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डॉ. बलदेव की ग्यारह
कहानियाँ
जोर-ज़मीन का
लहुरमन
को रात-रात भर नींद नहीं आती । बिस्तर उसे आग जैसे लगती। झगड़े
का वह कारण खोजता। करवट बदलता । बिरबिट अंधियारी में उसकी
आँखे जलने लगती । पन्द्रह दिन पहले की घटना उसके आँखों में
झूलने लगी।
अँटवा-मछरी रखकर लहुरमन बड़े गौंटिया के द्वार में खड़ा होकर,
हाँक लगाने लगा। बड़े गोंटिया उस समय चाह पीकर बीड़ी सुलगा रहा
था। आवाज़ पाकर लहुरमन को बड़े प्रेम से बुलाया -पायलागी मालिक
। खुश रहो, आओ लहुरमन बताओ। आपकी कृपा से सब ठीक ठाक है, मालिक
। आपके चौकरे में तिवरा उतारने गया था। झोरकी में दो चार कोतरी
मिल गयी। उसी को लेकर आया था। इस बार तो उस खेत में मूड़ भर
धान है। भाई तूने तो बंजर को बहरा बना दिया। रस लेता हुआ बड़े
गोंटिया बोला। यह तो आपका ही दिया हुआ है मालिक। नहीं-नहीं यह
तो तुम्हारे जाँगर का ही फल है। मेरे पास तो वह ज़मीन परती थी।
फिर तुम्हें मुफ़त में तो दी नहीं, इतनी अधिक ज़मीन है कि उसकी
देखरेख अब मेरे वश की नहीं है। अधिया में खेती नहीं होती ।
ठेके पर खेत बिगड़ जाता है। नौकर नहीं मिलते । सभी शहरिया हो
गए हैं। हाँ ये बात तो है मालिक। अरे भाई आज जो कमाएगा वहीं
खायेगा। जो जोतेगा उसकी ही ज़मीन । ज़्यादा ज़मीन पकड़ कर जो
बैठे हैं वे भूख मर रहे हैं। खेत परती पड़ी हुई है।
बड़े गौटिया की बात बड़ी अच्छी लग रही थी । उसने एक बीड़ी
लहुरमन की ओर बढ़ाई ।वह बीड़ी रखकर, कौड़े की आग से सुपचाकर,
फिर बेंचपर वापस बैठ गया। गौटिया फिर पूछने लगा- और क्या बात
है भाई लहुरमन, बता लहुरमन । असमंजस में पड़ गया । सोचने लगा,
क्या इन्हें भी ख़बर लग गयी । छोटे गौटिया का कुकर्म वह बड़े
गौटिया को कैसे बतावें
? औरत की इज्जत का सवाल है। रोज़ रोज़ की
छेड़खानी भला कौन बरदाश्त कर सकता है। लहुरमन बड़े गौंटिया का
बड़ा अदब करता था। उसने सिर झुका दिया। शायद गौंटिया को घटना
का आभास था। फिर पूछा- अरे चुप क्यों हो गया
?....
क्या बताऊँ मालिक, कहता हूँ तब भी मरना, नहीं कहता हूँ तब भी
मरना।
दीवार से लगकर बदनसिंह बड़े भैया और लहुरमन की बातें सुन रहा
था। पोल-पट्टी खुल जाने के डर से बदनसिंह अपने आँगन से कूदकर
वहाँ आ पहुँचा। आदमी एक गलती छिपाने के लिए दूसरी गलती करता है
और खुद का अनर्थ कर बैठता है। लहुरमन बीड़ी होंठों से लगाया ही
था। दोनों की आँखें टकराई और चिनगारियाँ छूटने लगीं। बड़े
गोंटिया दोनों के बदलते रंग को देखकर दंग रह गया। ..... लहुरमन
ने एक कश खींचा और धुंआ गटक गया। बदनसिंह व्यंग्य से बोला- तुम
लोगों को सरकार ने क्या बढ़ा दिया, हमारे सिर पर चढ़ने लगे हो।
ऐसा क्यों बोल रहे हैं छोटे मालिक
? लड़ाकू भेंसे-सा बदनसिंह बोला- नहीं तो क्या हमारे आगे बेंच में
बैठने की तुम्हारी हिम्मत होती
?
ग़लती हो गयी मालिक। और लहुरमन उठ खड़ा हुआ । ग़लती तुम्हारी
नहीं हमारी है जो कि नीचों को हम लोग घर में बैठाना शुरू कर
दिए ।
बदन सिंह की बातों को सुनकर बड़े गोंटिया खिसिया गये- डाँटकर
बोले- मैंने बैठाया है। क्या आदमी के बैठने से घर को छूत लग
जायेगी । बदनसिंह का एक-एक शब्द लहुरमन की कान में लूठी-सा
घुसने लगे। उसकी मुट्ठी कस गयी थी। दोनों भाइयों में चकचक शुरु
हो गई बदनसिंह उटकने लगा- इसका पैसा फेंक दीजिए। क्यों
? ज़मीन बेंचकर मैं नट नहीं सकता। तो क्या रजिस्ट्री हो चुकी है
?
देखता हूँ कैसे फसल काटता है?
मरना है क्या
? तुम्हारा क्या जायेगा
?
सायंकाल गुडी बैठी। पंचों के नाम पर बदनसिंह के ठेकेदार के
लठैतों के सिवाय और कोई नहीं था। मजबूरी में लहुरमन को गुड़ी
में जाना पड़ा। उसके पहुँचते ही बदनसिंह ने चेतावनी देते हुए
लहुरमन से बोला- देख तू हमारे भाइयों के बीच में मत आ, चौकरा
मेरा है, उसे छोड़ दे। लहुरमन ने बड़ी संयत भाषा में कहा-
मालिक जिस दिन ज़मीन ख़रीदी उस दिन आपको उजर करना था। रात-दिन
पसीना बहाकर मैंने दर्रा ज़मीन को
“बहरा” बनाया है तो आपको लोभ हो आया है। तू हमको कानून क़ायदा बताता है नीच
कहीं का । उधर टेटकू गुर्राया- अरे लहुरमन तू कब्जा छोड़ दे
नहीं तो इसका अंजाम बुरा होगा। लहुरमन भी दहाड़ा- देख टेटकू,
मालिक और मेरे बीच मत आ। बातचीत हम दोनों के बीच ही होगी। नहीं
तो पंचायत को पंचायत जैसे होने दे। टेटकू ललकारने लगा- चुप रे
लबार, दो कौडी का आदमी पंचायत का डर बताता है। लहुरमन आव देखा
न ताव। टेटकू के टोंटा में कूद बैठा। इसके बाद तो सभी ठेंगहा
लहुरमन के ऊपर पिल्ल पड़े। भारी ...... लहुरमन के एक ही झटके
में सब तितर-बितर हो गए । घेरा तोड़कर वह दौड़ा दौड़ा अपने घर
में घुसा फिर गाली बकते हुए फरसा लेकर गुड़ी की और दौड़ने
लगा। उसकी औरत बीच में आकर उससे लिपट गयी और वापस ले आई।
लहुरमन की घऱवाली फूलबासन भी रात भर छटपटाती रही, उसकी आँखों
में नींद कहाँ
? क्या होगा
? जाति वाले बढ़ोत्तरी देखकर अलग दुश्मन हो
गये हैं। ऊपर से बदनसिंह रावन जैसा ललकार रहा है। कौन खेत में
खड़ा होगा, देख लूँगा। यदि लाश नहीं गिरा दिया तो अपने बाप का
पेशाब नहीं
? बदनसिंह के छेड़छाड़ की याद करते हुए उसके शरीर में आग लग गई।
उसकी मुट्ठियाँ भींच गई। दाँत पिसने लगा-नाश हो इस भड़ुए का।
लहुरमन हड़बड़ा कर भिनसारे ही खाट से उठ गया। फरसा पकड़ा और घर
से बाहर हो गया
? वह कब थाना पहुँचा और वहाँ से कब लौटा
किसी को पता नहीं चला। लहुरमन मुँह-अंधेरे ही नहा डाला ।
दुर्गा का स्मरण किया । माथा में बन्दन का बडा़-सा टिका लगाया
और दही के साथ बासी खाकर हँसिया और फरसा हाथों में ले लिया ।
घर वाले को बाहर से निकलते देख फूलबासन भी हँसिया और डोरी ले
कर निकलने लगी। दोनों की बातचीत सुनकर दोनों लड़के भी उठ गए और
महतारी के पीछे लग गए। बच्चों को देख-कर माँ बाप की ममता उफन
पड़ी । कुछ क्षण के लिए वे दोनों दरवाज़ें में ही रूक गये ।
उधर अपनी औरत को रोकने पर भी छोटा भाई रूपचंद आँगन में आ गया।
लहुरमन ललिआए आँखों में आँसू भर कर बोला- भाई तू लौट जा । यदि
तू भी साथ में जायेगा तो इन बच्चों को कौन देखेगा
?
हम दोनों के मरने पर हमारे बच्चों की गति कुत्ते-बिल्ली जैसी
हो जाएगी। रूपचंद ने भौजी को लौटाना चाहा लेकिन बेअसर । आखिर
चाची के हिस्से बच्चों को छोड़कर राम लक्ष्मण और सीता जैसे
तीनों खेत की और निकल पड़े।
खेत की मेड़ पर दु मुँह वाले चूल्हे के ऊपर छोटी छोटी हंडी और
कराह रख दिए गये थे। खेत के बीचों से कटाई करने की बात तय हुई
। लहुरमन ने सचेत किया-
“हूँ” बोलते ही तुम लोग सीधे थाने की ओर दौड़ना । सूरज की किरणें पूरब दिशा
में फूट पड़ी। घास और धान की बालियों में ओसकन लकलक-लकलक चमकने
लगे। तेजधार हँसिया भी चमकने लगी। धान की बालियों में
लझ्झ-लझ्झ बजने लगी। थोडी़ देर में बदनसिंह अपने लठेतों को
लेकर वहाँ पहुँचा । खेत चारों ओर से घेर लिया गया। बदन सिंह
ललकारने लगा-अरे नीच जान प्यारा है तो खेत छोड़ कर भाग जा,
नहीं तो बोटी-बोटी कटवा दूँगा। इधर लहुरमन ....हुंकारने लगा-
मेरा खेत है, जान रहे चाहे जाय। आज रन नहीं छोड़ूँगा, अपने बाप
का बेटा है तो मैदान में आ, जानते नहीं जर-जोरू और ज़मीन के
कारण प्राण गँवाना पड़ता है।
जानता हूँ ।
बदनसिंह की देह में आग लग गई। गाली देता हुआ अपनी जगह खड़े
होकर हुरियाने लगा। उसकी ललकार न सहन कर रूपचंद भी फरसा लेकर
हुरियाने लगा- असली वीर है तो मैदान में क्यों नहीं उतरता रे
कायर । मुँह चलाने से तू क्या जीत जायेगा
? रूपचंद का बिकराल रूप देखकर बदनसिंह के शरीर में झुरझरी-सी
पैदा हो गयी । लहुरमन अपने मजबूत किले में ताकतवर था। जहाँ धान
के गाभ में सियार जैसे चतुर प्राणी भी फंसकर जान गवाँ बैठता
है। बदनसिंह एक बार अपने लठैतों को देखता दूसरी बार अपने
दुश्मनों को।
लठैतों का मुखिया फूदूसिंह था। अचानक ही उसकी नज़र मेड़ पर रखे
चूल्हा ऊपर रखे हंड़िया और कड़ाही की ओर गयी । वह अचरज में पड़
गया । कारण उसकी समझ में न आया तब लहुरमन से पूछा- लहुरमन इस
खाली चूल्हें चौकी का क्या रहस्य है। फूदू और लहुरमन बचपन के
दोस्त । किसी बात पर दोनों अलग हो गए थे। दोनों की आँखें मिली।
लहुरमन की आँखें छलछला उठी। अवरूद्ध कंठ से बोला- भैया मैं तो
रन में भाई के संग अकेला खड़ा हूँ । बदनसिंह के फौज के सामने
में कितनी देर टिकूँगा। बदनसिंह का बहुत दिनों का हिसाब भी
चुकाना है। तुम तो बदनसिंग के सेनापति हो। मैं मारा जाऊँ तो
मेरा कलेजा निकाल लेना और पकाकर बदनसिंह को खिला देना ताकि
उसकी छाती ठंडी हो जाय। इसके बाद मेरी मर्यादा, मेरी इज्जत
इसको सौंप देना। बहुत दिनों से इसकी नज़र फूलबासन पर है।
खाने-पकाने का मैंने पहले से ही इंतजाम कर दिया है।
फुदू के हृदय में कुछ रेंगने-सा लगा वोला- अच्छा लहुरमन, यहाँ
आ । फूदूसिंह की बातें सुन देवर-भोजाई लहुरमन को मेड़ पर जाने
के लिए मना करने लगे। फूदू ने विश्वास दिलाते हुए कहा- डर मत,
मेरे रहते तेरा बाल भी बांका न होगा।
वे दोनों भाई फरसा और टाँगा रखे खेत की मेड़ के ऊपर आए । पीछे
हँसिया रखी फुलवासन भी थीं। अब बदनसिंग कुटिल मुस्कान फेंकने
लगा और अपने ठेंगहारों को हुमकाने लगा। कोई आगे बढ़ता कि
फूदूसिंह की एक धुड़की से बदनसिंग की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।
फूदू का बिपरीत आचरण देखकर बदनसिंह को बुखार चढ़ गया । फूदू
समझाने लगा- देख लहुरमन, यह ज़मीन बदनसिंग की है। इसे छोड़ दे।
मालिक से क्यों रार लेता है। लहुरमन ने बिनती के स्वर में
कहा- जब मैंने इस खेत को खरीदा, सब जानते हैं इसकी क्या हालत
थी, बड़े मालिक ने इसे मेरे पास बेचा है, यदि वे इंकार करें तो
में कब्जा छोड़ दूँगा।
उधर हपटते-गिरते भाई को पुकारते भुजबल सिंह वहाँ पहुँच गए।
फूदू उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगा। बड़े गोंटिया गाँव को क्यों
लड़ा रहे हो
? आप सही-सही बताओ, यह ज़मीन किस की है?
भुजबल सिंह की बातें सुनकर सब दंग रह गए।
लहुरमन एक जोड़ी भैसा और चार सौ रूपिया देकर यह ज़मीन मुझसे
खरीदा है तब यह खेत नहीं था।
“भर्री” था । मैने भाई बदन को खाता दिखा दिया है
तब भी यह जिद्द कर रहा है कि ज़मीन उसकी है। अब तुम लोग
बदनसिंह को समझाओ । रहा पैसा वापिस करने का, उसका प्रश्न ही
नहीं उठता। मैंने जब यह ज़मीन बेची तब इसने उज़र क्यों नहीं
किया ?
बदनसिंह गरजने लगा- अरे यह असली बात क्या बतायेगा। फूलबासन की
ओर उँगली दिखाकर बोला- यह इसकी रखैल है। इसी के एवज में यह
ज़मीन है। फूलवासन के तन-बदन में आग लग गयी। बघनीन जैसे उसने
झपट्टा मारते हुए कहा- बेशरम, तू आदमी नहीं है। मुफ़्त में
मेरा मांस बेच रहा है। बदनसिंग हँसिया के वार से बचने के लिए
पीछे कूद गया। तब भी फूलवासन लठेतों के बीच घुस पड़ी। लहुरमन
और रूपचन्द ने उसे पकड़कर गिरने से सम्हाला। फिर भी उनकी बाहों
में छटपटाने लगी। इतना ही नहीं झटके में उसने हँसिया अपनी ही
गर्दन तक ले गयी। यदि रूपचन्द हँसिया छीन नहीं लेता तो अनर्थ
हो जाता।
अब असहाय फूलबासन फफक-फफक कर रो पड़ी । अब किस मुँह लेकर
जीऊँगी। इसने मेरी जिनगानी में दाग लगा दी। लहुरमन का कलेजा
छलनी होने लगा। इसके बाद भी समझाते हुए उसने कहा- इस कुत्ते के
भौंकने पर तुम्हारे चरित्र में क्या फ़र्क पडे़गा । क्या मैं
तुझे नहीं जानता ।
बदनसिंग के इल्ज़ाम का उलटा असर पड़ा। बड़े गोंटिया गाँव में
देवता जैसे पूजे जाते थे। सब उन्हें पिता-तुल्य आदर देते थे।
उनके ऊपर यह झूठा लांछन सुनकर सब बदनसिंग के ऊपर थूकने लगे।
इसी समय टहलू आया। फूदूसिंह के कान में कुछ कहा और जैसे आया था
वैसे ही वापस हो गया। भाई की अपमानजनक बातें सुनकर भुजबलसिंग
असह्य पीड़ा से भर गये। और मुँह नीचा किए चुपचाप वापिस हो गये।
पासा पलट गया। फूदूसिंह अब बदनसिंह से इजहार लेने लगा- क्यों
छोटे मालिक। आप हमसे झूठ क्यों बोले। बदनसिंग को कुछ उत्तर
नहीं सुझा। अब झूठ ही सहारा था। उसने कहा- देख ज़मीन तो मेरी
ही है। भाई साहब पटवारी से मिलकर अपने खाता में कब चढ़वाए मुझे
कुछ पता नहीं है। मालिक यह तो साफ हो गया कि बड़े गौंटिया ने
इस ज़मीन को लहुरमन के पास बेचा है
? तो क्या मेरी ज़मीन भी वे बेच सकते हैं।
यह ज़मीन तुम्हारी है या तुम्हारे भैया की इसका फैसला तो अदालत
में होगा । निपटारा तो अभी होगा फूदू, मारों इस साले नीच को
? हम लोग सही जानकारी के बिना किसी के ऊपर हाथ नहीं उठायेंगें । अपना
दारू-वारू अपने घर में रख। हमारा कहा मानो और वापस चलो। मैं
यूँ ही यहाँ नहीं आया हूँ और न ही तुम लोगों के लिए मैंने इतना
सारा खर्च किया है। यह खेत कैसे काटेगा मैं देखता हूँ । दोनों
भाइयों की ओर इशारा करता हुआ बदनसिंग आगे बोला- ये लोग खेत में
फिर उतर कर देखें, लाश गिरा दूँगा- फूदूसिंह बदनसिंह की बात
सुनकर कड़का- हाँ तो तुम निपटो। ऐसा कहकर फूदूसिंह वहाँ से
चलने लगा। एक के बाद एक बदनसिंह के लठैत वहाँ से खिसकने लगे।
असली ठाकुर के औलाद हो तो खेत काटने से रोक ले, यह कहते हुए
लहुरमन रूपचंद, और फूलवासन खेत में कूद गए और धान काटने लगे।
बदनसिंग के सिर पर काल मंड़रा रहा था । उसका सारा ध्यान लहुरमन
के ऊपर था। वह कसमें डालकर लहुरमन को लड़ने के लिए उत्तेजित
करने लगा । अरे नीच यदि तू असली बाप की औलाद है तो खेत की मेड़
में आकर दिखा । लहुरमन की आँखों में खून उतर चुका था । वह फरसा
लेकर बदनसिंग की ओर दौड़ा । बदनसिंह पागल-सा हाथ-पैर पीटते
चिल्ला रहा था, देखो यह नीच भागने मत पाए। जब किसी की आवाज़
उसके कानों तक न पहुँची तब उसने अगल-बगल देखा, वहाँ कोई नहीं
था, अपने को अकेला पाकर बदन सिंह काँप उठा। घबराकर वह भागने
लगा लेकिन बाघ के आगे बकरा कहाँ और कब तक भागेगा । दौड़कर
लहुरमन ने बदनसिंह के गले में अर्ध चन्द्र रख दिया और वह
फूटबाल जैसे लुढ़कने लगा उसकी आँखें निकल आयी । फरसा ठीक उसके
ऊपर गिरता कि फुलबासन बीच में आ गयी । वार रोकने में उसकी
हथेली तेजधार से कट गयी । खून की तेजधार बहने लगी। फिर भी वह
बरजती रही- जाने दो बैरी को, हम लोगों ने बड़े मालिक का नमक
खाया है। मालिक का नाम सुनते ही लहुरमन जघन्य हत्या से जैसे बच
गया । लहुरमन को जाने कैसे लगा । लगा-उसने गो हत्या कर दी है।
डॉ. बलदेव
स्टेडियम के पीछे, रायगढ़,
छत्तीसगढ़
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