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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007
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।। कविता ।।
कभी दूर कभी पास
एक मुरझाया सा सपना है
मेरी नींद में
पीला पडकर ही
वह करीब आता है
और स्वस्थ होते ही
दूर जा बैठता है।
एक बराबरी का मामला है
मेरे नज़दीक
जो कुछ ही दूर जाने पर
बराबरी का दावा छोड कर
ऊपर-नीचे
होने लगता है।
एक बिलकुल सीधा-सीधा
रास्ता है मेरे सामने
जो अंतिम सिरे तक टेढा
दिखाई पडता हैं
यकीन दिलाता हुआ कि
मैं सीधा हूँ।
एक समझ है
जो तमाम
फैसले करती है
पर एक बार जब किसी
भँवर में पड
जाती है तो
तलछट में ही गति पाती है।
ऐसे ही दूर पास के
कुछ उटपटाँग से दृश्यों के बीच
ज़िंदगी अपने आप को
पुष्ट करने में लगी हुई हैं।
विपिन चौधरी
मकान नः १००८
हाउसिंग बोड कलोनी, सेक्टर १५ ए, हिसार, हरियाणा - १२५००१
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ककविताएँ
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