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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

समय और मैं

 

समय की पीढ पर

मेरा चेहरा

हजारों कामनाओं से गहराता हुआ

कालिमाग्रस्त।

 

मेरे और समय के बीच

है कुछ,

सपनें जैसा ही अदभुत् और अदृश्य

मेरी पहुँचसे बहुत दुर।

 

ढीले पडते समय को

दुरूस्त करने का कोई उपाय नहीं है

मेरे पास

पुरी तरह हारने से पहले मैं

देख लेना चाहती हँ

आकाश का अंतिम छोर।

जान लेना चाहती हूँ

पाताल की परिभाषा।

महसूस कर लेना चाहती हँ

धरा की ज़मीनी हकीकत।

 

सतही संभावनाओं के

उस पार से आती

झिलमिल रोशनी

के अलावा कुछ नहीं है

यहाँ, मेरे आस पास।

 

थोडे को बचाने की

ज़द्दोज़हद में

बहुत कुछ खोने के बाद

सम्पूर्ण विखंडन के

आखिरी सिरे पर खडी हुई मैं।

 

आत्म ध्वनियों की आरोह-अवरोह में लीन

कई शाश्वत

बेचैनियों, अंधेरों,चक्र्रव्यूहों के बीचों बीच

स्मृतियों के भयावह जंगल में

भटकती हुई।

 

बेतहासा भीड़ के बावजूद

प्रत्युत्र में केवल

छिछली प्रतिध्वनियों को धामे हुए

सन्नाटे की  केन्द्रीय दिशा की ओर

मेरे बढते  कदमो की रफ़तार लगातार

तेज होती जा रही है ।

 

समय का मुझे केवल

इतना अवदान है

की वह मुझे

देता रहा है

इस्तेमाल किये हुए पल

जिन से सारा जहान एक बार तो

जूतों समेत गुजर ही चुका है।

  विपिन चौधरी

मकान नः १००८

हाउसिंग बोड कलोनी, सेक्टर १५ ,
हिसार, हरियाणा - १२५००१

 ◙◙◙

 

कविताएँ

त्रिलोचन

नीलाभ

कुमार अंबुज

विश्वरंजन

प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'

सीमा सोनी

- पहाड़ों पर बारिश

- आज की रात

- तोता सीख गया है...

- छुई-मुई

- सज़ा

विपिन चौधऱी

- कभी दूर कभी पास

- सादृश्य

- इस चक्रव्यूह में

- समय और मैं

- यादों के जुगनू

 

 

 

 

 

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