्न दिया तो वह कार
में आ बैठी। बैठते ही बोली,
“मैंने
तेरे लिए सन्देशा छोड़ा था,
मिल गया?”
“हाँ,
क्या बात है?”
“मुझे
टोमी ने बताया कि पीटर अपने दोस्त लेकर तुझे खोज रहा है।"
“अच्छा!”
“हाँ,
वह बहुत खराब आदमी है,
मुज़रिम किस्म का। उसके दोस्त भी अच्छे आदमी नहीं।"
एकबार तो मैं डर गया कि अब क्या होगा। लेकिन,
अपने अन्दर के डर को मैंने बीटर्स के सामने प्रकट नहीं होने
दिया और उससे कहा,
“बच्चे
लेकर आ,
हम टैस्को चलते हैं,
कुछ शॉपिंग कर लें।"
“क्यों?”
“मैं
तेरे घर गया था,
तेरा फ्रिज बिलकुल खाली था।"
“कल
मेरी बुक आ जाएगी,
मुझे पैसे मिल जाएँगे।"
“कल
तो दूर है,
इन्हें तो आज कुछ खाने के लिए चाहिए।"
“तू
इतना फिक्र न कर इंदर,
ये गरीब माँ के बच्चे हैं और सख़्त जान हैं। तू फिक्र न कर।"
“ये
दलील बाद में देना,
वक्त हो रहा है,
बच्चों को ले आ।"
वह स्कूल के अन्दर गयी और बच्चों को ले आयी।
वहाँ से हम टैस्को गये। उसके बच्चों के लिए और घर के लिए कुछ
खरीद-फरोख़्त की। उसके बच्चों को मैंने चॉकलेट लेकर दिए तो वे
मेरे आगे-पीछे मंडराने लगे। बड़ा डैनी छह-सात साल का था और
छोटा जॉन चारेक साल का। मुझे वे बहुत प्यारे लग रहे थे। मैंने
सोचा,
अब इन्हें उतार कर मैं घर चला जाऊँगा और कल सुबह से ही दुबारा
काम शुरू कर दूँगा।
उसके घर के सामने गाड़ी रोकी। सामान कार में से निकाला जिसे
अकेले बीटर्स नहीं उठा सकती थी। उसकी मदद के लिए ऊपर तक चला
गया। सामान रखकर लौटने लगा तो बीटर्स बोली,
“इंदर,
अन्दर आ,
कुछ खाकर जाना। कुछ पी भी लेना। अन्दर आ।"
मैं अन्दर चला गया। भूख तो लगी थी,
पर कुछ भी खाने का मूड नहीं था। समय भी नहीं था। मैं सैटी पर
बैठ गया। बीटर्स ने मेरे आगे रात वाली व्हिस्की की बोतल लाकर
रख दी। पहले मेरा दिल भाग जाने को कर रहा था,
पर बोतल देखकर मुझसे हिला न गया। पहला पैग पिया और टेक लगाकर
बैठ गया। दूसरे पैग के बाद मैंने टांगे मेज पर फैला लीं।
एक-दो बार मैंने उठने की कोशिश की। बीटर्स बोली,
“आज
यहीं ठहर जा,
यहीं से काम पर चले जाना सवेरे।"
बच्चों को जल्दी सुलाकर बीटर्स मेरे पास आ गयी। वह बहुत खुश
थी। मेरी ज़रूरत से अधिक तारीफ़ कर रही थी।
जिस बात का भय था,
वही हो गयी। पीटर ने अपने दोस्त लेकर मेरी कार को घेर लिया।
मैं जेईअर रोड से स्कोट्स रोड की ओर मुड़ा तो एक मैले-से
कपड़ों वाला गोरा मेरी कार के आगे आकर खड़ा हो गया। उसके साथ
दो आदमी और थे। थोड़ी दूरी पर खड़े पीटर को मैंने पहचान लिया।
मैंने मन ही मन कहा,
“इंदर
सिंह,
हो जा मार खाने को तैयार!”
मैंने तुरन्त सोचा कि अब क्या करूँ? एक तो यह था कि कार दौड़ा
कर ले जाऊँ। दूसरा यह कि रुक कर उनका सामना करूँ। कार दौड़ा ले
जाने के लिए मैंने उसे गियर में डाला कि तभी मुझे ख़याल आया कि
अगर आज भाग गया तो कल फिर ये यहीं पर होंगे। और मेरा काम भी
यहीं पर था। मैंने कार रोक ली। एक बड़ी-सी लोहे की रॉड जिसे
मैंने ऐसे मौकों पर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए सीट
के साथ रखा हुआ था,
को हाथ में पकड़ लिया और धीमे से दरवाजा खोला और खुला ही रहने
दिया। कार भी बन्द नहीं की, ताकि ज़रूरत पड़ने पर दौड़ा सकूँ।
एक गोरा जो अधिक आयु का था,
मेरी ओर बढ़ा। मुझसे पूछने लगा,
“क्या
नाम है तेरा?”
“तू
बता,
तेरा क्या नाम है?
तूने मुझे क्यों रोका है?”
“मेरा
नाम बिल्ल है। मैं चाहता हूँ,
तू पीटर और बीटर्स के बीच में न आये। वह उसकी औरत है।"
“पर
बीटर्स ऐसा नहीं कहती। उसने तो इसके खिलाफ़ कोर्ट के आर्डर भी
ले रखे हैं।"
“यह
तेरा मसला नहीं।"
“मेरा
मसला तो नहीं था,
पर बीटर्स ने बना दिया है। वह एक बार कह दे,
मैं एक तरफ हो जाऊँगा।"
“तू
हमें नहीं जानता,
तुझे एक तरफ तो हम कर ही देंगे।"
उसके शब्दों में भरपूर धमकी थी। उसके दूसरे साथी मुझे खा जाने
वाली नज़रों से घूरे जा रहे थे। आसपास लोग तो थे ही नहीं,
जो मेरी मदद कर सकते। मैंने रॉड को हवा में लहराया और जवाबी
धमकी में कहा,
“बिल्ल,
इस वक्त तो तू मेरी कार के आगे से हट जा,
फिर मुझे दोष न देना। और जा जो करना है,
कर ले।" कहकर मैं कार में बैठ गया। मैंने कार को थोड़ा आगे
बढ़ाया तो बिल्ल थूकता हुआ एक ओर हो गया। उसके साथी गालियाँ
बकने लगे। मैं भी गालियाँ बकता आगे बढ़ गया। मैंने शुक्र मनाया
कि घड़ी टल गयी।
यह घटना मेरे लिए बहुत डरावनी थी। इसका अर्थ था कि मेरे ऊपर
किसी भी वक्त हमला हो सकता था। सबसे पहले तो मैंने काम पर
पहुँच कर कंट्रोलर जैक को सारी बात बताई। जैक ने कम्पनी के
मालिक पैट मलोनी को बताया। पैट मलोनी ने इसकी शिकायत पुलिस को
कर दी कि कुछ अनजान आदमियों ने कम्पनी के ड्राइवर को धमकाया
है। पुलिस का एक अफसर मेरे पास आकर कागजी कारवाई करके चला गया।
इससे अधिक वे कर भी नहीं सकते थे। पीटर और बीटर्स वाली कहानी
मैं छिपा गया था।
अब मैं बहुत चौकस होकर रहने लगा था। खास तौर पर बीटर्स के घर
की ओर जाते हुए और उसके घर से लौटते हुए। मुझे यह भी भय सताने
लगा कि कहीं वह मेरी कार को ही कोई नुकसान न पहुँचा दें।
कुछेक दिन तो मैंने बहुत ही डर कर गुजारे। एक दिन,
बिल्ल मुझे हैरो रोड पर जाते हुए दिखाई दिया। मैंने कार उसके
पीछे लगाकर उसे रोक लिया। मैंने उसके सामने खड़े होकर कहा,
“बिल्ल,
उस दिन तू बहुत तकलीफ़ में था,
बता तेरी क्या सेवा करूँ।"
“यंगमैन,
तेरा मेरा कोई झगड़ा नहीं,
मैं तो पीटर के कहने पर आया था। जा,
ऐश कर।"
डर से उसकी आवाज़ कांप रही थी।
उस दिन के बाद मैं निश्चिंत हो गया। पहले मैंने बीटर्स को कुछ
नहीं बताया था। उस दिन के बाद ही सारी बात उसे बताई। वह कहने
लगी,
“पीटर,
अपराधी किस्म का आदमी है,
जेल में भी रहा है वह,
पर डरने वालो को ही वह डराता है।"
मैं बीटर्स के पास अक्सर रात में ठहर जाता और वहाँ से अगली
सुबह काम पर चला जाता। वहाँ से काम भी नज़दीक ही पड़ता था।
बीटर्स के साथ संबंध रखने जहाँ पहले मुझे बुरे लगते थे,
अब उतने बुरे नहीं लग रहे थे। उसका साथ मुझे कई प्रकार का
लुफ़्त देता। वह हर समय खुश रहती। उसका चेहरा ठीक हुआ तो वह
बहुत खूबसूरत लगने लगी। लगता नहीं था कि वह दो बच्चों की माँ
होगी।
बीटर्स फ्लैटों में रहने वाले पड़ोसियों की बातें मेरे साथ
करने लगती। जेईअर रोड पर रहते लोगों की नई-नई खबरें सुनाती। वह
बताने लगती,
“बारह
नंबर में जुआइस रहती है,
चार बच्चे हैं इसके,
चारों काउन्सल ले गयी। दिन में दस-दस आदमी आते हैं इसके पास,
कइयों ने इसकी शिकायत कर रखी है,
पर कोई कुछ नहीं कर रहा।"
“ऊपर
वाली मंजि़ल पर जिही मैरी रहती है,
इसे सौ तक गिनना नहीं आता।"
“छब्बीस
नंबर वाली बारबरा का पहला लड़का आयरिश है,
दूसरा किसी काले से,
लड़की किसी चीनी से है और सबसे छोटा टर्किश आदमी से। सब उसे
यू.एन.ओ. कहते हैं।"
“आखिरी
घर में माग्रेर्ट रहती है। उसके लड़के ने साँप पाल रखा है।
मुझे साँपों से बहुत डर लगता है।"
सारे मुहल्ले से उसने इस तरह बातों-बातों में ही मेरी
जान-पहचान करवा दी थी। वह सवेरे कोई चलताऊ-सी अखबार लाती और
ख़बरों की चीर-फाड़ करने लगती। टेलीविज़न के सीरियल देखती और
उनके पात्रों को असली ज़िन्दगी से जोड़-जोड़ कर देखने लगती।
एक शाम मैं बीटर्स के घर गया। वह बहुत बेचैन थी। मैंने कारण
पूछा तो बोली,
“आज
पीटर स्कूल के पास मिला था। मुझ पर रौब डाल रहा था। कल सुबह
ज़रा मेरे संग चलना।"
अगली सुबह बीटर्स मुझे लेकर एजवेअर रोड की ओर चल पड़ी। छोटी
सड़कों पर कार घुमाने के लिए कहते हुए बोली,
“इस
वक्त वह यहाँ दूध बाँटता घूम रहा होगा।"
तभी,
सामने से एक दूध वाली फ्लोट आती दिखाई दी। यह पीटर ही था।
बीटर्स उसे देख मुझसे बोली,
“इसके
पास जाकर रोक तो ज़रा।"
मैंने फ्लोट के बराबर कार रोक दी। बीटर्स गालियाँ बकती हुई
उसकी ओर दौड़ी। पीटर फ्लोट छोड़कर भाग खड़ा हुआ। बीटर्स
पीछे-पीछे दौड़े जा रही थी और ऊँची आवाज़ में गालियाँ बके जा
रही थी। पीटर इतना तेज दौड़ा कि उसने पीछे मुड़ कर भी न देखा।
बीटर्स इतने गुस्से में थी कि मैं उसे पकड़ कर वापस लाया। और
पीटर उसकी ज़िन्दगी में से हमेशा-हमेशा के लिए निकल गया।
बीटर्स से मैं काफी घुल-मिल गया था। वह मेरी ज़रूरत बन चुकी
थी। उसके बच्चे हमारे संबंधों के बीच कभी नहीं आये थे। कभी-कभी
मैं दिन में भी उसके घर चला जाता। कई बार वह घर में नहीं होती।
अब उसका छोटा बेटा भी सवेरे नर्सरी में जाने लगा था। मैं सोचता
कि वह खाली होने के कारण इधर-उधर निकल जाती होगी। मैं पूछता तो
कह देती- शीला
के घर गयी थी। उसकी सहेली शीला से मैं मिल चुका था।
एक दिन बीटर्स उदास थी। मैंने कारण पूछा तो उसने कुछ न बताया।
फिर,
वह हर रोज़ उदास रहने लगी। मुझे लगा कि वह कोई बात करना चाहती
थी। मैंने पूछा तो टाल गयी। फिर,
ç |