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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19,दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।।नेपालकीचिट्ठी।।

 

 

अपना आलाप


कुमुद अधिकारी

 

ता नहीं कब हिंदी जीवन में रच बस गई, पर अब लगता है की हिंदी के बिना जीवन अधूरा सा है। बगैर हिंदी के जीना दुशवार लगता है। मैं जहाँ रहता हूँ और जिस माहौल में काम करता हूँ वहाँ हिंदी न के बराबर है। वैसे ज्यादातर शहरी नेपाली हिंदी थोड़ा-बहुत समझ लेते हैं। पहले हिंदी फिल्मों का प्रभाव था पर अब सैटेलाइट चैनल्स का जादू है। हर कोई पढ़ा-लिखा आदमी समझता है कि उसे हिंदी आती है। पर यह आना सिर्फ कसौटी ज़िंदगी की के संवाद समझने जितना ही है। मेरे ही सहकर्मी जो हिंदी समझने की डींग हाकते है, वही एक पत्रिका आराम से पढ़ नहीं पाते। साहित्य की बात तो दूर। अपने यहाँ हिंदी की पुस्तक-पत्रिकाए नहीं मिलतीं और हिंदी साहित्य का जरिया सिर्फ इन्टरनेट रह गया है। हा काठमांडू में थोडी बहुत पुस्तकें मिलती हैं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.ए. तक पढाई भी होती है, शोधकार्य भी होते हैं। पर अभी तक मैंने कोई साहित्य-गोष्ठी या ऐसा कुछ हिंदी में होते नहीं सुना। मीडिया में जब आएगा तभी जान पाऊगा। वैसे भी मैं नेपाल के पूर्वी भाग इटहरी में रहता हूँ। यह भी हो सकता है की कोई कार्यक्रम हुआ हो और मुझे पता नहीं चला हो। हमारे यहाँ जो राजधानी में होता है, बाकी देशवालों को खबर देना तक मुनासिब नहीं समझते राजधानीवासी। वे समझते हैं सम्पूर्ण नेपाल सिर्फ काठमांडू है, और जो काठमांडू करेगा सही करेगा। काठमांडू में रहकर घिसापिटा लिखने से भी कोई साहित्यकार हो जाता है, और कोई बाहर रहकर जितना भी कलम घिसाए वह दूसरे दर्जे का रह जाता है। यह सब मुझे कहना तो नहीं चाहिए था पर हकीकत जो है, वह छुपाए नहीं छुपती।

 

जब दशवीं में दार्जीलिंग में पढ़ता था तब हिंदी की औपचारिक पढाई हुई थी। तब तक पत्रिकाए और पुस्तकें ही हिंदी सीखने की जरिया थीं। पर दशवीं में भी हिंदी का छठवीं का कोर्स रख दिया गया था। शायद सोचा होगा कि नेपाली लोग हिंदी क्या पढ़ेंगे। बढा अजीब लगता था दशवीं में पढ़ते हुए, छठवीं का हिंदी किताब बस्ते में ढोना। पर हिंदी से प्रेम तो था ही, फिर शिक्षक ऐसे निकले की कभी हिंदी की ओर से मुह नहीं मोड़ना पढा। हर सवाल का जबाव था उनके पास। मेरी कई जिज्ञासा उन्होंने ही शान्त की थीं। वे जब माखनलाल चतुर्वेदी की कविता 'पुष्प की अभिलाषा' पढ़ा रहे थे तो मेरी आँखों से आँसू लुढ़क गए थे। मुझे रोते देख बोले थे- 'बेटा ! सही मायने में तुमने कविता के मर्म को समझा है।' मैं उनके मुह से निकली वह कविता कभी नहीं भूल पाऊँगा-

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गुंथा जाऊ

चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊ

 

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊ

चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं

 

मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जाएं वीर अनेक।

 

मेरे अन्तस्थल में हिंदी साहित्य के प्रति जो श्रद्धा श्री दास सर ने जगाए हैं, उसके लिए मैं आजन्म उनका ऋण रहूँगा।

 

दसवीं के बाद लगभग बाईस वरषों तक हिंदी साहित्य की पढ़ाई सतही तौर पर ही हुई है। काम के सिलसिले में दशियों जगह घूमा हूँ। करीब ग्यारह बरस हुए इटहरी में एक स्कूल में मास्टरी करता हूँ। वैसे विज्ञान का शिक्षक हूँ पर साहित्य के प्रति गहरा लगाव ईस अधेड़ उम्र में स ओर खींच लाया है।

 

सन् 2001 में बारह लोग मिलकर एक साहित्यिक संस्था का आरम्भ किया जिसे नाम दिया गया- साहित्यसञ्चार समूह।(अब यह बदलकर साहित्यसञ्चार प्रतिष्ठान हो चुका है)। फिर एक साहित्यिक पत्रिका शुरु की नेपाली में- साहित्यिक कोशेढुङ्गा समें महत्त्वपूर्ण बात यह है की सके हर अंक में अनुवाद साहित्य का एक अलग खंड है। नेपाल के अधिकांश पत्रिकाएं अनुवाद साहित्य को स्थान नहीं देती हैं। देती भी हैं तो अनुवाद प्रायश अँग्रेज़ी से ही होता है। हमारा प्रयास रहा कि ईसमें हिंदी और बङ्गाली साहित्य का अनुवाद अवश्य होना चाहिए। हम जितने हिंदी और बङ्गाली के नजदीक हैं, उतने अँग्रेज़ी के कभी नहीं हो सकते। जब प्रेमचन्द का लिखा हर शब्द चाइनज और रसियन में अनूदित हो चुका है तो नेपाली में क्यों नहीं हो सकता ?

 

फिर 2003 में जब कम्प्युटर लिया, तब इन्टरनेट पर पत्रिका प्रकाशित करने का मन हुआ और शुरूवात हुई साहित्यसरिता की। शुरुवाती दिनों में तकनीकी तौर पर काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बहुत महीने तक मैं अकेले फौंट को लेकर जूझता रहा हूँ। फिर कहीं से गोहिंदी डॉट कॉम के श्री प्रबुद्ध कालिया से ईमेल में मुलाकात हुई तो उन्होंने युनिकोड के प्रयोग की बात बताकर चुटकी में समस्या का हल कर दिया। मैं उनका यह सहयोग कभी भूला नहीं पाऊगा।

 

फिर तो अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज से नाता जुड़ा। सुश्री पूर्णिमा बर्मन और श्री सुमनकुमार घई जी ने हौसले बुलंद किए और शुरू हुआ नेपाली से हिंदी और हिंदी से नेपाली में अनुवादों का सिलसिला। साहित्य में ऐसे डुबने लगा जैसे शराबी शराब के नशे में मतवाला होता है। इन्हीं कुछ सालों में दो अनूदित कहानी संग्रह प्रकाशित किए- 'ज़िंदगी एक फोटो फ्रेम' और 'पासपोर्टका रङहरू'।

 

ज़िंदगी एक फोटो फ्रेम में आठ कथाकारों की सोलह कहानिया हैं जो सभी अभिव्यक्ति से लिए गए हैं। जबकि पासपोर्टका रङहरू श्री तेजेन्द्र शर्मा की बारह कहानियों का नेपाली अनुवाद है। श्री तेजेन्द्र शर्मा की प्रेरणा ने हमें और ऊर्जा प्रदान की।

 

अनुवाद के साथ साथ सृजनात्मक लेखन का आरम्भ किया। कहानिया लिखने लगा। अब तक दो कहानिया (मुक्ति, और कहानी जो मैं लिख नहीं पाई) साहित्यकुंज में प्रकाशित हो चुकी हैं और नेपाली में कहानियों का भण्डार बड़ा हो रहा है।

 

जब नेपाली में साहित्यसरिता शुरू किया था सन् 2004 पहले तो इन्टरनेट पर साहित्यिक पत्रिकाएं थोडी सी ही थीं। पहले साहित्यसरिता त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होती थी। इसी अप्रैल-मई से ईसे मासिक रूप दे दिया गया है। मैंने यह भूमिका ईसलिए बताई की हिंदी साहित्यसरिता जो अब अलग जाल पत्रिका है, जून 2007 से शुरू की गई है। ईसके पहले नेपाली साहित्यसरिता में ही हिंदी विभाग नामका एक अलग खंड हुआ करता था, जिस पर हर तीन महीने में एक कविता और एक कहानी प्रकाशित की जाती थी। नेपाली साहित्यसरिता मासिक हुई है साथ ही हिंदी साहित्य सरिता भी। यह हमारा अकेला प्रयास है, नेपाली साहित्य को हिंदी भाषी पाठकों के बीच पहुचाने का।

 

आप सबका प्रेम और अपनापन साहित्य-सेवा में लगे रहने की प्रेरणा देता है। श्री जयप्रकाश मानस, श्री शैलेश भारतवासी, श्री मनमोहन सरल, श्री सुभाष नीरव और बहुत से साहित्यकार मेरे साथ हैं तो मुझे विश्वास है, अपनी नैया भी उन्हीं के साथ पार लग जाएगी। अब तो मेरे हमसफर बहुत हैं। मुझे पूरा विश्वास है की मेरे ये सहयात्री मुझे किसी भी हालत में पीछे नहीं छोडेंगे। श्रद्धेय श्री जयप्रकाश मानस ने मेरी जो हौसला-अफ़जाई की है, उसे सिर्फ धन्यवाद देकर टाला नहीं जा सकता। मेरा यह स्तम्भ सृजनगाथा में नियमित रूप से आएगा। अगली मुलाकात तक के लिए....इति शुभम्।

 

  कुमुद अधिकारी

इटहरी, सुनसरी

नेपाल

kumudadhikari@gmail.com

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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