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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-19, दिसंबर, 2007

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।। कहानी ।।

 

 

उड़ान


रूपसिंह चन्देल

 

(पूर्वांश पढें) 

शादी के लिए ऊँचे पद वाला कोई आराधना को नहीं मिला । लेकिन ऊँचे पद का विचार वह कभी त्याग नहीं पायी । वह एक ग्रंथि के रूप में उसके अंदर जड़ें जमा चुका था । और यह ग्रंथि ही थी जो उसे प्रो.प्रकाश के निकट खींच ले गयी थी । प्रो. प्रकाश जब तब उसे बुलाने लगे थे । हमने तब अनुमान लगाया था कि शायद उसके कारण ही प्रो.प्रकाश के चैम्बर के दरवाज़े का परदा हटा था, न कि हम पर नज़रें रखने के लिए । आराधना की मेज प्रो.प्रकाश की मेज के ठीक सामने थी और दोनों के चेहरे एक-दूसरे के आमने-सामने । लगभग चार महीने बीतने के बाद आराधना की सीट प्रो. प्रकाश के आदेश पर स्वामीनाथन ने पी.ए. के कमरे में वहाँ पड़े सोफे हटवाकर लगवा दी थी । अतिथियों के लिए केवल दो कुर्सियाँ वहाँ डाल दी गई थीं। अब प्रो.प्रकाश के चैम्बर का दरवाज़ा पुन: बंद रहने लगा था और बत्ती लाल-हरी होने का सिलसिला प्रारंभ हो चुका था । लेकिन अब इस व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं प्रो.प्रकाश ने संभाल ली थी । दोनों बत्तियों के स्विच उनकी मेज पर स्वामीनाथन ने फिट करवा दिये थे । अब प्रो. प्रकाश अपनी पी.ए. के स्थान पर आराधना को ही चैम्बर में बुलाते थे । पी. ए. केवल टेलीफोन सुनती थी या टाइपिगं करती थी । जब भी आराधना प्रो. प्रकाश के चैम्बर में होती, बत्ती लाल रहती थी और आधा घंटा से पहले शायद ही कभी वह हरी होती ।

 

विभाग के कर्मचारियों के कान खड़े हो चुके थे और उनकी नाके लंबी होने लगी थीं । एक दिन मैनें एक को गुलशन कुमार से कहते सुना, ''बॉस लगता है आप अभी भी उसकी माला जपे जा रहे हो ?''

''मैं समझा नहीं ।'' गुलशन ने भोलेपन से अनभिज्ञता प्रदर्शित की थी।

''छोड़ भी यार उसे...उसके बारे में अब क्या सोचना... ?''

''किसकी बात कर रहा है तू...?'' गुलशन वास्तव में ही नहीं समझा पाया था ।

''अरे उसकी जो ऊँची उड़ान भरना चाहती थी...आजकल भर भी रही है । भई बुड्ढा ले उड़ा उसे... ।''

''कौन बुड्ढा ? किसकी बात कर रहे हो ?''

एक ठहाका गूँजा था । दो कर्मचारी और आ गए थे । एक अन्य ने जोड़ा था, ''यार नीरज, तुम उसे बुड्ढा कैसे कहते हो...अभी वह पचास का नहीं हुआ ।''

''लेकिन हमारे गुलशन भाई का ताऊ तो है ही और ताऊ के ड्राइवर ने मुझे आज बताया कि मैडम सक्सेना कल देर रात तक उसके बंगले पर थीं । प्रोफ़ेसर के घर वाले भोपाल गये हुए हैं । ड्राइवर मैडम को उसके घर छोड़ने गया था ।

गुलशन का चेहरा सफेद पड़ गया था ।  

......

 

इस प्रकरण के कुछ दिनों बाद मैं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में पी. ओ. सेलेक्ट होकर मुम्बई चला गया । लंबा समय गुजर गया । प्रारंभिक चार-पाँच वर्षों तक मित्रों से फोन पर कभी-कभी चर्चा हो जाया करती थी। आराधना के समाचार भी मिल जाते थे । प्रो.प्रकाश की सलाह पर ही शायद उसने एक असिस्टैण्ट से विवाह किया था, जो किसी मिनिस्ट्री में था । लेकिन उसका वैवाहिक जीवन चार महीने भी सफलतापूर्वक नहीं चल पाया था । तलाक हुआ । इस दौरान उसके माँ-पिता की मृत्यु हो चुकी थी । एक भाई है, जो अमेरिका जा बसा था । प्रो.प्रकाश ने करोलबाग में उसे विश्वविद्यालय का मकान दिलवा दिया था, लेकिन उस मकान में वह कभी नहीं जाते थे । जब कभी उनका परिवार न होता, वह उसे अपने बंगले में बुला लेते । ऐसी स्थिति में अवकाश के दिनों में वह सुबह से देर रात तक उनके यहाँ रहती । कभी-कभी रात में भी ।

 

गुलशन अभी भी अविवाहित था, क्योंकि वह असिस्टैण्ट लाइब्रेरियन नहीं बन पाया था ।

 

समय तेजी से बीतता गया और पचीस वर्ष बीत गये । एक दिन प्रो. प्रकाश कोई ऊँचा पद लेकर लंदन चले गये थे । आराधना की उड़ान टूट चुकी थी । वह उसी धरातल पर आ पड़ी थी जहाँ से उड़ी थी । लेकिन विलंब हो चुका था ।

 

उसके पश्चात्...जीवन से उदासीन और हताश वह चिड़चिडी हो गयी...सूखने लगी । इठलाने-खिखिलाने वाली आराधना के चेहरे पर हँसी देखे मित्रों को वर्षों बीत चुके थे ।

......

 

''हलो, आपने मुझे पहचाना नहीं ?'' उसने प्रश्न किया । चौंककर मैनें उसपर दृष्टि टिका दी, पहचान फिर भी नहीं पाया ।

''आप नितिन अरोड़ा हैं न !''

''जी-जी...और आप ?''

''मैं आराधना सक्सेना...कभी साथ..।'' बेहद शिथिल स्वर था उसका ।

''ओह..आप..?'' और आगे के शब्द मेरे गले में ही अटक गये थे । उसकी आँखों की दैन्यता मेरे अंदर उतरती चली गई थी । मैं कुछ कहता इससे पहले ही वह जाने के लिए मुड़ गयी थी और यों चल पड़ी थी मानो कोई जीवित कंकाल घिसटता जा रहा था ।

                                                                           रूपसिंह चन्देल

                                                       बी-3/230,सादतपुर,विस्तार,

                                                       दिल्ली - 110 094    

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