|
है यहाँ भी जल
देवी नागरानी
विजय
सिंह
नाहटा,
जयपुर
के
निवासी
हैं
और
बहुत
ही
सधे
हुए
कवि
है
।
कई
समवेत
काव्य
संग्रहों
में
उनकी
रचनायें
संकलित
है।
प्रसार
भारती
एवम्
दूरदर्शन
से
निरंतर
रचनाओं
का
प्रसारण
भी
होता
रहता
है।
"है
यहाँ
भी
जल"
उनका
पहला
कविता
संग्रह
है।
विजय
सिंह
नाहटा
जी
का
प्रथम
कविता
संग्रह
मेरे
हाथ
जब
आया
तो
कुछ
पल
के
लिये
मैं
उस
किताब
को
हाथों
में
लिए
सोचती
रही,
जाने
क्या?
पर
कुछ
ऐसा
उस
कवर
पेज
के
चित्र
में
संबोधित
था,
जिसे
मेरी
आँखें
देख
तो
पा
रही
थी,
पर
पढ़
नहीं
पा
रही
थी।
स्याह
स्याह
श्यामल
रंग,
उस
पर
अंकित
दो
आँखें,
ऐसा
कहीं
लगता
भी
था,
कहीं
भ्रम
होने
का
इशारा
भी
मिलता
था,
अन्तर
मन
के
अदृश्य
कुछ
अनदेखे
दृश्य
खुली
आँखों
के
सामने
न
जाने
किन
तहों
को
बे-परदा
करते
रहे।
और
जैसे
ही
मेरे
भ्रम
की
पहली
तह
खुली
-
समानी
अदृश्यता
के
इशारे,
कुछ
गहराइयों
से
झाँकती
सच्चाइयों
की
झलकी
सामने
उस
पन्ने
पर
नज़र
आई
जो
मेरे
सामने
खुला-
"
आत्मा-सा
मंडराता
हुआ"
'शब्द
जो
दिखता
प्रकट
शब्द
का
आवरण
होता
सशरीर,
स्थूल
उसके
भीतर
गहरे
होता
एक
शब्द
चेतना
की
तरह
पसरा
हुआ-
अदृश्य,
निराकार!!
शब्द
जो
दिखता
है
होती
झिलमिलाहट
भीतर
के
शब्द
की
शब्द
जो
प्रकट
ज्योति
की
तरह
उजास
है
उस
शब्द
की
नहीं
आया
जो
कविता
में
आत्मा-सा
मंडराता
हुआ,
हे
बार
!"
पृष्ठ-30
पल
दो
पल
के
लिए
ख़ामोशी
ने
मेरी
सोच
के
लब
सी
दिए,
निशब्द!
ऐसा
कभी-कभार
होता
है,
जब
कोई
साहित्य
सिर्फ़
शब्द
न
होकर
कुछ
और
होता
है,
जो
अपने
अंदर
के
सच
के
सामने
अक्स
बन
कर
खडा
हो
जाता
है।
ऐसी
ही
शिद्दत,
सुन्दरता,
संकल्प
विजय
जी
की
इस
रचना
में
पाई
इन
अल्फाज़ों
से
झाँकती
हुई।
अंतर्मन
के
सच
का
साक्षात्कार,
सच
के
शब्दों
में
लिखा
हुआ
यह
एक
प्रयास
ही
नहीं,
एक
सफल
दृष्टिकोण
भी
है
जो
इंसान
को
इस
सच
के
आगाज़
के
दायरे
में
लाकर
खड़ा
करता
है।
जीवन-पथ
पर
लक्ष्य
के
इर्द-गिर्द
यह
दृष्टिकोण
नक्षत्र-सा
मंडराता
हुआ
नज़र
आता
है।
एक
ध्वनि
गूंजित
होती
सुनायी
पड़
रही
है
जैसे
उनके
अपने
शब्दों
में
- "
आत्मा
से
बाहर
निकल
कर
ख़ुद
को
सज्जाता
हूँ"
शब्द
स्वरूप
मोती
मन
को
मोह
के
दाइरे
में
ला
कर
खड़ा
कर
देते
हैं।
गौतम
बुद्ध
की
जीवन
गति
भी
बेताश
होकर
उस
सच
को
तलाशती
हुई
गाया
पहुँची
और
उन्हें
मोक्ष
का
साक्षात्कार
हुआ।
सेल्फ
रीअलाइज़ेशन
मकसद
है,
बाकी
सब
पड़ाव
है
उस
अदृश्य
निराकार
दृश्य
के।
विजय
जी
की
कलम
से
सच
की
धारा
बन
कर
बहत
चला
जा
रहा
है।
उनकी
सोच
प्रगतिशील
है
और
एक
मार्गदर्शक
भी।
वो
शब्दों
का
सहारा
लेकर
उस
शब्द
की
ओर
इशारा
कर
रहे
हैं
जो
इस
रचना
का
आधार
|