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एक और सुदामा
सुषमा मुनीन्द्र
जब
से दीनबंधु के परममित्र श्रीकांत इस छोटे से ज़िले में जिलाधीश
बनकर आए हैं दीनबंधु का संकट बढ़ गया है । दीनबंधु
ने हमेशा ही ख़ुद को संकटों से घिरा पाया है । यह बात अलग है
वे संकट, परेशानियों अड़चनों को जीवन का एक पहलू मानकर धीरज धर
लेते हैं और आमतौर पर परेशान नहीं हुआ करते ।
इस बार का संकट कुछ अलग क़िस्म का है-धर्मसंकट । कड़वी औषषि की
तरह । कड़वेपन के बावज़ूद औषधि की आवश्यकता और महत्ता होती है
। दीनबंधु की पत्नी सुनीति बार-बार दोहराती है,
“मैं
तो कहती हूँ, ईश्वर ने हमारी मदद के लिए ही श्रीकांत को यहाँ
भेजा है । तुम्हारा बालसखा है । तुम दोनों में कितनी पक्की
दोस्ती थी और तुम इतने कठोर हो कि मेरे बार-बार कहने पर भी
उससे मिलने तक नही जाना चाहते । ऐसा दब्बूपना.....”
“दब्बूपना
क्या है, सुनीति!
बता तो चुका हूँ कि उससे मिलने की मेरी स्वाभाविक इच्छा है;
पर कहाँ उसका ऊँचा स्तर, कहाँ मैं!
नहीं, उससे मिलकर न मैं उसे संकोच में डालूँगा, न ख़ुद संकोच
में पडूँगा । तब की बात दूसरी थी ।”
दीनबंधु
पछतावे के से भाव में यही कुछ दोहरा देते हैं ।
“तब
की बात, मतलब
?
यही श्रीकांत हमारे घर का नमक-अजवाइन मिला सत्तू और हरी मिर्च
का अचार कितने स्वाद से खाता था!
कुसुली (गुझिया) की महक तो दो कोस दूर से सूँघ लेता था । तुम
दोनों ने न जाने कितनी दफ़ा एक ही थाली में खाया है । अब ये
स्तर वाली बात बीच में कैसे आ गई?
”
सुनीति तुनक जाती है ।
“पहले
वाली बातें पुरानी पड़कर अब ख़त्म हो चुकी हैं । सत्तू का
स्वाद, कुसुली की महक मैं ख़ुद भूल चुका हूँ तो श्रीकांत कैसे
याद रख पाया होगा । उस पर पूरे ज़िले का भार है और तुम चली हो
उसे मिर्च के अचार की याद दिलाने ।”
दीनबंधु
ताना मार देते हैं ।
“तुम
कुछ समझते क्यों नहीं
?”
सुनीति आजिज़ आ जाती,
“गोकुल
पढ़ाई पूरी कर बेकार बैठा है । नौकरी मिलती नहीं, घूस-रिश्वत
देने को है नहीं । जमा-पूंजी नीलिमा के ब्याह में स्वाहा हो गई
। अभी दो और बैठी हैं । जाओ, श्रीकांत से कहो, गोकुल की नौकरी
का कुछ बंदोबस्त करे ।”
“मुझे
धर्म संकट में न डालो, सुनीति । गोकुल की नौकरी की बात छोड़ो,
मुझे श्रीकांत से मिलने में भी संकोच हो रहा है । उसकी पत्नी
क्या कहेगी, उसके कैसे फ़टीचर संगी-साथी है
!”
“तुम
फ़टीचर नहीं, माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक हो ।”
सुनीति बात बनाते हुए कहती है,
“काम
पड़ने पर लोग जाने कहाँ का परिचय निकाल लेते हैं;
जबकि तुम तो श्रीकांत के खास रहे हो । ठीक है, गोकुल की नौकरी
की बात न करना, बस मिल आओ । फिर जब वह हमारे घर आएगा, जो कि
आएगा ही, तब मैं कह दूँगी । मुझे बहुत मानता था ।
‘भौजी-भौजी’
करते अघाता नहीं था ।”
“तुम
मुझे धर्मसंकट में डाल रही हो ।”
“धर्मसंकट,
उफ!
बाबूजी के न रहने पर तुम उनकी जगह अध्यापक हो गए थे और
तुम्हारे हाथ में कुछ पैसे रहने लगे थे । तब तुम श्रीकांत की
आर्थिक सहायता कर दिया करते थे । कभी फ़ीस, कभी पुस्तकें,
कभी....”
“तो
अब उससे हिसाब-किताब माँगूँ
?
हरज़ाना वसूलूँ
?”
“नहीं
बस मिल आओ । श्रीकांत को पता तो चलना चाहिए कि हम भी यहाँ रहते
हैं ।”
दीनबंधु संकट में हैं ।
उधर सुनीति ने पूरे टोला-मोहल्ला को बता डाला है,
“यह
जो नए कलेक्टर साहब है, हमारे घर रोज़ आते थे । हमारे मुँहबोले
देवर हैं ।”
सुनीति चालाकी की हद तक व्यावहारिक हो सकती है, दीनबंधु को अब
तक मालूम नहीं था । पद और प्रभुता का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
लोगों पर पड़ा ।
मोहल्ले के जागरूक लोग दीनबंधु से कहले लगे,
“मास्टर
साब, आप तो कलेक्टर साहब से कहकर इस मोहल्ले के लिए बहुत कुछ
करा सकते हैं । सड़क का डामरीकरण करा दीजिए, बजबजाती-कच्ची
नाली को पक्का करा दीजिए, और सफाईकर्मी की व्यवस्था भी ।
मोहल्ले के शाला भवन का जीर्णोद्धार भी करा दीजिए । किसी भी
दिन गिर सकता है;
बच्चों को क्षति पहुँच सकती है ।”
यह सुनकर दीनबंधु घबरा गए । लोग उन्हें प्रभावशाली,
एप्रोचवाला, खास व्यक्ति मानने लगे हैं । वाह, श्रीकांत,
तुम्हारी जय हो!
वे अपनी घबराहट पर नियंत्रण करते हुए बोले,
“मैं
एप्रोचवाला व्यक्ति नहीं हूँ भई, छोटा-मोटा अध्यापक हूँ, बस ।
मोहल्ले के विकास के लिए आप सब मिलकर अरज़ी दीजिए ।”
“अरज़ी
पर अमल तभी होगा जब पहुँच हो ।”
दीनबंधु संकट में हैं-लोगों की आवश्यकताएँ, अपेक्षाएँ, आशाएँ
बहुत हैं, जिलाधीश की शक्ति, अधिकार क्षेत्र, क्षमता विशाल है;
पर दीनबंधु की झिझक और संकोच भी कम नहीं । श्रीकांत के पास
जाना उन्हें पता नहीं क्यों, स्वार्थपरक प्रतीत होता है ।
इधर गोकुल ने जब जाना कि वर्तमान जिलाधीश महोदय बाबूजी के
बालसखा और सहपाठी रहे हैं, तो उसे अपना धूसर भविष्य उज्ज्वल
लगने लगा । बाबूजी विशिष्ट लगने लगे हैं और वह ख़ुद को भी खास
समझने लगा है । व्यक्ति की श्रेणी उसकी मित्र-मंडली की श्रेणी
के आधार पर भी आँकी जाती है । और जब गोकुल के मित्र उससे कहते
हैं, गोकुल, तुम अपनी नौकरी लगी समझो- कलेक्ट्रेट में या किसी
दूसरे विभाग में या अपने क्षेत्र के जेपी सीमेंट, टमस,
यूनिवर्सल केबिल्स या किसी भी फ़ैक्टरी में । कलेक्टर साहब
जहाँ चाहें तुम्हें लगा सकते हैं । हमारे लिए भी कुछ करो । तब
गोकुल की कमीज़ का कॉलर ऐसे शान से अकड़ जाता है जैसे किसी
प्रतिष्ठित पद का नियुक्ति पत्र पॉकेट में पड़ा है ।
दीनबंधु का संकटक बढ़ता जा रहा है । सुनीति कुछ तयशुदा
वाक्यांशों को सुबह से भजने लगती है....और
दीनबंधु ने मन बना लिया है वे श्रीकांत से मिलने जाएँगे ।
एकाएक उन्हें लगने लगा कि पत्नी की बातें विक्षुब्ध करने के
साथ ही उन्हें मित्र से मिलने के लिए आतुर भी करती रही हैं ।
उन्हें लगने लगा कि वे ये जो श्रीकांत से मिलना अब तक टालते
रहे हैं वह दिखावटी, मिथ्या और बड़ा सतही था । उनके भीतर
श्रीकांत से मिलने की गहरी आस, आतुरता और उत्कंठा है-और यह
स्वाभाविक है ।
ओह!
वे श्रीकांत से मिलना इस तरह टालते कैसे रह पाए
?
दीनबंधु आर्द्र हो उठे । स्मृतियों की मिठास ने उन्हें भावुक
बना दिया । उनके भीतर आलोडन होने लगा । श्रीकांत एक बहुत बड़े,
महत्वपूर्ण पद पर आरूढ़ है यह अनुभूति दीनबंधु को गौरव से भरने
लगी । श्रीकांत, ज़िले का बेताज़ बादशाह । वाह-वाह
!
कैसा लगे लगा होगा
?
सुदर्शन तो था ही, प्रभुता एवं पद ने और भी गरिमामय बना दिया
होगा । और मैं कैसा लगता हूँ
?
दीनबंधु अनायास अपने शेव किए हुए चिबुक पर ऊँगलियाँ फेरने लगा।
बालों में सफेदी, आँखों पर ऐनक, महँगाई की मार से धनुषाकार हो
गई कमर, चेहरे पर चिंता की गहरी लक़ीरें । श्रीकांत पहचान लेगा
?
न ?
हाँ, चाल से पहचान लेगा । चाल अभी भी वही है । श्रीकांत कहता
था, ‘दीनबंधु,
मैं तुम्हें तुम्हारी इस बेहूदा चाल के कारण अँधेरे में भी
पहचान सकता हूँ । तुम ऐसे चलते हो जैसे छाँछ बिला रहे हो ।’
दीनबंधु के अधरों में महीन-सी मुसकुराहट उभर आई । जब अम्मा
उनपर क्रुद्ध होती थीं तब कहती थीं,
‘चला
आबत हय माठा कस भाँमत ।’
अम्मा की इस उपमा का प्रयोग श्रीकांत भी जब-तब कर लिया करता था
।
श्रीकांत प्रखर बुद्धि का विद्यार्थी था, जबकि दीनबंधु औसत ।
बौद्धिक असमानता, पर दोनों की आर्थिक स्थिति एक-सी, विपन्न ।
यह विपन्नता निकटता का आधार बनी । फिर वे एक-दूसरे के पर्याप्य
बन गए । अम्मा की अस्वस्थता के चलते दीनबंधु का विवाह
विद्यार्थी जीवन में ही हो गया । गोकुल का जन्म भी विद्यार्थी
जीवन में हो गया था । श्रीकांत अपने अच्छे स्वभाव के कारण
सुनीति का भी प्रिय हो गया था । सुनीति ने दोनों की मित्रता को
सहज स्वीकार कर लिया ।
श्रीकांत के माता-पिता तीर्थ करने गए थे और श्रीकांत बीमार पड़
गया था;
तब दीनबंधु और सुनीति ने उसकी खूब सेवा की थी । श्रीकांत कातर
हो आया था-
“तुम
लोग न होते तो मैं शायद....”
“छिह!
बुरी बात,”
दीनबंधु सहम गया था । उन्हीं दिनों दीनबंधु के पिता का आकस्मिक
निधन हो गया था । बड़ा होने के नाते पूरी जिम्मेदारी दीनबंधु
के अपरिपक्व कंधों पर आ गई थी । श्रीकांत के साथ विभिन्न
प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का इरादा छोड़कर दीनबंधु
अनुकंपा नियुक्ति पर अध्यापक हो गये । उनके हाथ में कुछ पैसे
रहने लगे थे और वे आवश्यकतानुसार श्रीकांत की आर्थिक सहायता कर
देते थे । फिर दीनबंधु का स्थानांतरण हो गया । छात्रवृति और
प्रावीण्य सूची में स्थान पाते हुए श्रीकांत ने उच्च शिक्षा
प्राप्त की । अपनी-अपनी
समस्याओं के समाधान तलाशते हुए दोनों अपनी-अपनी हदों में सिमट
गए और दुनिया की भीड़ में खो गए । अब एक बार फिर भौगोलिक
दूरियाँ तय करते हुए एक जगह पर हैं ।
पत्नी का दबाब और बाध्यता तथा दीनबंधु की स्वयं की लालसा और
आतुरता । उन्होंने श्रीकांत के पास जाने के लिए ख़ुद को मानसिक
रूप से पूर्णतः तैयार कर लिया । सुनीति से कहने लगे,
“सुनो
जी, तुम पीछे पड़ गई हो तो अब श्रीकांत को देखे बिना मुझसे रहा
नहीं जा रहा है । वर्षों बाद उससे मिलूँगा तो खाली हाथ जाना
कुछ ठीक नहीं लगेगा । कुसुली और मिर्च का अचार बना दो उसके लिए;
उसे अच्छा लगेगा कि हम उसकी पसंद भूले नहीं है ।”
“बात
मानोगे, पर पहले ऐंठे रहोगे ।”
सुनीति
ने मीठी फटकार लगाई ।
“और
हाँ, मैं स्टेनलेस स्टील के दो डिब्बे खरीत लाता हूँ;
चीज़े उसमें रख देना । बड़े आदमी के घर जाने का एक तरीका हुआ
करता है ।”
“बिलकुल
। तुम सुदामा नहीं हो जो बगल में पोटली दबाओ और मित्र से मिलने
चल पड़ो ।”
“सुदामा!
हा-हा”
सुनीति
की उक्ति पर दीनबंधु रीझ गए । खुलकर हँसे,
“सुन
लो, मैं गोकुल की नौकरी के लिए नहीं कह सकूँगा ।”
“तुम
जाओ तो । श्रीकांत को घर आने के लिए कहना, फिर मैं उससे कह-सुन
लूँगी ।”
डिब्बों को साफ झोले में डाल, साइकिल उठा दीनबंधु चल पड़े ।
उनके पास मोपेड है, जो आजकल बिगड़ी पड़ी है और जिसपर गोकुल का
कब्जा है । वैसे तो उसे हीरो होंडा चाहिए, मोपेड को वह अपने
स्तर का नहीं मानता;
पर मज़बूरीवश उसीसे काम चलाता है । दीनबंधु तेज-तेज पैडिल
मारते हुए शेखचिल्ली की सी भावदशा में हैं-मुझे देखकर श्रीकांत
खुशी से मतवाला हो उठेगा । मुझे साइकिल से आया देखकर दुःखी हो
जाएगा और वापसी पर अपनी सरकारी गाड़ी में भेजेगा । साइकिल किसी
अर्दली से बाद में पहुँचवा देगा । क्या पता ख़ुद भी मेरे साथ
ही चल पड़े कि भाभी से मिलना है । मै कहूँगा,
‘मेरी
गली-अँतरी में आना है, साहब, तो पहले उसे सीमेंटेड कराओ ।’
अब तक तो उसका विवाह भी हो गया होगा । बच्चे भी होंगे । मेरी
तरह चार तो नहीं होंगे । उसे अपने बड़े परिवार से अरुचि थी ।
“घर
में बटालियन है । न अच्छा ख़ाना, न अच्छा कपड़ा । ऊपर से
बापराम फ़तवा जारी किए हैं-पढ़ाई छोड़ो, कोई काम-धंधा तलाशो ।
मैं पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकता ।”
दीनबंधु जिलाधीश आवास के ठीक सामने आ पहुँचे । कितनी
साफ-स्वच्छ खुली जगह है । दीनबंधु ने एक लंबी भरपूर साँस
फेफड़ों में उतारी । इस तरह वह माहौल का जायज़ा भी ले रहे थे
और शायद साहस भी सँजो रहे थे । बँगले की भव्यता ने उनके लघुता
के बोध को बढ़ा दिया । लगा, लौट जाएँ;
पर.......
उन्हें विमूढ़ भाव में खड़े देख गेट पर तैनात जवान ने टोको,
“क्या
है ?”
“साहब
से मिलना है ।”
दीनबंधु गड़बड़ा रहे हैं ।
“काम
?”
“काम
नहीं, मैं साहब का मित्र हूँ, दीनबंधु । मिलना चाहता हूँ ।”
“सर
पत्रकार वार्त्ता में व्यस्त हैं ।”
“आप
उन्हें सूचित तो करो ।”
अपने इस अधिकार-बोध पर दीनबंधु को अचम्भा हुआ ।
“वो
उधर कुछ लोग बैठे हैं, आप उधर जाकर बैठ जाइए । वे सब लोग सर से
मिलने के लिए बैठे हैं ।”
जवान
ने हाथ से संकेत कर बताया ।
“बड़ी
मेहरबानी ।”
दीनबंधु प्रतीक्षारत लोगों के साथ बैठ गए ।
प्रायः एक घंटे की दुस्सह प्रतीक्षा के पश्चात् वे अपने प्रिय
से मिलने में सफल हो सके । हुलस रहे थे कि मित्र को बलात्
खींचकर लिपटा लेंगे;
पर दोनों के मध्य की बड़ी मेज़ और बड़े पद ने ऐसा संकुचित किया
कि नमन की मुद्रा में कमर तक झुक गए ।
“सर,
पहचाना
?
मैं दीनबंधु....दीनबंधु जैतवारावाला ।”
“ओह.....दीनबंधु.....”
श्रीकांत के मुख पर क्षणिक दुविधा के बाद पहचान के चिन्ह झलक
आए । “ग्लैड़
टु मीट यू....”
वह अँग्रेज़ी पहचाने जाने के बाद भी दीनबंधु को अज़नबी साबित
कर रही थी ।
“मैं
‘सर’
कब हो गया, भई
?”
श्रीकांत के स्वर में शुष्कता न थी तो आर्द्रता भी न थी ।
आतुरता बिलकुल नहीं;
शायद इसीलिए उन्होंने चेयर से उठने की आवश्यकता नहीं समझी । पद
का रोब-दाब दिखाना पड़ता है
–
दीनबंधु ने ख़ुद को तसल्ली दी ।
“आपसे
मिलने की लालसा थी;
पर लगता है, मैं ग़लत समय में आया हूँ । आप बहुत व्यस्त हैं ।”
दीनबंधु को नहीं मालूम वे क्या बोल रहे हैं और उन्हें क्या
बोलना चाहिए ।
“व्यस्तता
लगी रहती है । मीटिंग, दौरे, निरीक्षण, सर्वेक्षण, चुनाव,
प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ;
पर दीनबंधु, मैं
‘तुम’
से ‘आप
’
कब से बन गया
?
ये ‘आप’
वाली औपचारिकता तुमने कब सीख ली
?”
श्रीकांत ने वाक्य में आत्मीयता का पुट जोड़ा । फिर भी दीनबंधु
समझ रहे थे श्रीकांत आत्मीय नहीं हो पा रहे हैं । होना चाहते
होंगे, पर पद के बहुत दबाब होते हैं ।
“वक़्त
ने सिखा दी । मैं आने में सकुचा रहा था, पर सुनीति नहीं मानी ।”
“तुम
सकुचा रहे थे
?
तुम तो मेरे घर से भगाने पर भी नहीं जाते थे ।”
श्रीकांत
हँसे । वह बहुत छोटी, संक्षिप्त-सी हँसी थी । हँसने का प्रयास
मात्र ।
श्रीकांत तो फेफड़ा फाड़कर हँसा करता था । कहाँ बिला गई वह
गगनभेदिनी हँसी?
शायद बड़े पद के हँसने के भी कुछ नियम होंगे । दीनबंधु के
चेहरे पर निस्सहायता तारी हो गई ।
“भौजी
कैसी हैं
?
श्रीकांत पूछने लगे ।”
“ठीक
हैं । तुम्हें घर बुलाया है ।”
“किसी
दिन समय निकालूँगा । गोकुल कैसा है
?”
“ठीक
है ।”
“बेरोजगार
है । नौकरी कहीं नहीं मिलती ।”
दीनबंधु, गोकुल की बेरोजगारी बता अपना दारिद्र्य उघाड़ना नहीं
चाहते थे पर अनायास यह हो गया।
दीनबंधु ने विषयांतर कर दिया,
“बहुत
दुबले लग रहे हो ।”
“मैं
तो सदा से ऐसा ही हूँ ।”
फिर फ़ोन की घंटी घनघनाने लगी और कई-कई कॉल आईं । बातचीत का
क्रम जम नहीं पा रहा था । दीनबंधु दबाब में आ गये । श्रीकांत
का यह व्यस्ततम समय है । बोले,
“आप....तुम
व्यस्त हो । अभी चलता हूँ । सुनीति ने तुम्हारे लिए कुसुली और
मिर्च का अचार भेजा है । तुमको पसंद है न ।”
“बंधुवर,
आज तुमने पुराना स्वाद याद दिलवा दिया वरना तनाव, चिंता,
कार्यभार, डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, एसीडिटी के बीच पसंद क्या
और नापस |