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तमाशा और लोग
कैलाश वनवासी
सोलह सत्रह साल का लड़का । मैला कुचैला और गंदा ।
ग्यारह-बारह बरस की लड़की । वैसा ही । कपड़े फटे पुराने ।
बाल भूला सरीखे रूखे-रूखे ।
लड़के के पास बांसुरी है । डमरू है । जादूगरी है ।
लड़की के पास कुछ नहीं
–
सिवा लड़की होने के ।
दोनों का पेट मुश्किल से भरता है । बहुतों की तरह ।
जबकि कइयों का ज़रूरत से ज़्यादा भरता है ।
तमाशा है, , ...... नहीं था । लड़का अब भी जान जोखिम में डालता
है । कला-बाजियाँ खाता है । खतरनाक करतब दिखाता है । लेकिन लोग
हैं कि टिकते नहीं । टिकते हैं तो सिर्फ़ तालियाँ बजाते ।
तालियाँ बजती है । पेट की भूखी अंतडियाँ भी बजती है- तालियों
के गड़गड़ाहट से कहीं ज़्यादा ।
दोनों जैसा लोगों को देखते हैं............. उन्हें कोई भी
वैसा नहीं देखता । कोई भी नहीं । इसलिए लड़के को लगता है
–
तमाशे तो वही हैं । लोग बदले हैं ।
उसने भी तमाशा बदल दिया ।
लड़के के तमाशे में भीड़ होती है । तालियाँ बजती हैं । बांसुरी
बजती है । डमरू बजता है । अश्लील संवादों से लड़के का गला बजता
है । नहीं बजता है तो सिर्फ़ दिल और पेट की अंतडियाँ ।
एक नयी बात कि, अब सीटियाँ बजती हैं । और लड़के के दिमाग की
नसें बजती है ।
लोग कहते हैं कि लड़का तमाशा बढिया दिखाता है । लेकिन मैं कहता
हँ, वह तमाशा दिखाता ही कब है
?
देखते तो लोग हैं –
तमाशा समझकर ।
कैलाश वनवासी
केलाबाड़ी, दुर्ग
छत्तीसगढ़
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