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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007
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।। कविता ।।
सादृश्य
मुझमें और तुममें
बस इतना-सा ही सादृश्य है
कि मैं-मैं हूँ
और तुम-तुम हो।
माना कि हृदय धड़कते हैं
दोनों के, एक-सी गति से।
तिरोहित हो बहता है
अविरल लहू
तुममें भी और मुझमें भी
फिर भी
तुम-तुम हो और मैं-मैं।
चारों ओर घटता रोज
देखते हैं यह हंगामा
तुम भी और मैं भी।
तुम अनदेखा कर
बढ़ जाते हो आगे,
मैं रूक जाती हूँ
क्योंकि तुम-तुम हो
और मैं-मैं।
विपिन चौधरी
मकान नः १००८
हाउसिंग बोड कलोनी, सेक्टर १५ ए, हिसार, हरियाणा - १२५००१
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ककविताएँ
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नीलाभ
कुमार अंबुज
विश्वरंजन
प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'
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- आज की रात
- तोता सीख गया है...
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विपिन चौधऱी
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