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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। संस्कार ।।

 

 

आलोचक की भूमिका


अशोक वाजपेयी

 

मरीकी आलोचक और कथाकार सूसन सौंटैग ने हाल ही मे येरुशलम पुरस्कार ग्रहण करते हुए जो वक्तव्य दिया उसमें रोलाँ बाख्त की एक उक्ति का उद्धरण दिया है : ‘जो बोलता है वह वह नहीं है जो लिखता है और जो लिखता है वह नहीं है जो कि वह है। यह वर्णन यों तो शायद सभी तरह के लेखकों के लिए सही हो सकता है लेकिन कम से कम हिंदी आलोचकों पर वह बिलकुल सही बैठता है :  हम जो बोलते हैं, वह लिखते नहीं हैं और हम जो लिखते हैं उसके पीछे असली हम नहीं हैं। इस बहस को फिलवक्त छेड़ना जरूरी नहीं है कि वह हमारा अनिवार्य अंतर्विरोध है या निरा पाखंड। जिस समय में इतनी सारी रचना अंतर्वितोधग्रस्त हो उसमें आलोचक  हो उसमें आलोचक के स्वभाव में भी वह अंतर्विरोध घर कर जाए इसमें कुछ अजब नहीं है। जब रचनाकार खुलेआम अपना पाखंड परोस रहे हैं और वह आलोचक  में भी पसरा दिखे तो इसमें अचरज क्या ? आलोचना न तो अरण्यरोदन है और न ही एकांत-चिंतनः वह साहित्य के शोरोगुल, चौक-कीचड़ में सना हो तो आलोचक के पाकसाफ या विमल-निर्मल होने की उम्मीद करने का शायद कोई ठोस आधार नहीं है। आलोचक का, जैसे कि लेखक का भी, बुनियादी काम राय देना नहीं, सच कहना है-बिना लाग-लपेट के और अकेले कंठ की पुकार बन जाने का जोख़िम उठाते हुए । यह सच, हो सकता है, अंतर्विरोधग्रस्त हो, बल्कि हमारे समय में उसके सीधे-सपाट और सुडौल होने की गुंजाइश कम ही है। आलोचक अपना सच कहता है और ऐसा करते हुए साथ-साथ रहा है, जो उसे अपनी हड्डियों में ठंड की तरह या कि रक्त में गहमाहट की तरह महसूस हो रहा है। वह सच है भी या नहीं ? जो अपने सच पर पहले संदेह करता है उसी को यह हक है कि दूसरों के सच पर जरूरी लगे तो उँगली उठाए। जो अपने को वेध्य नहीं बनाते, वे दूसरों को वेध्य बनाकर अनैतिक कर्म करते हैं। आलोचना की बुनियादी नैतिकता अर्जित ही इस बात से होती है कि वह जितना रचना को प्रश्नांकित करती है उतना ही अपने को : वह ऊपर किसी रामझरोखे या किसी अलग-थलग और ऊँचे बने मंच रचना को देखना नहीं है बल्कि सड़क-चौंतरे पर रचना के साथ चलना, बैठना और फिर उसे ठिठककर देखना है। आलोचना ऐसी आँख है जो दृश्य को देखती है और अपने इस तरह देखने को भी। अपने गरेबाँ में नज़र डाले बिना सिर्फ दूसरों को देखना कम देखना है। आलोचक की भूमिका स्वयं देखनने और दूसरों को दिखाने की है।

 

देखने की यह प्रक्रिया हमेशा ही जटिल है। एक तो यह रचे हुए को देखना है जिसमें अनेक जीवनानुभव, अपने आशयों, तनावों, अंतर्विरोधों के साथ विन्यस्त हैं। दूसरे यह देखना ब्यौंरों में, विशिष्टता में देखना हैः रेशे-रेशे, रग-रग देखना है, बिना उनसे गढ़े गए अवयवों को अनदेखा किए । तीसरे, इस देखने में, सचाई में सचाई की सारी सघनता, बहुलता आदि के बीच किसी भी रचना या रचनाकार की अलग विशिष्टता की पहचान और स्वीकार भी शामिल है। हमारा समय और सचाई निश्चय ही बहुवचन हैं लेकिन उसमें कोई भी रचना या रचनाकार, अगर वह ध्यान देने योग्य है याने उस पर आलोचना की आँख एकाग्र हो इस काबिल है, तो उसके एकवचन को देखना जरूरी है। फिर आलोचक की भूमिका इस सारे को देखकर दूसरों को इस तरह दिखाने की है कि उनमें स्वयं रचना या रचनाकार को देखने की प्रबल-उत्कट इच्छा जाग सके। इस उम्मीद के साथ कि जितना आलोचक ने दिखाया है उससे कहीं अधिक देखे जाने की सम्भावना है। जो देखकर दिखा नहीं सकता वह आलोचक नहीं हो सकता।

 

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आलोचक अपने समय और समाज में साहित्य की जगह और समझ बनाने और बढा़ने की कोशिश करता है। यह इतना सीधा-सादा या आसान काम नहीं है जितना कि ऊपर से लगता है। यों तो साहित्य उन माध्यमों में से एक है एक है जिनके द्वारा समाज अपने समाज होने को पहचानता है पर अक्सर, और हिंदी के मामले में तो खासकर, समाज को इसकी याद नहीं रहती । हिंदी समाज में अगर शैक्षणिक व्यवस्था में साहित्य की ज़रूरत न हो तो कई बार लगता है कि साहित्य की कोई सामाजिक उपयोगिता या औचित्य है ही नहीं। साहित्य के बिना समाज का काम बखूबी चल सकता है ऐसी धारणा बनने लगती है। साहित्य के क्षेत्रों में जो परिवर्तन, नई ऊर्जा, मानव-संबंधों की नई समझ, भाषा और शिल्प के भूगोल का विस्तार आदि होते हैं उन्हें समाज उचित परिप्रेक्ष्य में समझे-स्वीकारे इसके लिए हालाँकि ऐसे साहित्य का सीधा साक्षात्कार सबसे सही रास्ता है, वह काफी नहीं होता। इस समझ और स्वीकार को संभव और व्यापक बनाने में आलोचक सहायक हो सकता है। हिंदी समाज में मौजूद इस विडम्बना को हम अनदेखा नहीं कर सकते कि उसमें सर्जनात्मक साहित्य के पाठक-रसिक ही इतने कम हैं कि आलोचना से प्रतिकृत होनेवाले व्यक्तियों की संख्या लज्जाजनक रूप से लगभग नगण्य है। फिर भी, साहित्य की स्वीकृति और मान्यता के जो भी मंच, प्रक्रियाएँ, संस्थागत उपाय आदि हैं उनमे आलोचक की भूमिका उतनी नगण्य नहीं है जितनी कि आनुपातिक दृष्टि से होना चाहिए। व्यापक पाठक-समुदाय का अभाव प्रायः आलोचक की हैसियत और भूमिका को अतिरंजित कर देता है यह हमेशा याद रखना चाहिए। यह अकारण नहीं है कि जिन लेखकों के पास ठोस और बड़ा पाठक-समुदाय होता है वे आलोचकों की खास परवाह नहीं करते। जिन लेखकों के पाठक बहुत कम होते हैं वही आलोचना से बहुत प्रभावित-विचलित-आहत होते रहते हैं। आलोचक अपनी भूमिका तभी निभा सकता है जब वह अच्छा, विश्वसनीय, प्रामाणिक, सजग-चौकन्ना पाठक भी हो । जो रचना का आस्वाद न ले सके और जिसकी आलोचना की काया में उसकी रसिकता न झलकती हो वह आलोचक किसी मसरफ़ का नहीं हो सकता । हम उसे पढ़ें-गुनें इसके पहले हमारा यह आश्वस्त होना पहली शर्त है कि आलोचक ने पढ़ा-गुना है। पढ़कर ही गुना जा सकता-ब्यौरों में पढ़कर।

 

आलोचक ध्यान और जतन से, समझ और कल्पनाशीलता से पढ़ता है जिसके लिए उसके पास पुस्तक-पकी आँखें होती हैं। कोई भी आलोचक बिना व्यक्तित्व, बिनारुचि और बिना दृष्टि के कुछ खास नहीं कर सकता । यह बात सिर्फ आलोचक पर नहीं, लेखक पर भी लागू होती है। यही तो मुश्किल है कि आलोचक के कई गुण वही होते हैं जो लेखकों के, लेकिन लेखक के पूर्वग्रह उतने आपत्तिजनक नहीं माने जाते जितने आलोचक के । लेखक को अपने सारे पूर्वग्रहों के साथ रचने की जितनी छूट है उतनी अपने पूर्वग्रहों के साथ लिखने की आलोचक को अक्सर नहीं मिलती।

 

लेखक के मुकाबले आलोचक की हर साक्षात्कार दुहरा साक्षात्कार होता है। वह साहित्य का सामना करता है, इसमें रसे-बसे जीवन का और सीधे जीवन का भी। वह आलोचक बेकार है जिसके लिए साहित्यानभव जीवनानुभव-जैसा उत्कट, ऐंद्रिय और सच न हो। आलोचक के लिए साहित्य लगभग प्राथमिक सचाई होता है। लेकिन सच्चे आलोचक में साहित्य, किसी अबूझ कलावादी करतब से, जीवन का स्थानापन्न नहीं बन जाता । यह साहित्य को उसकी समूची स्वायत्तता में, उसे पूरा सम्मान देने हुए भी, जीवन की आँच और रोशनी में देखता-समझता है। अगर अक्सर आलोचकों के कंधे और सिर थोड़ा झुके हुए होते हैं तो जरूरी नहीं कि विनय के कारण : ज़्यादा ठोस कारण साहित्य और जीवन का दुहरा भार हो सकता है !

 

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इस पर लंबी बहसें चली हैं कि साहित्य सचाई प्रतिबिंबित करता है या बदलता भी है, वह सचाई में हिस्सेदार है या दी हुई सचाई के बरक्स दूसरी सचाई गढ़ता है। जो भी हो, इतने पर मतैक्य-सा हो गया लगता है कि साहित्य सचाई का इजाफ़ा है। साहित्य को पढ़ने और समझने की जो रूढ़ विधियाँ हैं उनसे चलते यह बात आसानी से मानी नहीं जाती। आलोचक की एक भूमिका यह है कि वह इस बात को व्यापक रूप से फैलए और तर्को और तथ्यों से उसे पुष्ट-सिद्ध करे। हमारा समय भले निरंतर जटिलतर होता समय है, इस उससे निपटने या कि उसे सहने के लिए सरलीकरणों का सहारा लेते रहते हैं। सरलीकरण जटिलता से बचने, उससे भागने का उपाय है। साहित्य ऐसे सरलीकरण का प्रतिरोध करता है। आलोचक का एक ज़रूरी काम इस प्रतिरोध में सहचारी होना है अर्थात् आलोचक सचाई के सरलीकरण का और स्वयं रचना के सरलीकरण का विरोध करता है और यह विश्वास दिलाने में सफल होता है कि साहित्य की, और उससे प्रगट सचाई की, जटिलता सार्थक और अनिवार्य है। मनुष्यता, उसके सुख-दुख, उसके तनावों और अंतर्विरोधों, संघर्षों और उत्सुकताओं को सरलीकरणों से नहीं, जटिलता से ही समझा और सहेजा जा सकता है।

अशोक बाजपेयी

 नई दिल्ली

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