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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। कहानी ।।

 

 

उड़ान


रूपसिंह चन्देल

 

 मैं उसे पहचान नहीं पाया । स्वप्न में भी कल्पना न की थी कि एक दिन वह मेरे समक्ष इस रूप में उपस्थित होगी । मन-मस्तिष्क में उसकी वही पुरानी छवि  विद्यमान रही थी इतने दिनों । नितम्बों तक लहराते घने काले बाल थे उसके । बालों को वह कभी न बांधती - खुला रखती, जो उसकी पीठ पर छाये रहते । नपे-तुले, लेकिन तेज क़दमों से जब वह चलती तब साड़ी पर अठखेलियाँ करते बाल उसके व्यक्तित्व को और अधिक आकर्षक बनाते। पाँच फुट तीन इंच की लंबाई, सुता हुआ गोरा-सुघड़ चेहरा नोकीली नाक, चमकदार तेज हिरणी-सी आँखें, ऊँचा ललाट और उस पर बालों का वितान - कोई भी उसे एक बार देखने के बाद दोबारा देखना चाहता । पहली बार जब मैं मिला, उसे बार-बार देखने की उत्सुकता रोक नहीं पाया था । वह भी इस ओर सचेत रहती और शायद आनंदित भी होती कि उस पर कितने लोगों की नज़रें टिकी हुई हैं।

 

वह क्लर्क थी और विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसे हमारे कार्यालय में नियुक्त किया था । छोटा-सा दफ्तर - केवल आठ लोग, जिनमें एक डिप्टी लाइब्रेरियन, एक सेक्शन आफीसर, एक कैशियर, एक क्लर्क और शेष हम चार सहायक थे जो लाइब्रेरी की प्रशासनिक व्यवस्था देखते थे । डिप्टी लाइब्रेरियन आनंद मोहन का कमरा हमारे हॉल के साथ था । यह एक छोटा हॉल था, जिसमें सेक्शन ऑफ़िसर सहित हम सात हॉल में बैठते थे । दीवारों के साथ पाँच आल्मारियाँ रखी हुई थीं, जिनके कारण हॉल का बड़ा भाग घिरा हुआ था । इन आल्मारियों के पेट में लाइब्रेरी प्रशासन संबन्धी फाइलें समायी हुई थीं । सेक्शन आफीसर पी. स्वामीनाथन की कुर्सी-मेज का रुख़ डिप्टी लाइब्रेरियन के कमरे की ओर था । अर्थात् दक्षिण दिशा की ओर, जबकि हम शेष छ: का रुख़ हॉल के मुख्य द्वार की ओर था, जो पश्चिम की ओर था । हॉल के बाद एक बड़ी-सी लॉबी थी । लॉबी के दूसरी ओर लाइब्रेरियन प्रो.महेन्द्र प्रकाश का चैम्बर था, जिसका दरवाज़ा ठीक हॉल के दरवाज़े के सामने था । हॉल का दरवाज़ा सदैव खुला रहता था और पर्दा न पड़े होने के कारण प्रो. प्रकाश के में कमरे आने-जाने वाले लोगों की दृष्टि स्वत: हॉल में बैठे लोगों पर पड़ती रहती थी । दरवाज़ा प्रो. प्रकाश के चैम्बर का भी पूरे समय खुला रहता था, लेकिन उस पर एक ऐसा पर्दा डाला गया था जिससे प्रो. प्रकाश तो हॉल की समस्त गतिविधियों का जायजा लेते रहते थे, लेकिन हॉल के लोग पर्दे के उस पार प्रो. प्रकाश की झलक तक नहीं देख पाते थे ।

 

प्रो. प्रकाश ठीक दरवाज़े के सामने बड़ी-सी मेज पर बैठते थे और जब भी कोई कर्मचारी या चपरासी पर्दा हटाकर अंदर प्रवेश करता तभी हॉल के लोगों को प्रो. प्रकाश की आधी-अधूरी छवि या मेज का एक कोना या मेज के सामने रखे रैक पर सजी पुस्तकों की झलक मिल पाती । स्वामीनाथन ने उसे प्रवेश द्वार के ठीक सामने की उस मेज पर हम सबसे आगे बैठा दिया, जिस पर केवल मखीजा बैठता था । मखीजा हेडक्लर्क होकर फिजिक्स विभाग में स्थानांतरित हो गया था ।

 

यह उसका पहला दिन था । मेज पर रखे खटारा रेमिंग्टन टाइपराइटर पर बैठते ही उसने अपनी उंगलियाँ उस पर आजमाई थीं । जब उसने सधे हाथों धीरे-धीरे किट-किट की आवाज़ की तो हम सभी की आँखें उस ओर उठ गई थीं । पतली, लंबी-सीधी-सुन्दर और कोमल उसकी उंगलियों को मैं देर तक निहारता रहा था, जो एक-एक शब्द पर यों पड़ रही थीं मानो कोई अनाड़ी शौकियन चला रहा हो । तभी लंबे डग भरता स्वामिनाथन लाइब्रेरियन के कमरे से प्रकट हुआ था । उसे देखते ही उसने कहा था, ''सर, इस टाइपराइटर पर काम करना बहुत मुश्किल होगा ।''

''वॉट ?'' हाथ में पकड़ी फ़ाइल को मेज पर रखते हुए स्वामीनाथन बोला ।

''जी सर ।''

''ओ. के. ।'' क्षणभर तक स्वामीनाथन झुककर फ़ाइल पर कुछ लिखता रहा , फिर बोला, ''हाँ, आपका मुलाकात डिप्टी सर से हो गया ?''

''नहीं सर !'' वह अपना छोटा-सा पर्स झुलाती उठ खड़ी हुई ।

''ओ.के. ।'' स्वामीनाथन ने फ़ाइल से कोई पेपर निकाला और ''चलिए ।'' कहता हुआ डिप्टी लाइब्रेरियन आनंद मोहन के कमरे की ओर बढ़ा । वह स्वामीनाथन के पीछे डिप्टी के कमरे में चली गई । वहाँ से कुछ देर बाद निकलकर स्वामीनाथन उसे प्रो. महेन्द्र प्रकाश से मिलवाने ले गया ।

..........

 

आराधना, जी हाँ, उसका नाम आराधना सक्सेना था, के ज्वाइन करने के दूसरे दिन हॉल में हम लोगों के बैठने की व्यवस्था बदल दी गई थी । पहले हमारी मेजों की दो कतारें थीं और हम एक-दूसरे के पीछे बैठते थे। हमारे रुख़ हॉल के दरवाज़े की ओर होते थे । लेकिन अब हम पाँच की मेजों को आमने-सामने रख दिया गया था । अब हमारे चेहरे एक-दूसरे के आमने-सामने थे । स्वामीनाथन और आराधना की सीटों की व्यवस्था पहले जैसी ही रही थी अर्थात् स्वामीनाथन का रुख़ डिप्टी के दरवाज़े की ओर था, जबकि आराधना का रुख़ हॉल के दरवाज़े की ओर था । सप्ताह बीतते न बीतते दो और बातें घटित हुईं । आराधना की मेज पर नया टाइपराइटर आ गया था, जिसके लिए मखीजा सालों से अपना सिर पीटता रहा था, लेकिन उसे केवल यही कहा जाता रहा था कि अभी बजट नहीं है...इस वर्ष के बजट में ले देगें...इस वर्ष नहीं ले पाये...प्लीमेंटरी बजट में...और इस प्रकार मखीजा पाँच वर्ष तक खटारा टाइप राइटर पर उंगलियाँ दुखाता चला गया था ।

 

दूसरा परिवर्तन जो देखने में आया वह आश्चर्यजनक था । महेन्द्र प्रकाश के चैम्बर के दरवाज़े का पर्दा अब खुला रहने लगा था । अब हम पर वह सीधे नज़रें रख रहा था । स्वामीनाथन की सीट दरवाज़े की ओट में थी और वह उसकी नज़रों से बचा रहता था । महेन्द्र प्रकाश के पी.ए. का कमरा लॉबी में सीढ़ियों के ठीक सामने और डिप्टी के कमरे के पीछे था । दरअसल वह दस बाई दस का प्लाई से घेरकर बनाया गया था, जिसमें महेन्द्र प्रकाश से मिलने अपने वाले लोगों के प्रतीक्षा के लिए सोफा भी डाला हुआ था ।

 

महेन्द्र प्रकाश के चैम्बर के दरवाज़े से पर्दा हटवा देने के विषय में हम चर्चा करने लगे थे कि उसने हम पर नज़रें रखने के लिए ऐसा किया होगा । महेन्द्र प्रकाश यहाँ लाइब्रेरियन बनकर आने से पूर्व सागर विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी विभाग में प्रोफ़ेसर था । यहाँ आने के बाद प्रारंभिक कुछ वर्षों तक हम उसकी शक्ल देखने को भी तरसते थे , बावजूद इसके कि हम सीधे उसके अधीन थे । तब हमारे हॉल का दरवाज़ा भी बंद रहता था और प्रो.प्रकाश के चैम्बर का भी । लेकिन धीरे-धीरे स्थितियाँ बदलती गईं । नये लाइब्रेरियन का भय जाता रहा और हमारे हॉल का दरवाज़ा खुला रहने लगा था, लेकिन महेन्द्र प्रकाश का तब भी बंद रहता था। दरवाज़े पर एक चपरासी तैनात रहता था, जो किसी के अंदर जाते ही लाल बत्ती जला दिया करता और बाहर निकलते ही हरी कर देता था । लेकिन कभी-कभी कोई अंदर न भी होता तब भी बत्ती लाल होती । तब हम लोग अनुमान लगाते कि प्रोफ़ेसर साहब आराम फ़रमा रहे होगें । चैम्बर की बत्ती लाल हो या हरी पी. ए. को दरवाज़ा नॉक करके ही जाना होता था । हम प्राय: पी.ए. को चैम्बर के दरवाज़े पर नोटबुक थामे खड़ी देखते । वह लगभग चालीस वर्षीया दुबली-पतली चपटे गालों वाली एक सूखी-सी महिला थी, जिसके चेहरे पर हर समय परेशानी झलकती रहती थी ।

 

 कुछ वर्षों बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रोफ़ेसर के पास से चपरासी हटा लिया था या स्वयं प्रोफ़ेसर ने हटवा दिया था । उसके कुछ दिनों बाद चैम्बर का दरवाज़ा खुला रहने लगा था, लेकिन उस पर पर्दे अवश्य लटके रहते, जिन्हें सुबह आते ही स्वामीनाथन चुस्त-दुरस्त किया करता था ।

अब वे पर्दे दरवाज़े के साथ सिकुडे हुए टंगे रहने लगे थे ।

 .........

 

आराधना को मैं पहचान नहीं पाया । उसका सौंदर्य व्यतीत की बात हो चुकी थी । पत्र-विहीन पुराने दरख्त की भांति वह सामने थी । आँखों के नीचे गहरे नीले धब्बे, सूखा-सिकुड़ा चेहरा, पिचका शरीर, धूसर-सीमित छोटे बाल... मैं कैसे पहचान सकता था ! कभी विश्वविद्यालय कर्मचारियों में अपने सौदर्य के लिए चर्चित रही कोई युवती बावन वसंत में इतना-ढल-गल जायेगी, असोचनीय था । तब वह कैसी-भी बदरंग साड़ी पहनती, (वह सदैव साड़ी में ही दफ्तर आती थी...और नई और मँहगी साड़ियाँ ही पहनती थी ) उसके बदन पर निखर उठती । लेकिन उस दिन मँहगी और सुन्दर साड़ी यों लग रही थी मानो करील के सूखे पेड़ पर उसे लटका दिया गया था ।

 

जब उसने लाइब्रेरी में ज्वाइन किया था, कर्मचारी किसी न किसी बहाने हमारे यहाँ आने लगे थे, युवाओं से लेकर प्रौढ़ तक । कुछ युवा, जो प्राय: विलंब से दफ्तर आते थे, आराधना से पहले आने लगे थे और लाइब्रेरी के गेट पर बेकली से खड़े रहने लगे थे केवल उसकी एक झलक पाने के लिए...दो शब्द बतिया लेने के लिए...कुछ नहीं तो अपने गुडमॉर्निंग का जवाब सुनने के लिए । उनमें एक था गुलशन कुमार । गुलशन प्रोफ़ेशनल असिस्टैण्ट था । उम्र कोई बत्तीस वर्ष । सामान्य कद-काठी । एम. लिब था । पी-एच.डी. के लिए प्रयत्नशील था और यह आशा करता था कि जब भी असिस्टैण्ट लाइब्रेरियन बनेगा तभी शादी करेगा । लेकिन प्रशासन पदोन्नति टालता जा रहा था । और अब आराधना को देख उसे अपना संकल्प टूटता दिखाई दे रहा था। वह उसके विषय में अधिक सोचने लगा था गुलशन उन लोगों में शामिल हो गया जो उसकी प्रतीक्षा गेट के पास खड़े होकर करते थे । लेकिन वह दूसरों से हटकर खड़ा होता और आराधना को आता देख उसकी ओर धीरे-धीरे चल पड़ता और निकट पहुँचकर मुस्कराते हुए गुड मॉर्निंग कर बस-स्टैण्ड की ओर चला जाता जहाँ पेड़ के नीचे चाय की दूकान जमाए हरेराम की चाय पीकर लौटता । तब तक आराधना की प्रतीक्षा में खड़े दूसरे युवा कर्मचारी जा चुके होते थे ।

 

गुलशन दिन में एक-दो बार हमारे यहाँ किसी न किसी बहाने आने लगा था । आते ही वह स्वामीनाथन को प्रसन्न करने वाले अंदाज में बातें करता, आराधना से मुस्काराकर हलो करता, फिर हममें से किसी के पास बैठ जाता और पाँच-दस मिनट इधर-उधर की बातें करता रहता । दूसरे लोग आते, लेकिन वे केवल ताक-झांककर चले जाया करते थे । यह तब की बात थी जब प्रो. महेन्द्र प्रकाश के चैम्बर पर पर्दा पड़ा रहता था ।

एक दिन स्वामीनाथन ने हम लोगों से पूछा, ''ये गुलशन साहब डेली यहाँ क्या करने आता है ?''

''पता नहीं साहब ।'' हममें से एक बोला ।

''पता करना माँगता...आखिर ये एडमिन सेक्शन है । बड़ा साहब को पता चलेगा तो...।'' स्वामीनाथन आगे कुछ कहता उससे पहले हमारा सहयोगी महेश कुमार बोला, ''सर, बुरा न मानें तो मैं कुछ कहूँ ।''

''बुरा क्या - - क्या कहना माँगता ?'' स्वामीनाथन बोला ।

''सर, आप नहीं...मैडम बुरा न मानें ।''

''मैडम..मैडम...ओह ---।'' स्वामीनाथन को समझ आया, वह आराधना की ओर देखने लगा ।

''मुझे क्यों बुरा लगेगा ?'' आराधना बोली ।

''सुनिये सर !'' महेश बोला, ''गुलशन साहब मैडम की ही बिरादरी के हैं और अभी तक बैचलर हैं सर !''

''सो व्वॉट ?'' आराधना चौंकी, ''आपका मतलब... ?''

''मैनें कहा था न कि मैडम बुरा मान जायेगीं... मेरा मतलब... ।'' महेश ने बात संभालने की कोशिश की।

''महेश जी...मैं बुरा नहीं मानी क्योंकि मैं आपकी बात समझी ही नहीं ।''

''इसमें समझाना क्या आराधना जी ? जहाँ तक मैंने समझा है वह आपसे शादी का प्रस्ताव करना चाहते हैं, लेकिन...।''

''मुझसे शादी का प्रस्ताव...वह हैं क्या ? क्लर्क...।''

''क्लर्क नहीं मैडम...पी.ए. हैं । पी. जे. बन जायेगें...असिस्टैण्ट लाइब्रेरियन...कभी लाइब्रेरियन भी बन सकते हैं।''

''आज क्या हैं?'' आराधना के स्वर में व्यंग्य था, ''मैं किसी बाबू से शादी करने के लिए नहीं जन्मी...।'' क्षणभर चुप रहकर वह बोली, ''तो यह बात है !''

हॉल में सन्नाटा छा गया था । आराधना बाहर चली गई थी । हमें लगा वह शायद गुलशन से लड़ने गयी होगी । लेकिन वह महेन्द्र प्रकाश के पी.ए. के कमरे में जा बैठी थी । उसके जाने के बाद स्वामीनाथन बोला था, ''महेश, गुलशन को बोल दो... इघर आना नहीं माँगता । जो बोलना है बाहर ही बोले...बेटर है आराधना के माँ-बाप को बोले ।''

 गुलशन से महेश ने कहा या किसी अन्य ने या उसने स्वयं सोचा लेकिन उसने न केवल हमारे यहाँ आना छोड़ दिया, बल्कि आराधना के सामने पड़ना भी छोड़ दिया । उसीने नहीं, बल्कि दूसरों ने भी अपने को समेट लिया था और पूरे विश्वविद्यालय में यह बात चर्चा का विषय बन गई थी कि आराधना सक्सेना ने गुलशन कुमार को रिजेक्ट कर दिया था । और यह कि उसका ख्वाब किसी ऊँचे पद वाले के साथ ही शादी करने का है ।

(क्रमशः आगे पढ़ें...)

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