vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। मूल्याँकन ।।

 

 

नारी भरी दुःख की बदली ही नहीं चिंतन का सागर भी


डॉ. उर्मिला शुक्ल

 

हादेवी वर्मा का समग्र साहित्यिक अवदान नारी चिंतन ही है। यह अलग बात है कि काव्य में उनका सारा आक्रोश करुणा के आवरण में लिपटकर सामने आता है, किन्तु गद्य साहित्य में उनका स्त्री विषयक चिंतन ही मुखर है। यहाँ भी चिंता है, आक्रोश है, दुःख है किन्तु वह इतना करुणा विगलित नहीं है कि याचक बनें।

 

आज हिन्दी साहित्य में जिस स्त्री विमर्श की धूम है उसके बीज सीमांतनी उपदेश में देखे जा सकते हैं। यही बीज आगे चलकर महादेवीजी के गद्य में पल्लवित वृक्ष बनकर लहराता है। पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ़ महादेवी की आवाज़ सशक्त होकर उभरती है। यहाँ उन्होंने नारेबाजी का सहारा नहीं लिया है, वरन ज्वलंत मुद्दों को उनको पूरे परिवेश के साथ उठाया है।

 

समाज में स्त्री की स्थिति हमेशा दोयम दर्जे की रही है। उस पर विधवा की स्थिति वह भी आज से पचास-साठ साल पहले ! महादेवीजी किशोरी विधवा का कारुणिक शब्द-चित्र प्रस्तुत करती हैं :-

 

वह घर जिसमें एक भी झरोखा न था। न रोशनदान, न एक भी नौकर दिखाई देता, न अतिथि और न एक भी पशु था न पक्षी,.......उस समाधि जैसे घर में लोहे के प्राचीर से घिरे फूल के समान किशोरी बालिका बिना किसी संगी-साथी, बिना किसी प्रकार के आमोद-प्रमोद के मानों निरंतर वृद्धा होने की साधना में लीन थी।1

 

समाज में विधवा की स्थिति को बेनकाब करता यह शब्द-चित्र उन तमाम नारों की असलियत बयान करता है जो समाज युगों-युगों से अपने बचाव में उछालता रहा है।

 

स्त्रियों के विषय में ढेरों किवंदतियां प्रचलित हैं पुरुष समाज उनका सहारा लेकर कभी स्त्री को कमतर साबित करता है तो कभी देवीत्व के ऊँचे आसन पर बिठा देता है। यानी समकक्ष धरातल उसे कभी नहीं मिलता। और जहाँ वह इसमें कामयाब नहीं होता, तो समाज से बहिष्कृत करवाना ही उसका लक्ष्य रह जाता है ऐसे में वह तरह-तरह के हथियार गढ़ता है।

 

महादेवीजी लिखती हैं-पग-पग पर पुरुष से याचना न करने वाली स्त्री की स्थिति कुछ विचित्र-सी है। वह जितनी पहुँच से बाहर होती है, पुरूष उतना ही झुँझलाता है और प्रायः यह झुँझालाहट मिथ्या अभियोगों के रूप में परिवर्तित हो जाती है। 2

 

स्त्री-विमर्श की झंडाबरदार जिस कोख के अधिकार को नारे के रूप में उछालती है, महादेवी जी उसे स्त्री शक्ति का आधार स्तंभ बना देती हैं- कोई पुरूष यदि उसको अपनी पत्नी नहीं स्वीकारता तो केवल इसी मिथ्या आधार पर वह अपने जीवन के इस सत्य को, अपने बालक को अस्वीकार कर देगी। संसार में चाहे इसको परिचयात्मक विशेषण न मिला हो, परन्तु अपने बालक के निकट तो यह गरिमामय जननी की संज्ञा पाती रहेगी। 3

 

महादेवीजी मातृत्व की शक्ति को स्त्री की सर्वोच्च शक्ति मानती हैं। वे कहती हैं-  “यदि यह स्त्रियाँ अपने शिशु को गोद में लेकर साहस से कह सकें- बर्बरों तुमने हमारा नारीत्व, हमारा पत्नीत्व सब ले लिया पर हम अपना मातृत्व किसी प्रकार न देंगी, तो इनकी सारी समस्यायें ही सुलझ जायें। 4

 

महादेवीजी नारी मुक्ति की प्रबल पक्षधर हैं वे केवल बात ही नहीं करतीं उसे अकाट्य तार्किक भी बनाती हैं।

 

महादेवीजी स्त्रियों की दयनीय दशा के लिए उस विचार को कारण मानती हैं जिसे पुरुष सत्ता द्वारा पीढ़ियों से उनके भीतर पैठाया गया है। वे लिखती हैं कि  “स्त्रियों की आज की दशा को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि कभी वे समाज का सार्थक अंग भी होंगी। 5

 

वे मानती हैं कि स्त्रियों की दशा में तब तक परिवर्तन नहीं हो सकता जब तक वे स्वयं प्रयत्न नहीं करेंगी और इसके लिए उनकी विचारधारा में परिवर्तन आवश्यक है- “जब तक स्त्रियों की विचारधारा में परिवर्तन न हो जावे, वे अपनी समस्याओं की ओर ध्यान न देंगी और अपने कष्टों को त्याग का रूप समझती रहेंगी।  6

 

श्रृंखला की कड़ियाँ में स्त्रि की सामाजिक समस्याओं के बहाने समाज में होने वाले परिवर्तन को भी रेखांकित किया गया है। समाज में स्त्रियों की स्थिति वस्तु की तरह है। मैत्रेयी के संदर्भ में लिखती हैं-गृह की वस्तु मात्र समझी जानेवाली स्त्री ने जब कभी जीवन को गम्भीरतम् दृष्टि से देखने का प्रयास किया उसे क्या मिला ? वन प्रस्थान के समय याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं धन से तुम सुखी हो सकोगी अमर नहीं 7

 

यानी स्त्री धन की कामना भी न करे और पुरूष धन के सहारे उस पर स्वामित्व स्थापित करता रहे। महादेवीजी का मानना है कि भारतीय समाज में मैत्रेयी, द्रोपदी और सीता जैसी स्त्रियाँ हैं जो पुरूष सत्ता को चुनौती देकर उसके समकक्ष खड़ी होती हैं। मगर समाज व्यवस्था उन्हें क्या देती है वनवास, निर्वासन असमान्य जीवन, की लांछना (द्रोपदी) समाज उनके शक्तिशाली स्वरूप को स्वीकारता ही नहीं है इसीलिए तरह-तरह की प्रवंचनायें गढ़ता है। मैत्रेयी के तर्क पुरूष सत्ता के लिए चुनौती है इसीलिए उसे निर्वासन मिलता है। राम के बिना ही रावण का दृढ़ता से सामना करने वाली सीता को अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ा और बाद में इसी पुरूषवादी सोच के तरह निर्वासन का दंड भी मिला । पितृसत्ता यह स्वीकार करने को तैयार ही नहीं कि बिना पुरूष के स्त्री का कोई वजूद भी है। इसीलिए स्त्री के जीवन के सामाजिक ढांचे के अनुकूल ढाला जाता है।

 

महादेवीजी यह मानती हैं कि आर्थिक पराधीनता स्त्री को गुलाम बने रहने के लिए मजबूर करती आयी है।स्त्री,पुत्री,माता आदि सभी रूपों में आर्थक दृष्टि से परमुखापेक्षणी है। आर्थिक दृष्टि से स्त्री की जो स्थिति प्राचीन काल में थी उसमें आज तक विशेष परिवर्तन नहीं आया है यह विचित्र सत्य है। 8

 

वे मानती हैं कि यह व्यवस्था जानबूझकर की गई है और यह व्यवस्था सम्पन्न से लेकर विपन्न स्त्रियों तक समान रूप से व्याप्त है वे कहती हैं-समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी से लेकर सम्पन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय कहे जाने योग्य है। 9

 

वेश्या जीवन की विडम्बना पर वे गहरी चिन्ता व्यक्त करती हैं, वे मानती हैं कि समाज अपनी व्यवस्था के तहत वेश्यावृत्ति को बनाये रखना चाहता है साथ ही उन्हें समाज हेय भी मानता है। इन्हें जानना चाहिए कि जिसने ऊँचे स्वर्ग की सृष्टि की है उसी ने नीचे पाताल की भी रचना की है। यदि पाताल के सब जीव जन्तु स्वर्ग की ओर दौड़ पड़े तो सृष्टि एक दिन भी न चले। अपनी इच्छानुसार ही जीवन को बदलकर यह समाज में जो अव्यवस्था उत्पन्न कर रही है उसे रोकने के लिए दंड देना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है। 10

 

यह कथन उस स्त्री के लिए है, जिसका अपराध यही है कि वह वेश्या माँ की पुत्री है। वह समाज द्वारा स्वीकृत स्त्री से अधिक सतीत्व निभाती है, किन्तु समाज उसे वेश्या ही समझता है, वेश्या जीवन की विडम्बना को रेखांकित किया है-क्रीत दासी न होने पर भी उसकी दासता इतनी परिपूर्ण रही कि वह अपने जीवन का गर्हित व्यवसाय करने के लिए विवश थी। उसे अपने घर के द्वार समाज के कुत्सित-से-कुत्सित व्यक्ति के लिए भी खुले रखने पड़े और भागने का प्रयत्न करने पर उसके सभी मार्ग अवरूद्ध कर दिये। 11

 

आज तक इतिहासकारों ने भी वेश्या जीवन के दर्द की अनदेखी ही की है । वे उनसे प्रश्न करती हैं। -

 

क्या यह उन स्त्रियों की सजातीय बहिने नहीं हैं जिनकी दुग्ध-धारा में मानव जाति पल रही है, क्या यह उन्ही की बहिनें नहीं हैं जिन्होंने पुरूष को पति पद देकर अकुंठित भाव से परमेश्वर के आसन पर आसीन कर दिया और क्या यह उन्हीं की पुत्रियाँ नहीं हैं जिनके प्रेम, त्याग और साधना ने झोपड़ी में स्वर्ग और मिट्टी के पुतलों में अमरता उतार ली हैं। 12

 

वे इस तथ्य को भी नकारती हैं कि कोई स्त्री इस पेशे को स्वेच्छा से स्वीकारती होंगी । सौ में से कोई एक अगर यह मानती भी होगी तो उसके जीवन की कोई विडंबना उससे ज़रूर जुड़ी होगी जिसके तहत वह इस पेशे को अपना जीवन मानने पर मज़बूर है।

 

इस प्रकार महादेवी जी अपने गद्य साहित्य में स्त्री के सामाजिक इतिहास लेखन के स्त्रोत भी उपलब्ध कराती हैं। यह अलग बात है कि आज के स्त्री विमर्श में महादेवी जी का यह लेखन शामिल क्यों नहीं किया जा रहा है? यह सवाल उठाया जाना चाहिए और इसे स्त्री विमर्श में शामिल किया जाना चाहिए। निराला की तरह महादेवी जी का गद्य साहित्य भी अपने समय से आगे की बात कहता है। श्रृंखला की कडियाँ में महादेवीजी स्त्री पराधीनता के कारणों को न केवल  तलाशती हैं वरन समाधान भी देती हैं और ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधार बनाकर स्त्री स्वातंत्र्य की हिमायत करती हैं। यहाँ वे स्पष्ट करती हैं कि वे पश्चिम से उधार लिए गये नारी स्वातंत्र्य की हिमायती नहीं हैं वरन वह चाहती हैं कि भारतीय समाज में, समाज की आवश्यकता और स्त्री की गरिमा के अनुरूप व्यवस्था होनी चाहिए जिससे स्त्री की आर्थिक पराधीनता की बेड़ियाँ टूटें। वे स्त्री के पुरूष बन जाने का भी विरोध करती हैं। वे मानती हैं कि पुरूषों के गुण अपनाकर स्त्रियाँ अपने स्वाभाविक गुणों को खो देंगी। वे लिखती हैं- पुरूष के अंधानुसरणने स्त्री के व्यक्तित्व को अपना दर्पण बनाकर उसकी उपयोगिता को सीमित कर दिया । 13

 

वे मानती हैं कि समाज किसी एक से नहीं चल सकता । एक सजग और सुसंस्कृत समाज के लिए स्त्री और पुरूष की स्वभावगत भिन्नता में सामंजस्य आवश्यक है। वे लिखती हैं- स्त्री पुरूष के प्राकृतिक मानसिक वैपरीत्य द्वारा ही हमारा समाज सामंजस्यपूर्ण और अखंड हो सकता है। उसके बिंब प्रतिबिंब भाव से नहीं। 14

 

हिन्दी साहित्य में स्त्री लेखन को अलगाया गया है। महिला लेखन यानी दोयम दर्जे का लेखन इस संदर्भ में महादेवी जी लिखती हैं-साहित्य की सृष्टि के लिए स्त्री और पुरूष भेद की आवश्यकता नहीं है और कतिपय विद्वानों का यह मत कि स्त्रियाँ श्रेष्ठ कलाकार नहीं हो सकती, निरर्थक ही नहीं अनुचित भी है। 15

 

इस प्रकार महादेवी वर्मा का नारी विषयक चिंतन सटीक है । उनका यह चिंतन पाश्चात्य देशों द्वारा प्रदत्त नारी स्वातंत्र्य और तथा कथित स्त्री-विमर्श से बहुत आगे जाकर भारतीय समाज को विखंडन से बचाने की पुरजोर कोशिश है । उनके चिंतन में आज के स्त्री-विमर्श की तरह देह मुक्ति की बात नहीं है बल्कि पुरूष की सत्ता को चुनौती है जिससे स्त्री को मात्र देह में परिवर्तित कर दिया है ।यह चिंतन अधिकारों और कर्तव्यों को समान रुप से लेकर चलता है । महादेवीजी का लक्ष्य समाज की विसंगतियों को दूर कर एक स्वस्थ समाज बनाना है ।

01.       अतीत के चलचित्र - 2 पृष्ठ, 27

02.       अतीत के चलचित्र - 2 पृष्ठ, 114

03.       अतीत के चलचित्र - 6 पृष्ठ, 61

04.       अतीत के चलचित्र - 6 पृष्ठ, 61

05.       संपादकीय, चाँद, 1935

06.       से 14 तक-श्रृंखला की कड़ियाँ

15.       संपादकीय, चाँद, 1935

डॉ. उर्मिला शुक्ल

ए-21, स्टील सिटी, अवंति विहार

रायपुर, छत्तीसगढ़

◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google