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सृजनगाथा


 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। लघुकथा ।।

 

 

तमाशा और लोग


कैलाश वनवासी

 

सोलह सत्रह साल का लड़का । मैला कुचैला और गंदा ।

ग्यारह-बारह बरस की लड़की । वैसा ही । कपड़े फटे पुराने ।

बाल भूला सरीखे रूखे-रूखे ।

लड़के के पास बांसुरी है । डमरू है । जादूगरी है ।

लड़की के पास कुछ नहीं सिवा लड़की होने के ।

दोनों का पेट मुश्किल से भरता है । बहुतों की तरह ।

जबकि कइयों का ज़रूरत से ज़्यादा भरता है ।

तमाशा है, , ...... नहीं था । लड़का अब भी जान जोखिम में डालता है । कला-बाजियाँ खाता है । खतरनाक करतब दिखाता है । लेकिन लोग हैं कि टिकते नहीं । टिकते हैं तो सिर्फ़ तालियाँ बजाते । तालियाँ बजती है । पेट की भूखी अंतडियाँ भी बजती है- तालियों के गड़गड़ाहट से कहीं ज़्यादा ।

      

दोनों जैसा लोगों को देखते हैं............. उन्हें कोई भी वैसा नहीं देखता । कोई भी नहीं । इसलिए लड़के को लगता है तमाशे तो वही हैं । लोग बदले हैं ।

      

उसने भी तमाशा बदल दिया ।

      

लड़के के तमाशे में भीड़ होती है । तालियाँ बजती हैं । बांसुरी बजती है । डमरू बजता है । अश्लील संवादों से लड़के का गला बजता है । नहीं बजता है तो सिर्फ़ दिल और पेट की अंतडियाँ ।

      

एक नयी बात कि, अब सीटियाँ बजती हैं । और लड़के के दिमाग की नसें बजती है ।

      

लोग कहते हैं कि लड़का तमाशा बढिया दिखाता है । लेकिन मैं कहता हँ, वह तमाशा दिखाता ही कब है ? देखते तो लोग हैं तमाशा समझकर ।

  कैलाश वनवासी

केलाबाड़ी, दुर्ग

छत्तीसगढ़

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  लघुकथाकार

 

कैलाश वनवासी

आनंद बहादुर

jरूप देवगुण

डॉ. मधु सन्धु

 

 

 

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