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प्रगतिशीलता के नाम पर रिश्तों की तिज़ारत
नासिरा शर्मा
जबसे
संसार नर-नारी को लेकर चला है, तबसे दोनों की उपलब्धियों में
बराबर का विकास होता रहा है, चाहे उसका स्वरूप, क्षेत्र, विषय
एक-दूसरे से भिन्न रहा हो । हर काल में औरतों ने अपने समय को
कला-साहित्य, नृत्य, संगीत, इतिहास व समाजशास्त्र में दर्ज़
किया है । ज़रूरत पड़ने पर तलवार भी उठाई है और पति की चिता के
साथ जलकर आत्मरक्षा का परिचय भी दिया है । अनपढ़ माताओं ने
अपनी ममता और नैतिक संस्कार देकर बच्चों को इस योग्य बनाया कि
वे बड़े-से-बड़े काम अंज़ाम दे पाए । इन सारे बिखरे गुणों को,
जो गुज़री शताब्दियों में अनेक नामों से ग्रंथों में अंकित है,
जब सामूहिक रूप से देखती हूँ तो महसूस होता है कि यह सदी
वास्तव में महिला-सदी है, जिसमें औरत हर क्षेत्र में न केवल
मर्द के संग क़दम-से-क़दम मिलाकर चली है, बल्कि कुछ क्षेत्रों
में मर्द से आगे निकलकर उसने इस तर्क को साबित कर दिया है कि
मर्द और औरत के दिमाग में कोई फ़र्क नहीं होता । दोनों मानवीय
गुणों का स्त्रोत छुपा है, जो परिवेश, अनुभव, अवसर के अनुसार
से झुंड के रूप में, हमारे सामने आता है । गुज़री शताब्दियों
के निचोड़ के रूप में जब हम इस पूरी सदी का अवलोकन करते हैं,
तो यह प्रश्न हमारे मन-मस्तिष्क में उठना ज़रूरी है कि इस सदी
की औरत की आवाज़ क्या है
?
वह इतनी मुखर कैसे हुई
?
वह क्या कहना चाहती है अपने बारे में
?
उसका नज़रिया समाज, अर्थ, राजनीति, परिवार, धर्म को लेकर क्या
है ?
सबसे पहली बात जो विश्व-स्तर पर समझ में आती है, वह है औरते को
इनसान समझा जाए, उसको बराबरी से जीने का अधिकार दिया जाए । हर
राष्ट्र, हर समाज में रहने वाली नारी की यह इच्छा है, जो उसके
साहित्य-कला में झलकती है । पर जब हम भारतीय परिवेश में जी रही
महिला को इस संदर्भ में देखते हैं, तो महसूस होता है कि यहाँ
तो मर्दों को भी वह सारे अधिकार प्राप्त नहीं है तो फिर औरत वह
सब कैसे हासिल कर सकती है
?
विश्व के अनेक देश हैं जहाँ सियासत और धर्म की सत्ता है, परंतु
भारत एक ऐसा देश है जहाँ सामाजिक जकड़न है और इस जकड़न के
ताने-बाने, धर्म, अर्थ, राजनीति, विचारधारा इत्यादि हैं ।
इसमें भी संदेह नहीं कि विपरीत परिस्थितियों में रहने के
बावजूद संसार में सबसे अधिक संख्या में बुद्धिजीवी महिलाएँ
भारत में हैं और अतीत में भी थीं । यह भारत की संस्कृति का एक
उज्ज्वल पक्ष रहा है और उस प्रवृत्ति का भी, जो बड़े सहज रूप
में भारतीय औरतों में सदा से विद्यमान रही है । यदि आप
ईसापूर्व बौद्ध भिक्षुणियों की कविताएँ पढ़ें तो ज्ञात होगा कि
उनमें जीने की ललक और विद्रोह का स्वर कितना तीखा है ।
इतिहास की और संकेत का अर्थ अतीत पर इतराना नहीं है, बल्कि उस
रेखा की तरफ़ इशारा करना है जो प्राचीन काल से आज तक औरतों
द्वारा खींची गई हैं, जिसने परिवार को टूटने से बचाया, नैतिक
मूल्यों का सरंक्षण किया, समाज को एक ठोस ज़मीन दी । उसी ज़मीन
पर इस सदी की औरत खड़ी है, जिसको सरकार द्वारा बनाई योजनाओं
एवं कानून का, महिला संस्थाओं द्वारा पारिवारिक और व्यक्तिगत
कठिनाइयों में सहायता का समर्थन काफ़ी हद तक प्राप्त है । वह
चाहे तो एक सुखमय जीवन व्यतीत कर सकती है और बहुत-सी औरतों ने
कानून को जानकर, योजनाओं को अपनाकर, अपने को बदला है । बाक़ी
औरतें व्यथा एवं कठिनाइयों के अथाह दलदल में फँसी हुई हैं,
क्योंकि वर्गों की असमानता उनकी जीवन-शैली को तय करती है,
इसलिए वे आज भी प्रताड़ित हैं ।
आज किसी भी मंत्रालय, प्रयोगशाला, शोध-संस्थान, रेडियो,
टी.वी., प्रचार-प्रसार माध्यम, प्राइवेट सेक्टर, उद्योग-कहाँ
औरत अपने पैर जमाए सारी उपलब्धियों के बीच जो चीज़ औरत-मर्द के
बीच से धीरे-धीरे गायब हो रही है, वह है-आपसी संबंधों में
कोमलता, आकर्षण और अनुराग । प्रेम का प्रदर्शन करना और नौकरी
हासिल करना, प्रेम-विवाह और उसके न निभ पाने पर तलाक ले लेना,
ससुराल और पति से समझौता करने पर अपमानबोध और दूसरों से
प्रत्येक स्तर पर झुकना, केवल भौतिक स्तर पर कहीं पहुँचने-भर
के लिए-यह स्थिति बहुत सुखद नहीं है । यह मानवीय गरिमा के भी
ख़िलाफ़ है । यह प्रायः उन महिलाओं द्वारा किया जा रहा है, जो
ज़ल्दी में हैं, जो चतुर हैं और यह तथ्य जान चुकी हैं कि अपनी
व्यथा को कैसे सुनाया जाए
?
वह मर्द की कमजोरी को अपनी शान बनाकर कई तरह के काम करती हुई
उन महिलाओं की पंक्ति में आ खड़ी होती हैं, जो अपनी शक्ति,
गुण, विवेक से बड़ी धीमी गति से परिवार की खट्टी-मीठी बातों को
लेकर बाहर की दुनिया का रणक्षेत्र रोज लड़ती हैं ।
ऐसी औरतों की लड़ाइयाँ पर्तदार हैं । पहले वह औरतों के बीच
अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करती हैं । ऐसे संघर्ष में
औरतों के अवसरवादी व्यवहार के चलते वे न केवल घोर आलोचना का
कारण बनती हैं, बल्कि अपनी निंदा उन पुरुषों के बीच निंरतर
सुनती रहती हैं, जो गंभीर एवं सहज हैं और गुणवान औरतों का
सम्मान करते हैं । अवसरवादी महिलाओं के इस षडयंत्र से भले ही
वे पुरुष न डरें और बात को समझ लें तो भी वे कर्मठ औरतों के
प्रति अपना अंदाज़ बदल लेते हैं, ताकि उनकी अपनी इमेज़ न
बिगड़े, बदनामी न हो । यह कर्मठ औरत जो अपने बलबूते पर आगे बढ़
रही है, उसके दूसरे रणक्षेत्र का घेरा वे मर्द-औरत होती हैं,
जो ‘प्रोफ़ेशनल
जेलेसी’
यानी व्यावसायिक ईर्ष्या के कारण टकराहट का कारण बनती हैं
।यहाँ पर संघर्ष का स्तर दूसरा होता है, मगर तनाव और हर प्रकार
के लांछनों से भरा होता है । दोनों स्थितियों में गुणवान औरत
अकेली लटके-झटके से बाजी मार लेती है, तब औरतों के अंदर का
आक्रोश मर्दों से अधिक औरतों पर टूटता है, जबकि भागीदार मर्द
भी होता है । खासकर तब जब टक्कर की औरत को हराने के लिए वह कोई
बेवकूफ़-सी महिला को उसके समकक्ष खड़ा कर उसको सारी
‘पॉवर’
दे बैठता है कि कैसे फंला औरत की कमर तोड़ी जाए और उसे पराजित
किया जाए ।
इसमें कोई शक़ नहीं कि आज हम एक बेईमान समय में जी रहे हैं,
जहाँ मौखिक शब्दों का राज्य है । मौखिक शब्द का कोई सबूत नहीं,
जब चाहे आप मुकर सकते हैं । विश्वासघात करके आप जितना खुश होते
हैं उसको व्यक्तित्व के विकास की संज्ञा देते हैं, मगर जब आपकी
यही विश्वास की बुनियाद हिलती है और आप चारों खाने चित्त गिरते
हैं, आपकी आँखें खुलती हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ।
ऐसे नाज़ुक और तेज़ रफ़्तार समय में औरत की भूमिका बहुत अहम्
है कि वह भविष्य की योजना क्या बनाए
?
समाज को किधर जे जाए ?
आने वाली पीढ़ी को कौन-सा विश्वास-भरा संस्कार दे
?
औरत की मान-मर्यादा का कौन-सा पैमाना गढ़े
?
प्रगतिशीलता की परिभाषा की व्याख्या क्या करे, जो सार्थक हो
?
मैं आज उस औरत की परेशानी को लेकर चिंतित हूँ जो गूढ़-गंभीर और
भविष्य के लिए चिंतित है, जो जानती है कि नाम पैदा करना, धन
कमाना, मरमर्ज़ी से शादी करना, पसंद न आने पर तलाक दे देना, घर
चाहे वह ससुराल हो या मायका, अपनी ज़िम्मेदारियों से
मुक़रना-इन सारी बातों के बावजूद वह कहीं पर जाकर तन्हा और
अकेली क्यों रह जाती है
? ‘चलो
तो सारे ज़माने को साथ लेकर चलो’
वाला उसका ज़ज्बा एकाकी होकर अपने तक संकीर्ण क्यों हो गया
?
मानवाधिकार में वह केवल अपने निजी अधिकार की बात पर ही क्यों
टिकने लगी ?
उसमें दूसरी औरत जो सास, ननद या सहकर्मी है, वह क्यों नहीं
टिकती ?
क्या वह मर्दों के संग खड़ी होकर कोई सार्थक भूमिका निभाने की
बज़ाए औरत के अधिकारों के हनन में अपना भविष्य देखने लगी है
?
ऐसी बचकाना हरक़तें और सोच रखने वाली औरतें वास्तव में मुझे भी
बेचैन करती हैं ।
आज जब हम पिछली सदियों को निचोड़कर इस सदी के दावेदार बने हैं,
तो हमको अपनी अच्छाइयों और बुराइयों का अवलोकन करते हुए खुली
आँखों से यह देखना पड़ेगा कि हमने क्या खोया, क्या पाया
?
आज का हमारा हर क़दम कल हमसे आगे आने वाली कई पीढ़ियों की
बरबादी और आबादी का खुलासा माँगेगा, इसलिए इस सदी की औरत की
आवाज़ बराबरी की माँग और इनसान की तरह जीने की स्वतंत्रता के
लिए जितनी भी मुखर हुई, तो भी अंतरध्वनि इस स्वर की बड़े गहरे
रूप में उपस्थिति दर्ज़ कराती है कि इस विकास की दौड़ में,
स्वतंत्रता की इस ललक में नैतिकता का मापदंड क्या होगा और इसको
लेकर चलने वाली महिलाओं को जड़ और रूढिवादी कहने वाले छद्म
बुद्धिजीवियों एवं नारी-समर्थकों को अपने आचरण से बताना पड़ेगा
कि वास्तविक प्रगतिशीलता किसको कहते हैं
–
इसका अर्थ पतन नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों की गरिमा है, जो
रिश्तों की तिज़ारत से अलग एक ठोस ज़मीन देती है और यही इस
शताब्दी की औरत की आवाज़ होनी चाहिए ।
नासिरा शर्मा
डी-37/754,
छत्तरपुर पहाड़ी, नई दिल्ली
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