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सृजनगाथा


 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

महुए* का मधुपर्व

महुए ने कुचे लिए

इन कुचों से मोतियों जैसे

रात में झरे

और सबेरा हो जाने पर भी झरते रहे

 

सबरा होने पर चँगेरी में चुनने के लिए

लड़कियाँ आईं, रात में जानवर इन फूलों को

खाते रहे

मन भर जाने पर मनचाही जगह लिए

 

महुए में फल आए

फल कच्चे भी उपयोग में रहे

पकने पर

फूलों के समान ही, फलों के भी

पशुओं, चिड़ियों और आदमियों ने अपने-अपने

अंश ग्रहण किए

 

*फलों के भीतर ही महुए का बीज होता है। इन बीजों से तेल निकाला जाता है जो विविध कामों में आदमी को व्यस्त रखता है ।

  त्रिलोचन

लोधामंडी, ज्वालापुर

हरिद्वार

 ◙◙◙

 

कविताएँ

त्रिलोचन

नीलाभ

कुमार अंबुज

विश्वरंजन

प्रो.भागवत प्रसाद 'नियाज'

सीमा सोनी

विपिन चौधऱी

 

 

 

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