vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। लघुकथा ।।

 

 

रि-टायर्ड


डॉ. मधु सन्धु

 

रिटायरमेंट के बाद उनका जीवन एकदम नीरस हो आया था। सारा दिन घर में बैठे-बैठे टीवी देखते, दरवाजा बंद कर कोई सीडी लगा लेते, मोबाइल पर बतिया लेते, कभी-कभार शाम को थोड़ी-सी आउटिंग का बहाना भी मिल जाता।

 एक शाम एक शोकसभा से लौट रहे थे। एक पुरानी परिचिता मिली। वह अपनी लम्बी गाड़ी में हमें घर तक छोड़ गई। मैंने ही दो एक बातें की। पति तो चुप थे। पर उसके जाते ही बोल दिए, अमिता तो बूढ़ी हो गई है। मैं बस फटी ऑंखों से इन्हें घूरती रही।

अखबार का `महिलाएँ आजकल´ पृष्ठ इन्हें विशेष प्रिय था। मैं किचन में व्यस्त थी कि अखबार उठाकर ले आए। मेरी एक पुरानी कुलीग की फोटो थी, ऊँचाइयाँ छूने का जिक्र था। इन्होंने इन्क्वायरी की मुद्रा में कुछ प्रश्न किए। प्राइमरी जानकारी के बाद पूछा- कितने वर्ष की है। रिटायरमेंट में कितने वर्ष रहते हैं। मैं जलकर राख हो गई।

 दीपावली के दिन थे। शापिंग के लिए बाजार गए। खूब भीड़-भाड़ थी। बेटी की छोटी ननद अपने पति के साथ मिली। बोले खूब जँच रही है जीन में। ज़रूर हैल्थ क्लब जाती होगी । मैं शर्म से मर-मर गई।

डॉ0 मधु सन्धु

बी-14, गुरुनानक देव विश्वविद्यालय

अमृतसर-143005, पंजाब

 ◙◙◙

 

  लघुकथाकार

 

कैलाश वनवासी

आनंद बहादुर

jरूप देवगुण

डॉ. मधु सन्धु

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google