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प्रवासी
कहानी
एक सीधी-सादी परिपूर्ण जिंदगी
बिंदु भट्ट
वह
लगभग
जब
भी
मुझसे
मिलती
बस
एक
ही
बात
कहती,
"ज़िगी
के
पहले
मुझे
ही
मौत
दे
जीसस,
तो
अच्छा
हो।
मेरा
बेटा
और
बहु
अच्छे
हैं
लेकिन
मैं
कभी
भी
उनके
पास
नहीं
रह
सकती।
उनकी
अपनी
ज़िंदगी
है
और
फिर
मैं
अपने
तरीके
से
ही
जीना
चाहती
हूँ।"
अक्सर
वह
मुझे
अपने
बचपन
की
बातें
सुनाती
थी।
मैंने
उससे
बार-बार
उसके
भाई
बहनों
के
बारे
में
सुना
था।
उसे
शायद
याद
ही
नहीं
रहता
था
कि
ये
सारी
कहानियां
वह
मुझे
पहले
भी
सुना
चुकी
है।
उसका
भाई
डेनी
खूब
अच्छा
गाता
था।
उसकी
बहन
मेरी
का
पति
बहुत
शराब
पीता
था
और
उसके
आठ
बच्चे
थे।
मेरी
का
परिवार
ही
सबसे
बड़ा
था
और
शायद
मेरी
ही
सबसे
पहले
इसलिए
गुज़र
गयी
कि
उसे
हर
वक्त
बच्चों
की
चिंता
लगी
रहती
थी।
आख़िरकार
आठ
बच्चों
को
पाल-पोस
कर
बड़ा
करना
कोई
खेल
तो
नहीं।
उसकी
एक
बहन
जो
इलिनोई
में
रहती
थी।
उसका
बेटा
जोन
डिप्रेशन
का
मरीज़
था
और
भरे
जवानी
में
ही
चल
बसा
था।
वह
इतना
मोटा
हो
गया
था
कि
बस
पूछो
ही
मत।
उसके
लिए
खास
बिस्तर
बनवाना
पड़ा
था।
अन्तोनिया
की
माँ
खूब
अच्छा
गाती
थी।
लोग
उसकी
आवाज़
सुनते
तो
रुक
जाते
थे,
सुनने
को।
ऎसे
तो
न
जाने
कितने
किस्से
सुनाए
थे
मुझे
उसने
और
न
जाने
कितनी
बार
दुहराए
थे।
पिछले
दिनों
मैं
एक
फिल्म
देखी
थी,
"आइरिस"।
केट
विन्स्लेट
और
जुडी
डेन्च
थीं
उस
फिल्म
में।
फिल्म
अच्छी
थी
और
मुझे
पहली
बार
अलज़ाइमर्स
के
बारे
में
कुछ
देखने
को
मिला
था।
पहली
बार
एड्स
के
बारे
में
भी
फिल्म
"फिलाडेल्फिया"
ने
ही
झकझोरा
था।
उससे
पहले
पढ़ा
था,
बस।
यह
बात
नहीं
कि
मुझे
इन
बीमारियों
के
बारे
में
नहीं
मालूम
था और
इन
बीमारियों
से
लगी
बेबसी
और
साथ
में
जुड़ी
सामाजिक
गलतफ़हमियों
का
खूब
अंदाज़
था
मुझे।
पर
फिल्म ने
कहीं
बहुत
गहराई
तक
छू
लिया
था।
"आइरिस"
देखने
के
बाद
मुझे
अन्तोनिया
की
बार-बार
दुहराई
जाने
वाली
बातें
बिल्कुल
परेशान
नहीं
करती
थीं।
जैसे
अचानक
ही
मेरी
सहिष्णुता
बढ़
गई
हो।
वैसे
भी
मैंने
सुनने
की
कला
पर
माहिर
होने
का
मौका
समझ
लिया
था
हमारी
बातचीत
को।
रोज़
ही
वह
मेरी
मेल,
मेल
बॉक्स
से
निकाल
कर
मेरे
अपार्ट्मेन्ट
में
डाल
देती
थी।
अगर
मुझे
आफ़िस
से
आने
में
देर
हो
जाती
कभी,
तो
ज़रूर
कहती,
"तुम
शाकाहारी
हो
इसलिए
मैं
तुम्हारे
लिए
क्या
बनाऊँ
यही
नहीं
पता
चलता।
नहीं
तो
तुम्हें
मैं
ही
डिनर
खिलाती।"
वह
रोज़
ही
खाना
बनाती
थी।
उसने
शायद
ही
कभी
टी
वी
डिनर
किया
हो।
जब
से
मैं
इस
अपार्ट्मेन्ट
में
रहने
आई
तब
से
ही
ज़िगी
और
अन्तोनिया
ने
मेरी
ढेर
सारी
कठिनाईयों
को
सहूलियत
में
बदल
दिया
था।
तब
ही
तो
मुझे
यही
लगता
था
कि
भगवान
ने
मेरे
लिए
माता-पिता
का
साया
बनाकर
इन
दोनों
को
भेजा
है।
कितना
बड़ा
सहारा
था
मेरे
लिए
उनका
ऊपर
वाले
अपार्ट्मेन्ट
में
रहना!
जब
मेरी
छोटी
बिटिया
ज़िद
करके
एक
पिल्ला
ले
आई,
तो
वह
समझिए
कि
ज़िगी
की
बदौलत
ही
पला।
ज़िगी
ही
उसे
दो-तीन
बार
दिन
में
घुमाने
को
ले
जाते
थे।
ज़िगी
ने
मुझे
कूड़ा
कभी
भी
फ़ेंकने
नहीं
दिया।
हमेशा
वे
ही
उठा
कर
फेंक
आते
थे।
मुझे
बहुत
शर्म
आती
थी,
पर
वे
नहीं
मानते
थे
और
हाथ
से
खींच
कर
कूड़े
की
बेग
ले
ही
लेते
थे।
उनको
कम
सुनाई
पड़ता
था
और
अन्तोनिया
को
सारा
दिन
बोलने
की
आदत
थी।
सो
अपने
बचाव
के
लिये
ज़िगी
अक्सर
ही
अपना
हियरिन्ग
ऐड
बन्द
कर
के
रखते
थे।
अगर
किसी
दिन
मैं
दोपहर
को
घर
पर
होती
तो
दोनों
की
बहस
सुनाई
पड़ती।
ज़िगी
को
सुनने
में
तकलीफ़
और
अन्तोनिया
को
देखने
में।
या
खुदा
क्या
जोड़ी
बनाई,
तूने
भी!
ज़िगी
हाथ
पकड़
कर
अन्तोनिया
को
ग्रोसरी
करने
के
लिये
सुपर
मार्केट
तक
ले
जाते
थे।
अन्तोनिया
काले
हील
वाले
पालिश
किये
हुए
जूते
पहनती,
अपनी
सफाचट
हुई
भौहें
रंगती,
लिपस्टिक
लगाती,
आयरन
किये
हुए
कपड़े
ही
पहनती
और
ज़िगी
का
हाथ
पकड़
कर
ग्रोसरी
करने
निकल
पड़ती।
हर
बृहस्पतिवार
को
वह
अपनी
शोपिंग
कार्ट
में
अपनी
लॉन्ड्री
के
कपड़े
डाल
कर
लोन्ड |