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नल और
नाला
आनंद बहादुर
कच्ची सड़क के एक छोर पर मंदिर, दूसरे छोर पर मस्ज़िद थी । ठीक
बीच में एक नल था जिसका टोटा गायब था । सुबह-शाम नल से लगातार
पानी बहता और सारी सड़क कीचड़ से भरे एक नाले में बदल जाती ।
लोग कीचड़ पर चलकर मंदिर जाते, कीचड़ पर चलकर मस्ज़िद जाते ।
मस्ज़िद की तरफ से मंदिर की तरफ जाना हो या मंदिर की तरफ से
मस्ज़िद की तरफ, पाँव कीचड़ से सन ही जाते । इससे उत्पन्न होती
झुंझलाहट, झुझलाहट से क्रोध और क्रोध से फ़साद ।
नल का पानी सभी पीते थे इसलिए लोग नल को लेकर सजग-सतर्क हुए ।
उन लोगों ने चढ़ावे की ऱकम से पैसे निकाल कर कई बार टोटे
चढ़ाए । मगर एक-न-एक दिन कोई टोटा चुरा ले जाता और सड़क फिर
कीचड़ बनने लगती ।
एक दिन मंदिर-मस्ज़िद वालों ने मिलकर कीचड़ पर विचार किया ।
विचार किया गया कि क्या सड़क के किनारे मस्ज़िद से मंदिर तक एक
नाला बना दिया जाय । मगर नाले का बहाव मंदिर की तरफ हो कि
मस्ज़िद की तरफ, इसपर भंयकर झड़प हो गई । अंत में उस नल को ही
उखाड़ फेंकने का फैसला लिया गया ।
उस सड़क पर लोगों को अब भी प्यास लगती है । प्यास लगती है, तो
वे लहू से प्यास बुझा लेते हैं ।
आनंद बहादुर
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