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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। आईना ।।

 

 

आईना


राहुल उपाध्याय

 

जब तक देखा नहीं आईना

अपनी खामियाँ नज़र आई ना

 

काश ये दो पंक्तियाँ किसी महानुभाव ने कहीं होती। आपका दुर्भाग्य है कि ये मैंने लिखी हैं। ये मेरे उस प्रयास का परिणाम है जिसमें की दूसरी पंक्ति के आखरी के शब्द पहली पंक्ति के आखरी शब्द ही होते हैं। एक हल्का-सा अंतर होता है। वो यह कि या तो वो संधि द्वारा बनाए जाते है या फिर संधि विच्छेद द्वारा।

 

चूंकि ये मेरी पंक्तियाँ हैं। तो ज़ाहिर है हर कोई इस पर अपनी टिप्पणी करता है। आप इतने निराशावादी क्यूं हैं? ये क्यूं नहीं कहते कि

 

जब तक देखा नहीं आईना

अपनी खूबियां नज़र आई ना

 

कहना उनका सही है। ग्लास को आधा खाली कहने के बजाय आधा भरा भी कहा जा सकता है।

 

आईना बहुत उपयोगी वस्तु है। इसका उपयोग रोज हर जाति, सम्प्रदाय, और देश में समान रुप से किया जाता है। ये बहुत ही सस्ते दामों पर सबको उपलब्ध है। चाहे कोई सुबह उठ कर अपने ईष्ट देव को स्मरण करे न करे, आईने के दर्शन जरूर करता है। स्त्री, पुरुष, बच्चे, और बूढ़े सब देखते हैं कि वे कितने सुंदर है और क्या सुधार किया जा सकता है ताकि वे और सुंदर देखे। लोग उन्हें देखे तो प्रसन्न हो।

 

एक और आयाम नज़र आता है आईने का। वो यह कि आईने से मनोरंजन भी होता है। गाँव के मेले में अक्सर एक खेमा जरूर होता हैं जिसमें कई तरह के आईने होते है जिनमे इंसान बारी बारी से कभी मोटा तो कभी पतला, कभी लम्बा तो कभी छोटा नज़र आता है।

 

और आईना प्रयोगशाला में एक उपकरण के रूप में काम आता है। इस को लेकर प्रकाश के नियम और गुण आदि के बारे में प्रयोग किये जाते हैं। आईना बच्चों का खिलोना भी है। वे इससे आलोकित दायरे को दीवार और छत पर घुमाते रहते है और उनका कौतूहल कम होने का नाम नहीं लेता। आईना सपाट होता है और स्वभाव से अत्यंत शीतल। जो छवि दिखाता है वो सच्चाई के बिल्कुल विपरीत होती है और फिर भी कोई इसे दोषी नहीं ठहराता। सब स्वयं ही इसका आशय जान लेते है और इसका धन्यवाद देते हैं।

 

इन सब को ध्यान में रखते हुए, मैंने इस स्तम्भ का नाम आईना रखा है। कभी मनोरंजन करेगा तो कभी खूबियाँ दिखाएगा तो कभी खामियाँ।

 

मुझे कविता लिखने की प्रेरणा कबीर के दोहो से मिली। मेरा मानना है कि उन के जैसा गागर में सागर भरने वाला और कोई नहीं। हास्य, व्यंग्य और दर्शन में वे पारंगत थे। उनका ये दोहा मुझे खास तौर से पसंद है -

 

रंगी को नारंगी कहे, बने दूध को खोया

चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया।

 

सुना तो इसे आपने कई बार होगा। ये एक हिंदी फ़िल्म के गीत के शुरूआत में भी गाया गया है। इसे समझने के लिए इसे कई बार पढ़ना होगा। तीनों तथ्य एक से बड़ कर एक विडंबना को उजागर करते है। नारंगी एक बेहद रंगीन फ़ल है और उसे दुनिया ने नारंगी का नाम दे दिया। जब दूध का खोया बना लिया जाता है तो वो आपके सामने है और दुनिया उसे कहती है खोया। जो वाहन है, चलायमान है उसे दुनिया कहती हैं गाड़ी! गाड़ी तो लकड़ी जाती है, गाड़े तो मुर्दे जाते हैं। गाड़ी का मतलब जो एक जगह पर अटक जाए। जो वहाँ से हिल न सके।

 

मुझे भी शब्दों से खेलना बहुत अच्छा लगता है। हर कविता में कुछ न कुछ शब्द आ ही जाते हैं जिनके दो अर्थ हो। ऐसी कविताएँ फिर मैं blog पर प्रकाशित करता हूँ और मित्रों को भेजता हूँ। पिछले एक साल से सिएटल शहर में हर महीने के चौथे शनिवार को मैं अपने घर एक काव्यगोष्ठी का आयोजन कर रहा हूँ। इसमें इस शहर में रहने वाले और कविता लिखने वाले या इसमें रचि रखने वाले सम्मिलित होते हैं। पिछले हफ़्ते मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में गया था। वहाँ मेरा परिचय देते हुए कहा गया कि ये हर महीने नियमित रुप से गोष्ठी का आयोजन कर के हिंदी के सेवा कर रहे हैं। तो मेरे मन में तुरंत एक वाक्य कौंध गया - 'मैं मासिक धर्म निभा रहा हूँ।' मैं सोचता रहा कि अगर मासिक धर्म लगातार चलता रहे और कभी ये क्रम टूटे नहीं तो सृजन कैसे होगा? और फिर मेरा शब्दो से खेल शुरु हो गया जो दूसरे दिन जा के रुका जब 'जन्म' कविता पूरी हो गई। ये एक संयोग ही था कि वो मेरा जन्म दिन भी था।

 

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है

यह एक सर्वविदित सत्य है

 

कभी झुठलाया गया

तो कभी नकारा गया

हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

 

कभी शिष्टता के नाते

तो कभी उम्र के लिहाज से

'अभी तो खेलने खाने की उम्र है

क्या करेंगे इसे जान के?'

 

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो

रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो

 

बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए

और बच्चों की तरह हम रुठ गए

जैसे एक सुहाना सपना टूट गया

और दुनिया से विश्वास उठ गया

 

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं

ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं

ये देश है, मातृ-भूमि नहीं

ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं

 

एक बात समझ में गई

तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा

घुस गए 'लैब' में

शांत करने अपनी क्षुधा

 

हर वस्तु की नाप तौल करे

कर सके तो मखौल करे

 

वेदों को झुठलाते है हम

ईश्वर को नकारते है हम

तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम

 

ईश्वर सामने आता नहीं

हमें कुछ समझाता नहीं

 

कभी शिष्टता के नाते

तो कभी उम्र के लिहाज से

'अभी तो खेलने खाने की उम्र है

क्या करेंगे इसे जान के?'

 

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं

इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है

 

इस कविता को बहुतों ने पसंद किया। और नहीं भी किया तो कम-से-कम जन्मदिन की बधाईयाँ तो जरुर भेजी गई। पर दो नई बातें सुनने में आई। एक तो ये कि ज्यादातर लोग खुश थे कि इस कविता में वेदो और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। दूसरा ये कि इसमें ज्यादातर शब्द हिंदी के थे। उर्दू के इक्का-दुक्का शब्द थे। मुझे सलाह दी गई कि आप हिंदी को भ्रष्ट होने से बचा ले। अगर ख़ुदा को कविता से जुदा कर दिया जाए तो अच्छा होगा।

 

सामान्यत: मैं अपने आप को कविता तक ही सीमित रखता हूँ। कविता के अलावा कुछ नहीं कहता। और न ही कविता की सफ़ाई देता हूँ। पर चूंकि अब मंच सामने हैं तो कुछ कहना चाहूँगा। मैं रतलाम में और रतलाम जिले में (शिवगढ़ और सैलाना) पला हूँ। वहाँ पर हम मालवी या साधारण हिंदी बोलते थे। नई दुनिया एक मात्र अखबार था। उसे देने अखबार वाला आता था। अखबार का बिल आता था हर महीने। मेरे नाना गाँधीवादी थे और प्राथमिक विद्यालय चलाते थे जिसे लोग त्रिवेदी प्राईवेट स्कूल के नाम से जानते थे। देखिये, बिना अंग्रेज़ी और उर्दू के इतनी छोटी सी बात भी पूरी नहीं की जा सकी।

 

एक और उदाहरण। आप जाइये एक दूर-दराज के गाँव में जहाँ एक अधेड़ उम्र की माँ है जो कड़ी मेहनत कर के अपना घर चलाती है। उस के पास वक्त नहीं है कि वो या उसकी भाषा राजनीति से या फ़िल्मी दुनिया से या टीवी से प्रभावित हो। उससे आप कहिये कि - 'माई, तेरे बेटे के नम्बर अच्छे नहीं आए है इसलिए वो फ़ैल हो गया है। तू उसकी कोई अच्छी सी ट्यूशन लगा दे। हो सकता है वो अगली बार पास हो जाए।'

 

अब आप यहीं बात कह कर देखे बिना नम्बर, फ़ैल, ट्यूशन और पास के। बहुत मुश्किल है। और आप अगर शव्दकोश की सहायता से कह भी दे तो मैं नहीं समझता कि वो माँ उस बात को समझ पाएगी। क्या फ़ायदा हैं इस तरह से हिंदी को संकीर्ण बनाए रखने की? आग भी उतना ही ठीक शब्द है जितना कि अग्नि। मुझे समझ नहीं आता है कि क्यूं कुछ लोग बात बात पर हिंदी का झंडा फ़हराने से बाज नहीं आते? खुद तो अंग्रेज़ी पढ़ लिख कर आगे निकल लिए। अब चाहते हैं कि बाकी लोग पीछे ही रहे तो बेहतर है। एक सज्जन तो यहाँ तक लिख बैठे कि 'हिंदी केवल गाँव और गरीबों तक सीमित रह गई है। जैसे जैसे गरीबी हटती जाएगी, वैसे वैसे हिंदी मरती जाएगी।'

 

मेरे लिए ये एक सुखद घटना होगी। गरीबी हटाने का प्रयत्न कई वर्षो से किया जा रहा है। अगर हम इसमें सफ़ल हो गए तो ये एक हर्ष का विषय है। मातम मनाने का नहीं। रही बात हिंदी के मरने की। वो ऐसे तो मरने वाली है नही। और अगर मर भी गई तो कोई गम नहीं। मैं हमेशा से इस पक्ष में हूँ कि इंसान बेकार में ही बटा हुआ है जाति में, प्रांत में, राज्य में, देश में, भाषा में, धर्म में। क्या ही अच्छा हो जब सारी सीमाएं हट जाए और हम सब आज़ादी से जहाँ जाना चाहे, जा सके। न पासपोर्ट की आवश्यकता हो और न हीं किसी दूसरी भाषा को जानने की ज़रुरत।

 

दूसरी बात भाषा भ्रष्ट होने की। नए शब्द जोड़ने से भाषा बलवान होती है, भ्रष्ट नहीं। शुद्धता सिर्फ़ शुद्धता की वजह से नही होनी चाहिए। प्राय: सारी शुद्ध वस्तुएं इतनी उपयोगी नहीं होती है जितनी कि मिलावट के बाद। 100% शुद्ध लोहा किसी काम का नहीं होता है। उसमें मिलावट कर के स्टील बनाया जाता है। 100% खरे सोने से भी आभूषण नहीं बनाए जा सकते हैं जब तक कि मिलावट न हो।

राहुल उपाध्याय

20641 NE 30TH Court,

Sammamish, WA 98074

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अपनी बात कविता