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सृजनगाथा


 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। लघुकथा ।।

 

 

नल और नाला


आनंद बहादुर

 

कच्ची सड़क के एक छोर पर मंदिर, दूसरे छोर पर मस्ज़िद थी । ठीक बीच में एक नल था जिसका टोटा गायब था । सुबह-शाम नल से लगातार पानी बहता और सारी सड़क कीचड़ से भरे एक नाले में बदल जाती । लोग कीचड़ पर चलकर मंदिर जाते, कीचड़ पर चलकर मस्ज़िद जाते । मस्ज़िद की तरफ से मंदिर की तरफ जाना हो या मंदिर की तरफ से मस्ज़िद की तरफ, पाँव कीचड़ से सन ही जाते । इससे उत्पन्न होती झुंझलाहट, झुझलाहट से क्रोध और क्रोध से फ़साद ।

      

नल का पानी सभी पीते थे इसलिए लोग नल को लेकर सजग-सतर्क हुए । उन लोगों ने चढ़ावे की ऱकम से पैसे निकाल कर कई बार टोटे चढ़ाए । मगर एक-न-एक दिन कोई टोटा चुरा ले जाता और सड़क फिर कीचड़ बनने लगती ।

      

एक दिन मंदिर-मस्ज़िद वालों ने मिलकर कीचड़ पर विचार किया । विचार किया गया कि क्या सड़क के किनारे मस्ज़िद से मंदिर तक एक नाला बना दिया जाय । मगर नाले का बहाव मंदिर की तरफ हो कि मस्ज़िद की तरफ, इसपर भंयकर झड़प हो गई । अंत में उस नल को ही उखाड़ फेंकने का फैसला लिया गया ।

      

उस सड़क पर लोगों को अब भी प्यास लगती है । प्यास लगती है, तो वे लहू से प्यास बुझा लेते हैं ।

 

  आनंद बहादुर

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  लघुकथाकार

 

कैलाश वनवासी

आनंद बहादुर

jरूप देवगुण

डॉ. मधु सन्धु

 

 

 

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