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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। व्यंग्य ।।

 

 

 बेताल कथा

सुयोग्य वित्तमंत्री


गिरीश पंकज

 

विक्रमार्क ने वेताल को कंधे पर लाद कर इस बार मजबूती से जकड़ लिया। उसकी हरकत को देख कर वेताल हँस पड़ा और बोला-हे राजन, मनुष्य अपना धन-वैभव, नाते-रिश्तेदार किसी को भी कस कर पकड़ ले। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । जिसे जाना होता है, वह चला ही जाता है। आज नहीं तो कल। जैसे मैं अभी हूँ, थोड़ी देर बाद नहीं रहूँगा।

 

इतना बोल कर वेताल ने ठहाका लगाया। वेताल के ठहाके और उसके आत्मविश्वास पर विक्रमार्क को बड़ा गुस्सा आया । लेकिन वह ख़ामोशी के साथ चलता रहा । वेताल ने आगे कहना शुरु किया- राजन, चलो फिर एक कहानी सुनाता हूँ। तुमको कहानी सुनने का बड़ा शौक है। इसीलिए तुम महल छोड़ कर मेरे पीछे पड़े हो, ताकि नई-नई कहानियाँ सुनने मिलें। मैं सब समझता हूँ। आजकल राज-काज में तुम्हारा मन नहीं लग रहा। वहाँ रहो तो सौ तरह के छल-छंद करने पड़ते हैं। और तुम ठहरे सीधे-सादे । खैर, मुझे क्या। मेरी बोरियत दूर करने के लिए तुम आ गये हो। तो, सुनो एक कहानी....

 

...राजन्, किसी शहर में एक राजा रहा करता था। उसका नाम था महेंद्रप्रताप । वह बड़ा गरीब था। राजा के नौकर चाकर भी गरीब थे। राजा की माँ गरीब थी। पिता गरीब था। प्रजा तो बिल्कुल ही गरीब थी। दरअसल राजा को पड़ोसी राज्य के राजा शत्रुजय सिंह ने लंबे समय तक बंदी बना कर रखा था। राजकोष को पूरी तरह लूट कर उसने महेंद्रप्रताप को मुक्त किया था। राजकोष खाली होने के कारण राजा का राजसी ठाट-बाट जाता रहा। उसे अपनी गरीबी पर बड़ी कोफ़्त होती । राजकोष कैसे भरा जाए ताकि ऐशोआराम के साधन जुटें । हर राजा को अपने प्रजा की नहीं, अपने ख़जाने की चिंता रहती है। गरीबी के कारण न राजा पुतरियों का नाच देख पाता था, और न सोमरस का पान कर पाता था। शतरंज की बाजी भी नहीं खेल पाता था। फोकट में कौन आए। राजा जब पैसे लुटाता है तभी तक उसके पास भीड़ रहती है। भीड़ देखे बगैर किसी राजा को चैन नहीं पड़ता। भीड़ जब राजा के ज़िंदाबाद के नारे लगाती है तो राजा को लगता है अब जीना सार्थक हुआ ।

 

राजा इसी सोच में घुला जा रहा था कि काश उसके पास कोई सुयोग्य मंत्री होता। बदहाली के कारण पुराना मंत्री राजा महेंद्रताप को छोड़कर चला गया था। राजा को नये वित्त मंत्री की तलाश थी। राज्य में एक बेरोजगार युवक रहता था । वह विदेश से शिक्षा ग्रहण करके लौटा था। जैसे ही उसे पता चला कि राजा को वित्त मंत्री की तलाश है तो वह राजा से मिलने पहुँच गया। । युवक नये ज़माने का था, सो उसने राजा से कहा, हे राजन, मैं आपके राज की दुर्दशा को दूर कर सकता हूँ, लेकिन एवज में मैं प्रतिमास एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ लूँगा। आपको मेरा मेरा यह पैकेज मंज़ूर हो तो बात करें।

 

युवक की बात सुन कर राजा हँस पड़ा, और बोला-हे अतिउत्साही युवक, राजकोष में एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ होती तो वित्तमंत्री नियुक्त करने की ज़रूरत न पड़ती । सबकुछ काल डब्बा, खाली बोतल है । तुम फोकट में अपनी सेवाएँ दे सको, तो स्वागत है। वरना जिस ओर से आए हो, उसी ओर से वापस चले जाओ।

 

राजन, जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि युवक परदेश से आर्थिक मामलों का खास प्रशिक्षण लेकर लौटा था। उसे पूरा विश्वास था कि राज्य में उसे अच्छा वेतन मिल जाएगा, लेकिन यहाँ तो सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने की नौबत थी। कड़के राज्य का निवासी होने के कारण वह दुखी था। राजा की बात सुन कर वह निराश हो गया, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। उसने आखिरी दाँव खेला- राजाजी, मैं अपना मूल्य नहीं गिरा सकता, लेकिन एक वचन देना होगा, कि जैसे ही आपका राजकोष लबालब भर जाए, आप मुझे प्रतिमाह एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ ज़रूर देंगे।

 

राजा महेंद्रप्रताप की आँखों में चमक आ गई । वह बोल उठे-अगर ऐसा हो गया तो मैं एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ ज़रूर दूँगा। पर ऐसा हो तो सही। वैसे मेरी भी एक शर्त है। अगर छह माह के भीतर ऐसा नहीं हुआ तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।

 

युवक हँसा और बोला- मुझे आपकी शर्त मंज़ूर है लेकिन हम दोनों की शर्तें लिखित रहेंगी। मेरा अनुभव रहा है कि मतलब निकल जाने के बाद बड़े लोग अपने पिताश्री को भी नहीं पहचानते ।

 

राजा ने कहा ठीक है । फिर उसने अपने ऊँघते हुए मंत्री को जगाया और युवक को लिखित आदेश थमा दिया।

 

इतनी कहानी सुनाने के बाद वेताल हमेशा की तरह ख़ामोश हो गया । फिर बोला- हे विक्रमार्क, अब आप ही बताइए कि आगे क्या हुआ ? बिल्कुल ठीक-ठीक कहानी सुनाना, वरना तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।

 

विक्रमार्क को कहानी बड़ी रोचक लगी । इसमें सस्पेंस था । रोमांच भी। चलते-चलते विक्रमार्क ने आँखें बंद की और सोचने लगा। थोड़ी देर में ही कहानी का भविष्य सामने दिखने लगा। उसने कहना शुरु किया-  ‘युवक न राजा महेंद्रप्रताप से बस एक ही बात कही कि राजन, राजकोष को भरने का एक ही तरीका है, कि आप प्रजा पर करों का बोझ लाद दें। किसी तरह का संकोच न करें। तरह-तरह के कर बनाएँ और प्रजा पर थोप दें. आयकर, वाणिज्यकर, पर्यावरण कर, साँस लेने पर कर, यातायातकर, मनोरंजनकर, शिक्षाकर, जन्मकर, मृत्युकर आदि-आदि । कर ही कर। कर लादते हुए प्रजा से छल-संवाद भी करें, कि राज्य को शत्रुओं से बचाने के लिए धन की ज़रूरत है। कछ महीने की बात है। जनता देश प्रेम दिखाए और अपने खून-पसीने की कमाई का एक हिस्सा राज्य को दे। यह आदेश है। आदेश न मानने वाले दंडित किए जाएंगे ।

 

राजा का आदेश था सो बेचारी प्रजा अपना पेट काट-काट के कर पटाने लगी और देखते ही देखते राजकोष भरने लगा। जल्दी ही लबालब हो गया । राजा का सूखा चेहरा खिल उठा । उसने युवक को अपना वित्त मंत्री बना दिया। युवक की बेरोजगारी दूर हुई और राजा की गरीबी भी। राजा के ऐशोआराम के दिन लौट आए। और रोज महफ़िलें सजने लगीं।

 

विक्रमार्क इतना बोल कर रुका ही था, कि वेताल ने कोई देरी नहीं की। राजा का मौन भंग हो चुका था और शर्त की मुताबिक बैतलवा फिर डाल पर जा लटका।

  गिरीश पंकज

जी-31, न्यू पंचशील नगर

रायपुर, छत्तीसगढ़

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