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मॉरीशस की डायरी
विनय
गुदारी
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कुछ
सप्ताह पूर्व मॉरीशस में हिन्दी सप्ताह मनाया गया। यह मॉरीशस
के हिन्दीमय वातावरण का एक अनूठा प्रयास रहा है। इस अवसर पर
भारत के सुप्रसिद्ध हिन्दी शिक्षक व आलोचक प्रो. नित्यानन्द
तिवारी व उनकी पत्नी को हिन्दी संगठन
(Hindi
Speaking Union)
ने आमंत्रित किया। व्यक्तिगत स्तर पर मैं तो दिल्ली
विशविद्यालय के अपने चहेते शिक्षक के साथ वर्षों बाद संवाद
करते हुए अत्यंत प्रफुल्लित हुआ। खैर, हिन्दी सप्ताह का आयोजन
देश के विभिन्न स्थानों पर अनेक संस्थाओं के सहयोग द्वारा
सम्पन्न हुआ। महात्मा गांधी संस्थान के छात्र (बी. ए. ऑनर्स
हिन्दी – प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ष के) अपनी कक्षायी माहौल
का अतिक्रमण करते हुए हिन्दी में खुलेपन के साथ सोचने लगे,
विचारने लगे, बतियाने लगे, गाने लगे, खेलने-झूमने लगे और फिर
वाद-विवाद भी करने लगे। यह वास्तव में व्यवहारिक तौर पर हिन्दी
से अछूते रहने वाले छात्रों के लिए एक सुनहरा व स्मरणीय अनुभव
रहा होगा । यह उनकी मुस्कान, उनकी आँखों की चमक और उनकी
सृजनात्मकता व प्रतियोगिताओं में भागीदारी से साफ-साफ आभास हो
रहा था।
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इससे पहले कि हम मुख्य घटनाओं की ओर विस्तार से बढ़ें, यह
आवश्यक है कि आप पाठकों को मॉरीशस की डायरी के कॉलम की बुनियाद
के बारे में कुछ बता दें। मैंने पहले से सृजनगाथा का नाम नहीं
सुना था। इंटरनेट पर घूमना का शौक रखता हूँ और ऐसे ही किसी
रोज़, सृजनगाथा के अंतरजाल को एक्स्प्लोर करके मुझे लगा जैसे कि
वर्षों के प्यासे की प्यास मिटने का सराय/पड़ाव उसे मिल गया
हो। तभी से यूँ कहें कि मैं इस साइट का दिवाना बन गया हूँ।
फिर क्या था, सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस जी से लगातार
मारीशस के साहित्यिक माहौल और ढेर सारी अन्य मुद्दों पर उनसे
विमर्श होने लगा । इस बीच श्री मानस ने एक दिन कहा कि क्यों न
मैं मारीशस को लेकर दुनिया भर मे फैले हिंदी पाठकों के लिए कुछ
नियमित लिखूँ । मुझे लगा कि यह तो वाकई बहुत अच्छा प्रस्ताव है
। बस्स, मैं तैयार हूँ आपके समक्ष इस स्तम्भ के साथ ।
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हाँ तो, डायरी आप सभी पाठकों के सामने हर माह खोली जाएगी
जिसमें आपको मॉरीशस की साहित्यिक, सांस्कृतिक, धार्मिक,
शैक्षिक तथा अन्य गतिविधियों की जानकारी से निरंतर अवगत कराया
जायेगा, परंतु केन्द्र में साहित्यिक चर्चा-परिचर्चाएँ,
गोष्ठियाँ, पुस्तक-विमोचन आदि भी रहेगा।
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मॉरीशस अब हिन्दी साहित्य के संसार में एक अपरिचित देश नहीं
रहा। यहाँ भारत जैसा साहित्यिक वातावरण की अनुपलब्धता के
बावजूद, लम्बे समय तक विदेशी सत्ता के शोषण सहने वाले भारतीय
आप्रवासियों के वंशजों ने अपनी एक साहित्यिक अस्मिता का
निर्माण किया है। देश के इतिहास, उसके यथार्थ, समाज के बदलते
स्वरूप, हिन्दी भाषा एवं संस्कृति के सम्बन्ध में संभावनाएँ
आदि ऐसे अनेक विविध मुद्दे हैं जिनपर मॉरीशस के स्थानीय
रचनाकार अपनी कलम चलाते रहे हैं और इस प्रकार निकंचक भारतीय
हिन्दी साहित्य के महासागर में अपनी साहित्यिक बूँद अर्पित कर
रहा है यह छोटा भारत।
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संपूर्ण मॉरीशस में दीपावली के शुभ पर्व को जहाँ एक ओर
स्वच्छता और पूरी निष्ठा के साथ मनाई गई वहाँ अनेक स्थानों पर
चिंतन करने का यह त्यौहार एक बहुत बड़े मंच के रूप में उपस्थित
हुआ। महात्मा गांधी संस्थान में ज्योतिर्ज्वालय के नाम से एक
उच्च-स्तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें
संगीत विभाग तथा भारतीय भाषा विभाग के सदस्यों ने भाग लिया।
वरिष्ठ व्याख्याता गुलशन सुखलाल द्वारा लिखित विश्वज्योति नामक
एक नाटिका का मंचन हमारे बी.ए. के छात्रों द्वारा किया गया।
नाटिका में विश्व के अनेक देशों में फैले आतंक, भूखमड़ी, बाढ़,
अशिक्षा, हत्याएँ आदि को प्रतिनिधि पात्र मंच पर लाते हैं तथा
ज्योति की तलाश में आते हैं। प्रकाश के कुछ प्रतिनिधि पात्र
अंत में सामने आते हैं और यही आत्म-दर्शन सभी में करवाते हैं
कि वास्तव में ज्योति हम सभी में पहले से ही है। नाटिका का
अंत इससे होता है –
“और
इस साल पूरे संसार को ज्योति से भर देंगे... हर अन्धकार को
मिटाएँगे...हर रावण
मारेंगे... सब कुछ ज्योतिर्मय हो जाएगा.. इस साल दीपावली में
हम छ अरब दीपक जलाएँगे...”
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कुछ अन्य खबरें आपके सामने रखें।
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हिन्दी प्रचारिणी सभा, लोंग माउंटेन, के सभागार में शनिवार 27
अक्टूबर 2007 को ‘साहित्य संवाद’ द्वारा एक गोष्ठी का आयोजन
किया गया जिसमें महात्मा गांधी संस्थान के वरिष्ठ व्याख्याता,
गुलशन सुखलाल ने
“सूर्यदेव
सिबोरत की कविताओं में आधुनिकता-बोध’ नामक विषय पर अपने
शोध-प्रपत्र पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मुनीश्वरलाल
चिंतामणि द्वारा हुआ। इस अवसर पर इन्दिरा गांधी भारतीय
सांस्कृतिक केन्द्र की नई निदेशिका, श्रीमती अनिता अरोड़ा ने भी
अपना वक्तव्य दिया। ‘साहित्य संवाद’ भारतीय उच्चायोग तथा पर
इन्दिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा स्थापित एक
ऐसा साहित्यिक मंच है जो हर माह के अंत में किसी-न-किसी
साहित्यिक गतिविधि का आयोजन करता है। इसकी स्थापना में भारतीय
उच्चायोग के पूर्व द्वितीय सचिव राजेन्द्र भट्ट जी का बड़ा
सहयोग रहा है।
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शनिवार 27 अक्टूबर 2007 को ही पोर्ट लुई में स्थित आर्य-सभा के
भवन में नारायणपत्त दसोई जी द्वारा लिखित ‘पं. वासुदेव
विष्णुदयाल के कुछ संस्मरण’ नामक पुस्तिका का विमोचन भारतीय
उच्चायोग के द्वितीय सचिव एवं भाषा व शिक्षा अधिकारी, डॉ.
जयप्रकाश कर्दम द्वारा सम्पन्न हुआ। इस उपलक्ष्य पर डॉ.
वीरसेन जगासिंह, कथाकार रामदेव धुरन्धर, डॉ. सरिता बुद्धू तथा
डॉ. जयप्रकाश कर्दम ने लेखक तथा उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक के
अनेक पहलुओं पर चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन विनय गुदारी ने
किया।
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दिनांक 17 नवम्बर 2007 को
IGCIC
(इन्दिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र) में कला एवं
संस्कृति मंत्रालय तथा ‘हिन्दी लेखक संघ’ द्वारा ‘बाल नाटक
लेखन’ पर एक अर्द्ध-दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ। कला एवं
संस्कृति मंत्रालय से प्रसिद्ध रंगकर्मी, महेश रामजीयावन ने
बाल हिन्दी नाटक की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए ऐसे नाटकों
में मॉरीशसीय तत्त्वों की उपस्थिति पर बल दिया। साथ-ही-साथ
उन्होंने बाल नाटकों में सुबोध एवं सरल मॉरीशसीय हिन्दी भाषा
के प्रयोग पर ज़ोर दिया जिसमें भोजपूरी एवं अन्य स्थानीय
भाषाओं-बोलियों के शब्दों के समावेश में लचीलापन होना चाहिए।
अन्य वक्ताओं में वरिष्ठ कथाकार, कवि एवं आलोचक डॉ.
मुनीश्वरलाल चिंतामणि, इन्द्रदेव भोला इन्द्रनाथ, डॉ. जयप्रकाश
कर्दम आदि रहे।
विनय गुदारी
Vinaye
Goodary
Melville
Grand Gaube
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